ट्रम्प की दक्षिण एशिया संबंधी नीति क्या होनी चाहिए?

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डोनाल्ड ट्रम्प संयुक्त राज्य अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति निर्वाचित किये गए हैं। जबकि सामरिक समुदाय ने हिलेरी क्लिंटन की जीत की आशा व्यक्त की थी।  अब ट्रम्प अमरिकी राष्ट्रपति पद की ज़िम्मेदारी संभालेंगे। दुनिया भर की नजरें अमरिकी चुनाव पर थी, क्योंकि इसके परिणाम का प्रभाव दुनिया भर की नीतियों पर पड़ता है। दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत में तो इस चुनाव को कुछ ज्यादा ही बारीकी से देखा जा रहा था। इस क्षेत्र में राजनीति एवं सुरक्षा विशेष रूप से दांव पर थे। यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसकी बढ़ती गतिविधियाँ जैसे अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी खतरे, परमाणु हथियारों का विस्तार  और उभरती अर्थव्यवस्था आदि अमेरिका के लिए खतरा और अवसर दोनों प्रदान करते हैं। दुनिया की राजनीति में दक्षिण एशिया का सामरिक महत्व तेजी से बढ़ रहा है, और उपमहादीप में महत्वपूर्ण विकास वृद्धि (ग्रोथ) दर्ज करने के बाद, अंतरराष्ट्रीय मामलों में इस क्षेत्र का राजनीतिक और आर्थिक महत्व केंद्रीय है।  

क्षिण एशिया आगामी प्रशासन के हितों के लिए हाशिये पर नही हो सकता है, और इस तरह नीतिगत प्रभाव के साथ तीन बिन्दुयों पर अगले राष्ट्रपति को तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता होगी: भू-राजनीतिक परिवर्तन, आर्थिक अवसर, और परमाणु प्रतिद्वंद्विता।

भू राजनीतिक परिवर्तन

उपमहादीप कश्मीर और भारत-चीन संबंधी सीमा के विवादों से ग्रस्त है। हिंद महासागर में चीन की बढती उपस्थिति और प्रभाव के कारण क्षेत्र स्पष्ट प्रतिवाद का सामना कर रहा है। चूँकि दक्षिण एशियाई देश वैश्विक मंच से अमरिकी उपस्थिति की कमी की संभावनाओं को लेकर काफी चिंतित हैं, इसलिए आगामी प्रशासन को क्षेत्र में अपने सहयोगियों को आश्वस्त करना होगा कि अमेरिका अपनी प्रतिबद्धता कम नहीं करेगा। भारत-प्रशांत क्षेत्र में अमरिकी भूमिका की वापसी के खतरनाक परिणाम होंगे। हिन्द महासागर क्षेत्र पारंपरिक सुरक्षा के खतरों से घिरा हुआ है। वर्तमान सुरक्षा मैकेनिज्म में कमी की पहचान करते हुए एक मज़बूत समुद्री सहयोग और गठबंधन के निर्माण की तत्काल आवश्यकता है। द्विपक्षीय मामले में हिंद महासागर पर मशवरा करने का भारत और अमेरिका का अच्छा ट्रैक रिकॉर्ड रहा है। हिंद महासागर में स्थिरता बनाए रखने में दोनों देशों की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रही है, और यह सुनिश्चित करना एकदम ज़रूरी होगा कि यह परमाणु हथियारों से मुक्त हों तथा ये भी कि सभी देश संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन सागर कानून (UNCLOS) का पालन करें। इसके अतिरिक्त, आगामी प्रशासन को अफगानिस्तान में सैन्य उपस्थिति बनाए रखने और तालिबान को दोबारा सत्ता में आने से रोकने के लिए क्षेत्र में अपने सहयोगियों के साथ मिलकर काम करना होगा

आर्थिक अवसर

दक्षिण एशियाई देशों को आर्थिक विकास का लंबा अनुभव रहा है। पिछले साल क्षेत्र का विकास 7 प्रतिशत रहा। दक्षिण एशियाई देशों ने उदारीकरण के माध्यम से व्यापार व्यवस्था में काफी प्रगति की है और धीरे-धीरे वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ खुद को एकीकृत कर रहा है। हालांकि, कुछ जायज़ आर्थिक चुनौतियाँ भी हैं जैसे अपर्याप्त प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) अंतर-क्षेत्रीय व्यापार की कमी और धीमी गति से वैश्विक एकीकरण। सवाल ये भी है कि इस क्षेत्र में चीन की आर्थिक विशाल शक्ति को दक्षिण एशियाई देश कैसे देखेंगे। व्यापार और निवेश के लिए दक्षिण एशियाई देशों कि चीन पर अधिक निर्भरता ने अवसर और चिंता दोनों पैदा की है, जैसे कि क्षेत्र के अधिकतर देश अब चीन के साथ व्यापारिक घाटे के शिकार हैं। अमेरिका को दक्षिण एशिया में ऐसी नीतियों को बढ़ावा देना होगा जो गहरी आर्थिक एकीकरण का रास्ता हमवार करे।   

परमाणु प्रतिद्वंद्विता

भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु हथियार डिलीवर करने वाली नई बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइल प्रणाली विकसित करने में लगे हुए हैं। सैन्य उद्देश्यों के लिए ये सारे देश विखंडनीय सामग्री के उत्पादन क्षमता का विस्तार कर रहे हैं। अपने-अपने परमाणु ज़खीरे के अलावा, पारंपरिक और परमाणु सिद्धांतों में व्यापक संशोधन,  विशेष रूप से पाकिस्तान के मामले में, साथ में विदेशी तकनीक की भारी आमद ने दक्षिण एशिया को निरंतर अस्थिरता की तरफ धकेल दिया है। नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के प्रशासन को चीन और चीन-पाकिस्तान गठजोड़ की भूमिका को समझना होगा जो दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सुरक्षा माहौल को ख़राब कर रहा है।

इन आर्थिक और सुरक्षा चुनौतियों पर आगामी प्रशासन को तत्काल ध्यान देने होगा। दक्षिण एशिया में ओबामा-शासन की नीतियों से ज्यदा अलगाव क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय सामरिक स्थिरता को ख़राब करेगा। दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन को बनाए रखने के लिए उचित होगा के ट्रम्प प्रशासन भारत के साथ द्विपक्षीय सामरिक साझेदारी को मज़बूत करे और विस्तार दे, विशेष रूप से आर्थिक और रक्षा परमाणु सहयोग।

Editor’s note: Click here to read this article in English.

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Image: Matt Johnson, Flickr

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Sylvia Mishra

Sylvia Mishra

Sylvia Mishra is a researcher with Observer Research Fpundation’s Strategic Studies Initiative, working on India's foreign and defense policy as well as US policy in Asia-Pacific. She has been selected as an Indian Opinion Leader for the Project Interchange Seminar in Israel (2016); emerging leader from India to participate in Australia India Youth Dialogue (2016) and is a member of an Expedition to Central Asia to promote Track-II Diplomacy supported by MEA-ICAF. She has presented papers at national and international conferences and has written for peer-reviewed journals and the media. She holds an MSc in International Relations from London School of Economics.

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