कश्मीर में एक और हिंसक गर्मी

कश्मीर को पर्यटकों के लिए “शांतिपूर्ण” दर्शाते हुए, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) सरकार ने इस मार्च श्रीनगर में ट्रैवल एजेंट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के ६४ वें वार्षिक सम्मेलन की मेजबानी की–१९८८ के बाद पहली बार ऐसा किया गया है। यह उम्मीद करते हुए कि यह गर्मी पिछले दो सालों की तुलना में अलग होगी, जो विरोध प्रदर्शनों और चरमपंथी गतिविधियों से ग्रस्त थीं, मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती ने कहा कि पर्यटन उद्योग कश्मीर के घावों को भरने में मदद कर सकता है। लेकिन दक्षिण कश्मीर में हालिया मुठभेड़, विशेष रूप से शोपियां जिले में जहां सुरक्षा बलों के साथ झड़प में २० लोग मारे गए और १५० से ज्यादा प्रदर्शनकारि घायल हुए, इस बात की चेतावनी हैं कि यह भविष्यवाणी जल्दबाजी में की गई है। घाटी में सुरक्षा स्थापित करने के लिए नई दिल्ली के कठोर दृष्टिकोण के बावजूद, कश्मीरी युवा तेज़ी से चरमपंथ के साथ जुड़ते जा रहे हैं, जिससे यह साफ़ है कि स्थिति २०१८ की गर्मी के महीनों में ज़रूर बिगड़ेगी। जब तक भारत बल के उपयोग के बिना घाटी में इस स्थिति का समाधान करने के लिए एक विश्वसनीय पहल तैयार नहीं करता, तब तक अशांति और हिंसा कश्मीर के भविष्य को परिभाषित करते रहेंगे।

दक्षिण कश्मीर में एक खूनी रविवार

१ अप्रैल को,  जिसको भारतीय लेफ्टिनेंट जनरल ए के भट्ट ने एक “विशेष दिन” कहा है, १३ कश्मीरी चरमपंथी, तीन सेना कर्मी, और चार नागरिक मारे गए। इन लोगों की मृत्यु भारतीय सेना कर्मियों और चरमपंथियों के बीच तीन मुठभेड़ की घटनाओं में हुईं, जिनमें दो घटनाएं शोपियां जिले में और तीसरी दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले में हुई। इन हत्याओं ने कश्मीरी युवा को सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने और उनकी उपस्थिति का विरोध करने के लिए प्रेरित किया। जब इन सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई, तो कई नागरिक घायल हुए, जिनमें चार की मौत की पुष्टि हुई; सैकड़ों लोगों को पैलेट गन का सामना करना पड़ा, जिसके कारण कई लोग अपनी दृष्टि खोने की कगार पर हैं।

इसके बाद जो कुछ हुआ वह सामान्य बन गया है: ज़िंदगी थम गई है, ज्यादातर व्यवसाय और शैक्षिक संस्थान बंद पड़े हैं। इंटरनेट और संचार सेवाएं भी निलंबित कर दी गई हैं। अधिकारियों ने कश्मीर में प्रतिबंध लगा दिया है क्योंकि चरमपंथियों की मौत और प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन के इस्तेमाल के विरोध में छात्रों और अलगाववादियों द्वारा प्रदर्शन पूरे श्रीनगर में फैल गए हैं। सार्वजनिक रूप से शांति का आह्वान करने से लेकर न अलगाववादियों को दिल्ली के साथ बातचीत के लिए बुलाने तक सारे विकल्प समाप्त कर लेने के बाद, अब राज्य सरकार के पास इस स्थिति को बेहतर बनाने के लिए कोई और रणनीति उपलब्ध नहीं है।

चरमपंथियों को मारना कश्मीर समस्या का हल नहीं

कश्मीर में रिपोर्टिंग से पता चलता है कि चरमपंथ के लिए समर्थन बढ़ता जा रहा है, जैसे जैसे उपेक्षा की भावना और भारत-विरोधी विचार बढ़ रहे हैं। पिछले साल की शुरुआत में, भारतीय सेना के चीफ बिप्पीन रावत ने चेतावनी दी थी कि जो प्रदर्शनकारि सेना के कार्यों में बाधा डालेंगे, उन्हें भी चरमपंथ माना जाएगा। फिर भी, पिछले दिनों की मुठभेड़ के दौरान विरोध प्रदर्शन और चरमपंथियों के अंतिम संस्कार में भारी भीड़ कश्मीर में चरमपंथ के लिए बढ़ते समर्थन के संकेत हैं।

इसे देखते हुए, १३ स्थानीय चरमपंथियों की मौत कश्मीरी युवा को चरमपंथ के रास्ते पर चलने से नहीं रोक सकती। वह हथियार उठाने और अपनी आस्था के लिए मरने को रोमानी दृष्टिकोण से देखते हैं, और मारे गए चरमपंथियों के अंतिम संस्कार में उमड़ी बड़ी भीड़ से इन आदर्शों को वैधता मिलती है। यह कश्मीर में चरमपंथ का अंत करने के भारत के प्रयासों के लिए अच्छा  नहीं है: २०१६ में, लगभग २०० चरमपंथी मारे गए। लेकिन एक अनुमान के अनुसार, करीब इसी संख्या में लोगों ने हथियार भी उठाए–यह दर्शाता है कि चरमपंथियों के विरुद्ध निरंतर ऑपरेशन और हमले उनकी गतिविधियों को रोकने में सफल नहीं हुए हैं।

इससे भी अधिक गंभीर बात यह है कि जो युवा इस लड़ाई से अतिसंवेदनशील है, कहा जा रहा है कि वे कश्मीर के शिक्षित और समृद्ध पृष्ठभूमि से आते हैं। इसका मतलब है कि वे तलवार को कलम से ज्यादा शक्तिशाली समझते हैं। उदाहरण के लिए, अलगाववादी पार्टी तहरीक-ए-हुर्रियत के हाल ही में चुने गए अध्यक्ष अश्रफ सेहराही के बेटे जुनैद अशरफ खान हिजबुल मुजाहिदीन से जुड़े हैं, और खबर है कि उन्हे अपने पिता का समर्थन मिला है। इसके अलावा, मन्नान वानी, जो उत्तर कश्मीर से एक विद्वान थे, उन शिक्षित युवा का एक और उदाहरण हैं जिन्होंने कलम छोड़ कर तलवार उठा ली है। जो लोग हिंसा को चल रहे गतिरोध का एकमात्र समाधान समझते हैं, उनको इन उदाहरणों से और भी बल मिलता है।

नई दिल्ली के पास क्या विकल्प हैं?

जैसे जैसे नई दिल्ली कश्मीर समस्या को हल करने के लिए बल के इस्तेमाल को बढ़ा रही है, वैसे वैसे घाटी की मुख्यधारा आवाजें दिन-ब-दिन शांत हो रही हैं। जैसा कि एक कश्मीरी पुलिस अधिकारी ने हाल ही में कहा, एक चरमपंथ की हत्या कई चरमपंथियों को जन्म दे रही है। आने वाली गर्मी में यह तय होगा कि चरमपंथियों की भर्ती और समग्र हिंसा के मामले में कश्मीर किस ओर जा रहा है। इससे पहले कि स्थिति हाथ से निकल जाए, नई दिल्ली को कश्मीर में अपनी प्रतिक्रिया पर पुनर्विचार करना होगा।अगर नई दिल्ली ऐसा नहीं करता है तो निश्चित रूप से युवा कश्मीरी पीढ़ी चरमपंथ की दिशा में आगे बढ़ जाएगी। यदि ऐसा होता है, तो १ अप्रैल के मुठभेड़ आने वाले महीनों और वर्षों की क्रूर वास्तविकता का अंदेशा हैं।

Editor’s note: To read this piece in English, please click here.

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Image 1: Austin Yoder via Flickr 

Image 2: NurPhoto via Getty

Posted in , Human Rights, Human Security, India, Kashmir, Militancy

Yaqoob ul Hassan

Yaqoob ul Hassan

Dr. Yaqoob ul Hassan is an SAV Visiting Fellow, January 2018. He received is Ph.D. from Jamia Millia Islamia in New Delhi, India and his thesis was on United States-Pakistan relations after 9/11. He was also a post-doc fellow in the Department of Political Science and International Relations at Istanbul University, Turkey. His research interests are the politics and security of Pakistan and Afghanistan, and Political Islam.

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