अमेरिका और तालिबान के बीच बातचीत: गतिरोध की समाप्ति या विद्रोह का प्रोत्साहन?

Editor’s Note: This article has been translated from its original English version by SAV staff. To read the original, please click here.

पिछले महिने, न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक रिपोर्ट में बताया कि ट्रम्प प्रशासन ने अपने शीर्ष राजनयिकों को तालिबान के साथ सीधी बातचीत करने का निर्देश दिया है। एक दिन बाद, कुछ मीडिया रिपोर्टों ने अफगानिस्तान के  रिसोल्यूट सपोर्ट बलों के राजनयक और अमेरिकी सेना के कमांडर जनरल जॉन निकोलसन को यह कहते हुए उद्धृत किया कि अमेरिका शांति वार्ता शुरू करने के लिए तालिबान के साथ सीधी बातचीत करने के लिए तैयार है। जबकि रिसोल्यूट सपोर्ट ने आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति में इस बात का तुरंत खंडन किया और कहा कि निकोलसन की टिप्पणियों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया था, तालिबान के प्रति अमेरिकी की दृष्टि में परिवर्तन आने की संभावना पर अफगानिस्तान और दूसरे देशों की प्रतिक्रियाएँ कुछ आशवादि नहीं थीं। इस संभावित परिवर्तन से शांति प्रक्रिया में जो नई ऊर्जा पैदा होने की उम्मीद की जा रही थी उसकी तुलना में बुरे प्रभाव पैदा होने की चिंताएं अधिक हैं। सीधी बातचीत का मतलब यह होगा कि अमेरिका तालिबान को केवल एक विद्रोही समूह नहीं मानती और इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि इससे शांति प्रक्रिया में अफगान सरकार की भूमिका कम हो जाए।

अफगानिस्तान के भीतर और बाहर क्या प्रतिक्रियाएँ रहीं?

अफगान हाई पीस काउंसिल ने ट्रम्प प्रशासन के इस निर्णय का स्वागत किया और कहा कि यह शांति प्रक्रिया की ओर एक कदम है। परंतु काउंसिल ने यह भी कहा कि वार्ता अफगान नेतृत्व के तहत होनी चाहिए। स्थानीय समाचार के अनुसार, अफगान राष्ट्रपति भवन और अफगान सीनेट ने भी तालिबान के साथ शांति वार्ता में अफगान नेतृत्व के महत्व पर बल दिया और यह संकेत दिया कि अफगान सरकार में यह चिंताएं हैं कि कहीं उनको अमेरिका और तालिबान की बातचीत से बाहर न रखा जाए या फिर उन्हें कोई सीमांत भूमिका न दी जाए। पर अफगानिस्तान के बाहर, ट्रम्प प्रशासन के निर्णय को कुछ अधिक समर्थन प्राप्त नही हुआ है–केवल अफ़ग़ानिस्तान में यूनाइटेड किंगडम के राजदूत ने इस निर्णय को एक महत्वपूर्ण और स्वागतयुग कदम बताया

तालिबान ने अभी तक इस घटना पर अपना आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दिया है। लेकिन कुछ रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि तालिबान इस शांति प्रक्रिया को सकारात्मक  कदम के रूप में देख सकता है, इस शर्त के साथ कि शांति प्रक्रिया पर चर्चा करने से पहले अफगानिस्तान से विदेशी सैनिकों वापस लौट जाएंगे।  तालिबान ने अमेरिका के साथ सीधे वार्ता की मांग बहुत पहले फरवरी में की थी–तालिबान ने एक पत्र लिखा था में अमेरिकी लोगों और शांतिप्रिय कांग्रेस से आग्रह किया था कि वह ट्रम्प प्रशासन पर उनसे सीधी बातचीत करते के लिए दबाव डालें ताकि अफगानिस्तान में युद्ध समाप्त किया जा सके। इस प्रस्ताव को अफगान सरकार ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी लेकिन अमेरिका की तरफ से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं मिली।

किसकी जीत, किसकी हार?

यह आशा रखना कि इस संभावित परिवर्तन से अफगानिस्तान में लंबे समय से चले आ रहे गतिरोध को हल करने में सफलता प्राप्त होगा, यह अभी संदेह और अनिश्चितता से घिरी है। इस तरह के किसी भी कदम से तालिबान और साहसी हो जाएगा और उसे अपनी शक्ति और इस धारणा को आगे बढ़ाने में आत्मविश्वास प्राप्त हो जाएगा कि अमेरिका पूरी तरह से निराश न सही लेकिन युद्ध से घबराया हुआ है।

राष्ट्रपति घनी और राष्ट्रपति ट्रम्प दोनों शांतिपूर्ण वार्ता पर लगातार बल दे रहे हैं क्योंकि दोनों का यह प्रयास हो के अफगानिस्तान में शांति लाना वह अपनी मुख्य विरासत बनाएं और अगले राष्ट्रपति अभियान  के दौरान इसको अपनी सफलता के रूप में गिना सकें। शांति वार्ता पर राष्ट्रपति घनी के उत्साह के तीन व्यावहारिक कारण हैं। सबसे पहले, उनको उम्मीद है कि अफगानिस्तान में ४० साल तक चलने वाली युद्ध को समाप्त करने वाले नेता के रूप में जाने जाएँ–उन्होंने अपने एक लेख में भी इसका संकेत दिया। दूसरा कारण यह है कि तालिबान से समर्थन प्राप्त करके, घनी  २०१९ के चुनाव में अपने निर्वाचन क्षेत्र का विस्तार करने में सक्षम हो सकते हैं, इस प्रकार उन्हें भारी जीत मिल सकती है। तीसरा यह है कि शांति वार्ता घनी की अन्यथा बुरी विरासत को छुपा सकती है–घनी के कार्यकाल में तालिबान को क्षेत्रीय लाभ मिला, अफगानिस्तान की गरीबी और ड्रग उत्पादन में बढ़ोतरी हुई, और संसदीय चुनावों में तीन साल की देरी के कारण अफगान सुरक्षा बलों की मृत्यु संख्या अधिक रही। पर यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि क्या घनी शांति वार्ता  का लाभ अफगान-स्वामित्व और अफगान-नेतृत्व के रूप में उठा पाते हैं, जिसे अमेरिका और तालिबान के बीच सीधी बातचीत से खतरा हो सकता है। अगर इस प्रक्रिया के दौरान अफगानिस्तान को अलग रखा गया तो यह राष्ट्रपति घनी के चुनावी अभियान के लिए  बड़ा राजनीतिक नुकसान हो सकता है।

राष्ट्रपति ट्रम्प भी अमेरिका के सबसे लंबे युद्ध को दो कारणों से बातचीत के द्वारा समाप्त करना चाहते हैं। पहला, राष्ट्रपति घनी की तरह वह भी यह चाहते हैं कि उनको भी इस रूप में याद किया जाए कि उन्होंने वार्ता के माध्यम से सबसे लंबे समय तक चलने वाले अमेरिकी युद्ध को समाप्त किया। अमेरिका अब  इस तरह के युद्ध से तंग आ चुकी है जिसमें अनावश्यक लागत लगता हो और जिसे वह अब सह नही सकती। उनके लिए यह सुनना निराशाजनक है कि १७ वर्षों तक लड़ने और कुछ अनुमानों के अनुसार करोड़ों डॉलर खर्च करने के बाद भी तालिबान पहले से और शक्तिशाली है। इतने लंबे समय तक चलने वाले युद्ध को समाप्त करने से २०२० में ट्रम्प की चुनावी संभावनाओं को लाभ मिलेगा।

ऐसा लगता है कि इस नए अमेरिकी निर्णय का एकमात्र विजेता तालिबान और उनके क्षेत्रीय समर्थक हैं। अमेरिकी सरकार और तालिबान के बीच शांति वार्ता  से अनिवार्य रूप से यह संदेशा जाएगा कि तालिबान एक समानांतर सरकार है, न कि एक विद्रोही समूह,और इस प्रकार अफगान सरकार की भूमिका कमजोर हो जाएगी। तालिबान को इसी की उम्मीद थी। तालिबान को पता है कि वे एक हमलावर सेना की सैन्य शक्ति के सामने नहीं टिक सकते, इसलिए उन्होंने यह साबित करने का प्रयास किया है कि अमेरिका उन्हें सैन्य रूप से पराजित नहीं कर सकता है।तालिबान ने इतनी शक्ति जुटाई है की वह अमेरिका से यह मनवा सके की अफगानिस्तान में गतिरोध की स्थिति है और इसलिए अमेरिका तालिबान के साथ सीधी बातचीत की कागार पर ले आया है।

शांति वार्ता का भविषय

रिपोर्टों से पता चलता है कि अफगान सरकार तालिबान के साथ वार्ता शुरू करने की उम्मीद से अगस्त में ईद-उल-अजहा के दौरान एक और युद्धविराम की घोषणा करने की योजना बना रही है। यह योजना ईद-उल फ़ितर युद्धविराम के बाद के इस निष्कर्ष से प्रेरित हो सकता है कि शांति वार्ता पहुँच के भीतर है और एक और युद्धविराम सभी समूहों को वार्ता के और पास ला सकता है। लेकिन यह निष्कर्ष बहुत ही अनुभवहीन है क्योंकि यह आकलन लगाना कठिन है कि ईद-उल फ़ितर युद्धविराम से वास्तव में शांति प्रक्रिया को कितना लाभ हुआ था। सच तो यह है कि उसके नुकसान धीरे-धीरे स्पष्ट हो रहे हैं। इस तरह के युद्धविरामों पर बल देने  से केवल अफगान सरकार की कमजोरी दिखेगी और तालिबान को और साहस मिलेगा।

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Image 1: Wikimedia Commons via Aslan Media, Flickr

Image 2: Brendan Smialowski/AFP via Getty Images

Posted in , Afghanistan, Extremism, Geopolitics, Internal Security, Militancy, Negotiations, Peace, Security, Terrorism

Bismellah Alizada

Bismellah Alizada

Bismellah Alizada is the co-founder of Rahila Foundation, an organization working for youth empowerment through education and capacity building, and Deputy Director (on academic sabbatical) at Organization for Policy Research and Development Studies (DROPS), a research and advocacy organization based in Kabul. He is currently pursuing an MSc in Violence, Conflict and Development at SOAS, University of London. His articles have appeared on Al Jazeera English, The Diplomat, Global Voices, and the Institute of Peace and Conflict Studies (IPCS) in New Delhi. He has also co-translated into Persian the book China in the 21st Century: What Everyone Needs to Know.

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