मोदी के चार साल: विदेश नीति की सफलताएँ और कमियां

मोदी सरकार की विदेश नीति

मई २०१४ में, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दक्षिण एशियाई समकक्षों को अपने शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित करके अपनी सरकार की विदेश नीति की दिशा का स्पष्ट संकेत दिया था, कि भारत के दक्षिण एशियाई पड़ोसी उसकी राजनयिक प्राथमिकता सूची में कितना महत्व रखते हैं। लेकिन पिछले चार वर्षों में मोदी सरकार के विदेश नीति प्रदर्शन से पता चलता है कि नई दिल्ली ने जहाँ घरेलू स्तर पर ग़लतियाँ की हैं वही पर बड़ी शक्तियों से निपटने में उसे कुछ सफलताएँ भी मिली हैं, जबकि दूर के पड़ोसियों के साथ उसका प्रदर्शन ठीक ठाक ही रहा है।

पड़ोस पहले?

यह स्वीकार करते हुए कि किसी भी देश की विदेश नीति केवल नई सरकार आ जाने से अपने पुराने संबंधों को तोड़ नहीं देती, मोदी सरकार की पड़ोस पहले’ नीति कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की दशकों पुरानी नीति के अनुसार ही है, जिसने भारत के पड़ोसियों के साथ दोस्ती पर ज़ोर दिया था। उदाहरण के लिए, बांग्लादेश के साथ द्विपक्षीय संबंध नीति निरंतरता के सबसे सकारात्मक प्रतिनिधि हैं, जहाँ मोदी सरकार ने अवामी लीग पर अधिक निर्भरता दिखाई है और तीस्ता नदी विवादों से दूरी बनाए रखी है। इसी तरह, अफगानिस्तान के साथ संबंध दोस्ताना ही रहे हैं, जहाँ आम जनता के सकारात्मक भाव से रिश्तों में बढ़ोतरी तो हुई है पर उन्हें आगे बढ़ने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया है।

श्रीलंका के साथ मोदी सरकार के संबंध निश्चित रूप से परंपरा से हट कर थे। राजनीतिक रूप से स्थिर मोदी सरकार ने भारत-श्रीलंका संबंधों को सफलतापूर्वक तमिल राजनीति से अलग निकाल कर उन्हें सांस्कृतिक एकता के दायरे में लाया। लेकिन २०१५ से भारत-समर्थक मैत्रीपाला सिरीसेना सरकार के सत्ता में होते हुए भी, द्वीप पर भारत चीन की रणनीतिक जगह को कम करने में बहुत सफल नहीं रहा है, जो आशा के विपरीत है। एक अलग राजनीतिक स्थिति में ही सही लेकिन मालदीव में भी ऐसा ही हुआ है। बीजिंग से मित्रता रखनी वाली अब्दुल्ला यमीन सरकार धीरे-धीरे चीन की आर्थिक सहायता पर और निर्भर होती जा रही है जिस कारण भारत की रणनीतिक जगह कम हो गई है पर भारत ने इस कार्रवाई का कोई उत्तर नहीं दिया है। श्रीलंका में हाल ही में हुए चुनाव के साथ, जिसमें  पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे और यमीन की राजनीतिक पहल को समर्थन मिला, ऐसा लगता है कि दोनों देश नई दिल्ली के प्रभाव से बाहर निकल रहे हैं।

नेपाल और पाकिस्तान इस क्षेत्र में मोदी की सबसे बढ़ी असफलताओं को रेखांकित करते हैं। पाकिस्तान के साथ संबंध सख्त गतिरोध में फंसे हैं, शायद २००८ के मुंबई हमलों के बाद से सबसे बुरे। सर्जिकल स्ट्राइक, २०१६ के अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में मोदी का बलूचिस्तान का उल्लेख, और जिस तरह सरकार ने कुलभूषण जाधव विवाद से निपटने की कोशिश की इसके कुछ कारण हो सकते हैं। नेपाल के साथ, २०१५ के भूकंप के बाद मोदी की मदद और समर्थन के होते हुए भी, नेपाल के नए संविधान ने काठमांडू और नई दिल्ली के बीच दरार पैदा कर दी, और मधेसी नाकाबंदी के कारण यह दरार और भी चौड़ी हो गई। लेकिन अब संबंधों में सुधार आया है, पर पिछले कुछ वर्षों से संकेत मिलता है कि नेपाल में भारत का प्रभाव कम हो रहा है और चीन भारत की जगह लेने को इच्छुक है।  

कुल मिलाकर, अपने दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के साथ मोदी सरकार ने पिछली सरकार की नीतियों ही निभाई हैं अौर कई पड़ोसियों के साथ द्विपक्षीय ज़मीन खो दी है।

विस्तारित पड़ोस: एशिया पर ध्यान

मॉरीशस और सेशेल्स के द्वीप देशों की यात्रा और हिंद महासागर रिम एसोसिएशन के साथ संबंध बनाने के अलावा, मोदी सरकार ने हिंद महासागर क्षेत्र (आईओआर) में एक मजबूत नींव बना ली है। ऊर्जा, सामरिक, और आर्थिक मानों में ये दौरे महत्वपूर्ण थे और इन दौरों ने  हिंद महासागर में भारत की समुद्री भूमिका पर ज़ोर दिया। आईओआर में नई दिल्ली की विदेश नीति को एक विशेष प्रोत्साहन मिला जब जनवरी 2०१६ में विदेश मंत्रालय में एक अलग आईओआर डिवीजन की स्थापना हुई। पर यह प्रारंभिक उत्साह अल्पकालिक था क्योंकि या तो विदेश नीति में इन देशों की चर्चा नहीं हुई या फिर सरकार के कार्यकाल के दूसरे भाग में इन देशों की ओर स्पष्ट रणनीतिक दृष्टि नहीं थी।

मोदी की पहल से दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति में नयापन और सामरिक गंभीरता आई, जो १९९० के दशक की नीति का पुनर्जागरित रूप है। यह केवल नाम का परिवर्तन नहीं है– एक्ट ईस्ट दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ व्यापार और निवेश संबंधों को बढ़ाने में भारत की उत्सुकता को दर्शाती है। लेकिन सार्थक प्रयासों के बाद भी, भारत-आसियान व्यापार अभी भी अस्वस्थ है और संपर्क बढ़ाने के प्रयासों में भी ज़्यादा आगे नहीं बढ़े हैं।

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द्विपक्षीय स्तर पर, मोदी की विदेश नीति को भारत के विस्तारित पड़ोस के भीतर एक बड़ी सफलता और एक बड़ी असफलता प्राप्त हुई। सफलता यह कि भारत के जापान के साथ संबंध गहरे हुए और २०१४ में बढ़ कर विशेष सामरिक एवं वैश्विक साझेदारी’ तक पहुँच गए। मोदी और उनके समकक्ष शिन्ज़ो आबे के बीच व्यक्तिगत भाईचारे द्वारा परिभाषित निर्बाध समन्वय, अवसंरचना सहयोग, परमाणु ऊर्जा और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति मोदी सरकार की उपलब्धियों को रेखांकित करते हैं।

सब से बड़ी असफलता यह थी कि चीन के साथ संबंधों को कैसे संभाला जाए इस बात सम्भ्रम बना रहा। यद्यपि शुरुआत में सहयोग के संकेत थे, लेकिन मोदी के अधिकांश कार्यकाल में बीजिंग से निपटने में मुकाबले की भावना बनी रही और भारत ने चीन के सामने ताकत का प्रदर्शन अपनाया। यही डोकलाम गतिरोध में हुआ, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे पर चिंताओं के कारण भारत ने बेल्ट और रोड फोरम को छोड़ दिया, और चीन पर नजर बनाए रखने के साथ, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ चतुर्भुज सहयोग स्थापित करने के लिए वार्ता में भाग लिया। लेकिन मोदी ने हाल ही में चीन के साथ संबंधों को सुधारने के लिए वुहान में राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ एक अनौपचारिक शिखर सम्मेलन में भाग लिया, मोदी सरकार ने अधिकारियों को एक निर्देशन दिया कि वे भारत में निर्वासन में रहने वाले तिब्बतियों की ६० वीं वर्षगांठ के उत्सव को न मनाएं। इसके बाद जो कुछ हुआ वह यह दर्शाता है कि भारत की चीन की नीति अपष्ट है, और यह आगे चल कर भारत के लिए हानिकारक हो सकता है।

महान शक्तियों के साथ संबंध: रूस और अमेरिका

मोदी सरकार की सबसे बड़ी विदेशी नीति सफलताएँ भारत के बाहरी संबंधों के बाहरीतम सांद्र चक्र में देखी गई हैं। २०१४ से, प्रशासन बड़ी शक्तियों के साथ सक्रिय रूप से संबंध बढ़ाने में लगा हुआ है, और कुछ अर्थों में, गुट निरपेक्ष नीति से दूर भी हुआ है।

यह विशेष रूप से भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी के मामले में सफल रहा, जहां द्विपक्षीय भागीदारी के मामले में दोनों पक्षों ने इतिहास के बोझ को उतार फेंका और रक्षा सहयोग, आधारभूत लौजिस्टिकल समझौतों और भारत-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग सहित कई मुद्दों पर सामान्य समझ पर पहुंचने में प्रगति दिखाई। दोनों पक्षों के बीच संबंध साझा हितों के कारण बढ़े हैं और आशा है कि भविष्य में भी ऐसा ही चलता रहेगा।

लेकिन रूस के साथ संबंध बिगड़ गए हैं क्योंकि भू-राजनीतिक गतिशीलता में बदलाव के कारण भारत अमेरिका संबंध घनिष्ठ हुए हैं, विशेष रूप से रक्षा मामलों में, और रूस ने चीन और पाकिस्तान के संबंध बढ़े हैं।

२०१९ और भविष्य

मोदी सरकार की विदेश नीति के पिछले चार वर्ष इसलिए याद किए जाएंगे कि विदेश में विस्तारित भारतीय भूमिका के लिए उत्साह रहा, सांस्कृतिक कूटनीति की भूमिका बढ़ी, विश्व के नेताओं के साथ मोदी की व्यक्तिगत दोस्ती रही और भागीदारों के साथ मिलकर अपने सामान्य हितों को अपने लाभ के लिए उपयोग करने में अधिक सक्रियता दिखाई। बीजेपी सरकार के हालिया राजनीतिक प्रदर्शन को देख कर ऐसा लगता है कि २०१९ में  एनडीए के लिए फिर से रास्ता साफ़ हो रहा है। विदेश नीति के क्षेत्र में, इसका मतलब महान शक्ति के साथ संबंधों को मज़बूत करने और मोदी सरकार के पांचवें वर्ष से अधिक विस्तारित पड़ोस पर ध्यान केंद्रित करने में निरंतरता हो सकता है। पर क्या दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के साथ संबंधों में गिरावट जारी रहेगी या फिर सरकार इस प्रवृत्ति को दूर करने का कोई विकल्प चुनेगी, यह अभी देखना बाकी है।

Editor’s note: To read this piece in English, please click here.

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Image 1: Press Information Bureau, India

Image 2: MEAphotogallery via Flickr

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Husanjot Chahal

Husanjot Chahal

Husanjot Chahal is a graduate student at Georgetown University's Security Studies Program. Prior to this, she was a researcher and program coordinator at the Institute of Peace and Conflict Studies and worked at the Institute for Defence Studies and Analyses’ Internal Security Centre, both in New Delhi, India, exploring security issues in the South Asian region. She received a Master in International Security and Terrorism from the University of Nottingham and a Bachelor’s degree in Political Science from Lady Shri Ram College, University of Delhi.

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