अफ़गानिस्तान में अमेरिकी रणनीति: हक्कानी नेटवर्क और अफगानिस्तान-पाकिस्तान संबंध

यह स्पष्ट हो गया है कि अफगानिस्तान में कोई त्वरित तुरंत सुधार होने वाला नहीं हैं। आज तक, अमेरिकी सेना अफगान तालिबान पर एक निर्णायक जीत हासिल करने में असमर्थ रही है और अब अफगान तालिबान का अफगानिस्तान के लगभग १३ प्रतिशत क्षेत्र पर नियंत्रण है। इस पर विचार करते हुए अफगानिस्तान में अमेरिका के शीर्ष कमांडर जनरल जॉन निकोलसन ने हाल ही में इस संघर्ष को एक “निरंतर गतिरोध” बताया। २०१४ के राष्ट्रीय चुनाव के बाद, शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण के बावजूद, संवैधानिक अस्पष्टता, भ्रष्टाचार और आंतरिक घरेलू राजनीतिक गुटों के कारण अभी भी अफगानिस्तान में एक लचीला राजनीतिक ढांचा स्थापित नहीं हो पाया है। इसके अलावा, पाकिस्तान के साथ बाहरी तनाव, जिस पर अफगानिस्तान का आरोप है कि वह आतंकवादी समूहों को सुरक्षित आवास प्रदान करता है, ने भी एक स्थायी शांति के संभावना को जटिल बना दिया है।

अफगानिस्तान में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की रणनीति को सफल बनाने के लिए, अमेरिकी नीति निर्माताओं को दो मुद्दों पर काम करना चाहिए। सबसे पहले पाकिस्तान के सहयोग को प्राप्त करने के लिए, अमेरिका को हक्कानी नेटवर्क को जड़ से ख़तम करने पर ध्यान देना चाहिए जो कभी अफ्गानिस्तम में अमरीका का सबसे बढ़ा दुश्मन था। हक्कानी नेटवर्क से लड़ने के लिए प्रभावी नीति बनाने और अफगान तालिबान के नरम तत्वों के साथ सुलह नीति तैयार करते वक़्त पाकिस्तान को साथ लेना होगा, जिस पर आरोप रहा है कि वह अक्सर इस विद्रोही संगठन को पनाह देता है।

दूसरा यह कि इस मुद्दे को आगे बढ़ाने के लिए अमेरिकी नीति निर्माताओं को पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच एक सार्थक द्विपक्षीय संबंध सुनिश्चित करने में मदद करनी चाहिए। पिछले कुछ वर्षों में, दोनों देशों के बीच खटास आ गई है। उदाहरण के लिए, पिछले साल यह खुलासा हुआ कि अफगान तालिबान के नेता मुल्ला अख्तर मंसूर के पास पाकिस्तानी पासपोर्ट था। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के पुराना प्रतिद्वंद्वी भारत के बीच बढ़ते सहयोग ने भी पाकिस्तान को चिंतित किया है। चल रहे सीमावर्ती विवाद और पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच द्विपक्षीय व्यापार कि बाधाओं के कारण इन बिगड़ते संबंधों में और भी तनाव आए है। यह इस बात को दर्शाता है कि दोनों पड़ोसियों के बीच क्षेत्रीय तनाव की कोई कमी नहीं है।

इन दो प्राथमिकताओं से पता चलता है कि अमेरिकी सरकार को न केवल पाकिस्तान के साथ तालमेल बना कर हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ सामरिक लाभ उठाने की जरूरत है बल्कि काबुल और इस्लामाबाद में सरकारों से अनुरोध करने की जरूरत है कि वे ऐसी राजनयिक पहल करें जिससे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए रास्ता तैयार हो सके। अफगानिस्तान और पाकिस्तान में इन दोनों उद्देश्यों में संतुलन बनाए रखना आने वाले महीनों और वर्षों में अमरीकी विदेश नीति के लिए एक चुनौती होगा।

हक्कानी नेटवर्क पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता

इस क्षेत्र में हक्कानी नेटवर्क अमेरिकी रणनीति के गले का फंदा बना हुआ है। हक्कानी नेटवर्क कई भयानक हमलों का जिम्मेदार रहा है जैसे काबुल में अमेरिकी दूतावास पर २०११ का घातक आतंकवादी हमला, २०१२ में काबुल में १८ घंटे तक चलने वाला हमला और कथित रूप से उस ट्रक बमबारी का भी जिम्मेदार हक्कानी नेटवर्क ही है जिस में १५० से ज्यादा लोग मारे गए थे। ट्रम्प प्रशासन की हालिया कार्रवाई से यह संकेत मिलता है कि अब अमेरिका इस समूह को खतम करने पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकता है। पिछले महीने की शुरुआत में, अमेरिकी कांग्रेस ने २०१८ राष्ट्रीय रक्षा प्राधिकरण अधिनियम (एनडीएए) से कश्मीर केंद्रित भारत विरोधी आतंकवादी समूह लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) के संदर्भों को हटा दिया लेकिन हक्कानी नेटवर्क के संदर्भों के साथ कोई भी छेड़ छाड़  नहीं की।

इसका मतलब है कि अमेरिकी सरकार से पुनर्भुगतान के रूप में सैन्य सहायता प्राप्त करने के लिए लश्कर-ए-तैयबा के ठिकानों को खतम करने के लिए पाकिस्तान को प्रगति दिखाने के लिए नहीं कहा जाएगा। इस प्रकार एलईटी का हटाया जाना इस बात का संकेत है कि अफगानिस्तान में सहयोग हासिल करने के लिए वाशिंगटन पाकिस्तान को कुछ छूट दे सकता है।

हालांकि राष्ट्रीय रक्षा प्राधिकरण अधिनियम के द्वारा लश्कर-ए-तैयबा के खतरे को कम करने से भारत खुश नहीं होगा, लेकिन अफगानिस्तान में अमेरिकी हितों के लिए यह कदम अच्छा है। इस लेखक के अनुमान में, अफगानिस्तान स्थित हक्कानी नेटवर्क पर प्रभाव बनाए रखने की तुलना में लश्कर जैसे प्रॉक्सी समूहों के माध्यम से भारत के खिलाफ पाकिस्तान की रणनीतिक गहराई को बनाए रखना इस्लामाबाद के लिए अधिक महत्वपूर्ण होगा। अब जबकि लश्कर के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए पाकिस्तान कम दबाव में है, तो हो सकता है हक्कानी नेटवर्क को ख़तम करने के लिए नीति निर्माता ठोस कार्रवाई करने के अधिक इच्छुक हों, यदि अमेरिका यह संकेत देता है कि इस समूह का उन्मूलन उसकी पहली प्राथमिकता है।

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के संयुक्त वक्तव्य के बाद, जिसमें एलईटी को अल कायदा के समरूप एक आतंकवादी समूह के रूप में चिह्नित किया गया, भारत को यह निराशा कुछ ज्यादा ही खलेगी। एनडीएए में बदलाव के बाद, पाकिस्तानी अदालत द्वारा एलईटी के संस्थापक हाफिज सईद को रिहा करने के फैसले को भी पाकिस्तान के नए आत्मविश्वास से जोड़ा जा रहा है।

अफगानिस्तान-पाकिस्तान तनाव कम करने में अमेरिकी भूमिका

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय तनाव को कम करना अफगानिस्तान में अमेरिकी रणनीति की दूसरी प्रमुख प्राथमिकता होनी चाहिए। इसलिए, तालिबान के साथ सामंजस्य प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। राष्ट्रपति ट्रम्प के युद्ध जैसी बयानबाज़ी के बावजूद, ऐसा लगता है कि अमेरिका यह स्वीकार करने के लिए तैयार है कि अफगान तालिबान पर सैन्य विजय अब संभव नहीं है। इसका कुछ कारण तो यह है कि जीत का दावा करने के लिए विद्रोहियों को केवल “हारने से बचने” की आवश्यकता होती है। शायद वॉशिंगटन के नीति निर्माताओं के भीतर भी इस विचार की आवाज़ गूँज रही है–अमेरिकी विदेश मंत्री टिल्लरसन ने हाल ही में तालिबान के बीच उदारवादी आवाज़ों से शांति प्रक्रिया में शामिल होने की विन्नती की।

जहाँ अमेरिका तालिबान के उदार तत्वों के साथ सुलह प्रक्रिया के लिए तैयार लगता है, वहीं काबुल और इस्लामाबाद के बीच लंबे समय तक चलने वाली दुश्मनी इस प्रक्रिया को नुकसान पहुंचा सकती है। पिछले महीने की शुरुआत में अफगानिस्तान के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अब्दुल्ला अब्दुल्ला ने अफगान सरकार के खिलाफ आतंकवादियों को इस्तेमाल करने और उन्हे पनाह देने के लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराया। दूसरी ओर, इस्लामाबाद नियमित रूप से यह चिंता व्यक्त करता रहा है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) को अफगानिस्तान में सुरक्षित आश्रय मिला है।अंततः, एक दूसरे पर दोष लगाने से इस क्षेत्र में किसी का कोई लाभ नहीं होगा। और इसलिए अमेरिका की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।  संयुक्त पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा की निगरानी और चतुर्भुज समन्वय समूह की निरंतर बैठकों जैसे प्रयास सही कदम हैं, लेकिन अमेरिका को इस तरह के सहयोग को बनाने के लिए और कोशिश करनी होगी अधिक जिससे अफगान स्थिरता  दो प्रमुख बाधाओं, हकीकानी नेटवर्क और तनावपूर्ण द्विपक्षीय संबंध, को खत्म किया जा सके।  

Editor’s note: To read this piece in English, please click here.

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Image 1: ResoluteSupportMedia via Flickr.

Image 2: Jim Mattis via Flickr.

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Shazar Shafqat

Shazar Shafqat

Shazar Shafqat is a counterterrorism and security analyst. His research focuses on South Asian security, Middle East politics, counterterrorism strategies, and military-related affairs. His commentary has been featured in such media outlets as The Hill, Middle East Eye, Middle East Monitor, The Diplomat, Asia Times, RealClearDefense, World Policy Journal, and Dawn, among others. He has also appeared on various electronic media platforms to discuss conventional and psychological warfare patterns, dynamics, and trends from across the world.

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