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भविष्य की छवि बांग्लादेशी विश्वविद्यालयों के छात्रावासों में दस्तक दे रही है। हाल ही में, ढाका विश्वद्यालय और तीन दूसरे बड़े सार्वजनिक संस्थानों में इस्लामी जमात-ए-इस्लामी के छात्र वर्ग इस्लामी छात्र शिबिर (इसके बाद शिबिर) से जुड़े छात्र संघ के उम्मीदवारों की बड़ी जीत, देश के राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़े परिवर्तन का संकेत है।

शिबिर ने ये जीतें उन जगहों में प्राप्त की हैं जिन्हें लम्बी अवधि से धर्म निरपेक्षता का गढ़ माना जाता रहा है| ये चुनाव एक ऐतहासिक मील का पत्थर साबित हुए हैं: 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता के उपरांत, शिबिर ने पहली बार ढाका विश्वविद्यालय छात्र संघ के चुनावों में अपना सिक्का जमाया है, और नेतृत्व ग्रहण करने के समेत 28 में से 23 पदों पर कब्ज़ा कर लिया है। जहांगीरनगर विश्वविद्यालय में भी शिबिर का ऐसा ही वर्चस्व दिखा, जहां शिबिर के पैनल ने 25 में से 20 सीटें जीतीं, और चटगांव विश्वविद्यालय में, 44 साल तक नेतृत्व से दूर रहने के बाद 26 में से 24 उम्मीदवार पदासीन हुए| राजशाही विश्वविद्यालय में भी, समूह ने 23 में से 20 पद ग्रहण किए, जिससे ज्ञात होता है कि इस्लामिस्ट लहर ने समस्त देश में छात्र राजनीति को पूर्ण रूप से बदल कर दिया है।

परंतु, इन चुनावी परिणामों को केवल इस्लामिस्टों की विजय नहीं समझना चाहिए, एवं इन परिणामों को राष्ट्रीय चुनावों का प्रतिबिंब समझना भी ग़लत मान्य होगा| शिबिर की विजय प्रभावशाली परिवर्तन के लिए जनमत और देश के सबसे युवा मतदातों की बांग्लादेशी अभिकर्तृत्व की इच्छा को प्रदर्शित करता है, न कि उनके धार्मिक जागृति की अपेक्षा को। बांग्लादेश की आगे की राजनैतिक दिशा को परिकल्पित करने हेतु, ढाका, नई दिल्ली, वाशिंगटन और दूसरे स्थानों पर नीति निर्माणकारों को न केवल यह देखना चाहिए कि कौन से उम्मीदवार विजयी होते हैं, बल्कि इन कारणों पर भी चर्चा करनी चाहिए कि वे चुनाव किस बिनाह पर जीतते हैं| इसके अतिरिक्त, उन्हें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि बांग्लादेशी युवाओं को कैसे जोड़ा जाए, एवं इस विषय पर भी ठोस सबक लेना चाहिए|

विश्वविद्यालयों के परिसरों से संकेत: सिद्धांतवाद से अधिक महत्वपूर्ण गरिमा

इस पल के महत्व को समझने के लिए, जुलाई 2024 में वापस जाना चाहिए| इस सन्दर्भ में, नागरिक सेवा में कोटा को लेकर छात्रों की अगुवाई में हुआ विद्रोह शेख हसीना के राज में 16 साल से चल रही तानाशाही के विरुद्ध एक बड़ी बग़ावत में तबदील हो गया। 5 अगस्त 2024 तक, हसीना ने त्याग पत्र दे दिया और भाग गईं और कुछ ही दिनों में, नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस ने अंतरिम सरकार चलाने और बांग्लादेश को 2026 तक चुनाव की ओर अग्रसर करने हेतु मुख्य सलाहकार के तौर पर पदभार संभाला।

“शिबिर की विजय प्रभावशाली परिवर्तन के लिए जनमत और देश के सबसे युवा मतदातों की बांग्लादेशी अभिकर्तृत्व की इच्छा को प्रदर्शित करता है, न कि उनके धार्मिक जागृति की अपेक्षा को।”

यह परिवर्तन उथल-पुथल भरा परन्तु वास्तविक रहा है, और छात्र संघ चुनाव एक उच्च कोटि की राजनीतिक परीक्षा के समान थे। हालाँकि, ये चुनावी जीतें धर्मतंत्र की ओर तीव्रता का संकेत नहीं देती हैं। वे एक गहरी लहर को दर्शाती हैं: शहरी, पढ़े-लिखे युवाओं के द्वारा संप्रभुता एवं सम्मान हेतु मतदान, जो पुरानी व्यवस्था से असंतुष्ट है, और थोपे गए प्रभाव को संदेहजनक रूप से देखती है| शिबिर की चुनावी जीत प्रदर्शित करती है कि छात्रों ने हसीना के सत्तावाद शासन से जुड़े अपमानजनक और भ्रष्ट छात्र संगठनों को नकार दिया है, और शिबिर के अनुशासित, नैतिकता से परिपूर्ण प्लैटफ़ॉर्म को एक नए विकल्प के तौर पर अपनाया है| सिद्धांतों पर आधारित शासन और बाह्य बुद्धिजीवियों के दबदबे के विरोध का उनका संदेश, जिसे आम तौर पर हसीना सरकार को भारत के कथित समर्थन के तौर पर देखा गया, आत्मनिर्भर नेतृत्व की खोज कर रहे छात्रों ने पसंद किया है|

ढाका विश्वविद्यालय ने कट्टर इस्लामी वक्रपटुता को नज़रअंदाज़ किया और भिन्न-भिन्न प्रकार के गठबंधन बनाए, जिसमें चटगाँव पहाड़ी इलाके के अल्पसंख्यक छात्र को शामिल किया गया – यह इलाका बांग्लादेश के मुस्लिम-बहुल इलाके में अक्सर “दूसरा” माना जाता है। एक जातीय अल्पसंख्यक से एक ग़ैर मुसलमान और एक ग़ैर-हिजाब पहनने वाली महिला और विरोध प्रदर्शनों में घायल एक ग़ैर-पक्षपाती विद्यार्थी को शामिल करना, एक व्यावहारिक अभियान को प्रदर्शित करता है जो कट्टर इस्लामी विचारधारा के बजाय साझा निराशाओं के इर्द-गिर्द अलग-अलग गुटों को एकत्रित करने का कार्य करता है|

यह एक जानी-पहचानी कार्यशैली है। जब तानाशाही सरकारें लड़खड़ाती हैं, तो इस्लामिस्ट जड़ों वाले राजनैतिक दल, खुद को आवश्यकता एवं समय के अनुसार ढाल लेते हैं, अपनी वाणी में कोमलता ले आते हैं, और विरोधी जनता का मत प्राप्त करने हेतु अपने निवेदनों की मात्रा में वृद्धि करते हैं| मिस्र में क्रांति के उपरांत किए गए चुनावों में मुस्लिम ब्रदरहुड संगठन की सफलता, ट्यूनीशिया में प्रारंभिक चरणों के बदलाव में एन्नाहदा की बहुलता, और 2000 के दशक में तुर्किये की एकेपी की एक रूढ़िवादी लोकतांत्रिक ताक़त के तौर पर पुनः स्थापित करना, ये सभी एक जैसे रास्ते (निर्धारित) पथ पर चले। ये रास्ते न तो सीधे हैं और न ही पक्के, लेकिन वे एक सच्चाई को दर्शाते हैं: बांग्लादेश में विद्यार्थियों की चुनावी जीत एक व्यावहारिक गठबंधन की विजय का स्वरुप है, जो अपने दायरे को विकसित कर रही है एवं परिवर्तन की इच्छुक है, न कि किसी सोच अथवा विचारधारा का जनादेश का प्रतिबिम्ब है।

सह-विकल्प से जुड़े जोखिम

लेकिन, इससे इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि शिबिर की जीत का प्रयोग इसके अधिक रूढ़िवादी मूल संगठन, जमात-ए-इस्लामी, द्वारा रणनीतिक तरीके से नहीं किया जाएगा| तथापि, हाल ही में, इसने भ्रष्टाचार विरोधी रणनीतियों और अच्छे शासन की बातों पर ज़्यादा ध्यान दिया है, जमात एक पारंपरिक इस्लामी संगठन है जिसकी जड़ें सैयद अबुल अला मौदूदी की शरिया के सिद्धांतों के अनुसार चलने वाले नैतिक राज्य की खोज में हैं, जिसे नेक व्यक्ति अग्रसर करेंगे| लेकिन, जमात-ए-इस्लामी ने अभी तक यह अंदेशा नहीं दिया है कि अगर वे सत्तारूढ़ होते हैं, तो वे इस्लामीकरण को किस प्रकार की दिशा प्रदान करेंगे: अधिक कट्टर, रूढ़िवादी या उनका एक समानार्थी पूर्ण मिश्रण| इसलिए, यदि ये छात्र सर्वेक्षण इस बात का संकेत है कि जमात बांग्लादेशी राजनीति में एक असरदार खिलाड़ी बन सकता है या अगले वर्ष के राष्ट्रीय चुनावों में विजय प्राप्त करने की साख रख सकता है, तो घरेलू और अंतरराष्ट्रीय जानकारों को इस पर ध्यान देना चाहिए।

जमात के घोषणापत्र में अभी भी बांग्लादेश के संवैधानिक प्रणाली के स्थान पर शरिया राज लाने का आशय अन्तर्निहित है। साथ ही, जमात के कई वरिष्ठ नेताओं पर 1971 के युद्ध अपराधों के आरोप हैं, जिन्हें जमात पिछले सरकार के बदलने के उपरांत भी क़ानूनी तौर पर ग़लत सिद्ध करने में नाकाम रही है। तीसरी और सबसे चिंताजनक बात यह है कि जमात के कुछ नेताओं ने देश में इस्लामिक विधि प्रणाली लागू करने की अपनी अपेक्षाओं के बारे में उलटे-सीधे बयान दिए हैं, जिससे बांग्लादेश में सबको साथ लेकर चलने वाले, और लोकतंत्र के भविष्य को लेकर विभिन्न प्रकार की चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं|

पश्चिमी और क्षेत्रीय कलन

पश्चिम के लिए, बांग्लादेश कोई परिधीय चिंता का विषय नहीं होना चाहिए| बांग्लादेश एक मुसलमान बहुल देश है जिसकी जनसंख्या 175 मिलियन है, जिसमें से 28 प्रतिशत जनसंख्या 10 से 25 वर्ष की आयु के बीच की है। यह बंगाल की खाड़ी के मुहाने पर बसा है, जो भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया को जोड़ता है और साथ ही चीनी निवेश और असर को भी झेलता है। बांग्लादेश वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा है, गंभीर जलवायु जोखिम का सामना कर रहा है, और म्यांमार में बढ़ते गृह युद्ध के बीच लगभग दस लाख रोहिंग्या शरणार्थी यहाँ निवास रहे हैं। इसलिए, अगर बांग्लादेश में पश्चिम की दिलचस्पी एक अस्थिर क्षेत्र में एक बहुवचन, लोकतांत्रिक, उन्मुक्त और विश्व से जुड़े हुए देश के रूप में है, तो उसे देश में जो भी राजनीतिक दल सत्ता में है, उससे जुड़ने के बारे में गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है।

इस क्षेत्र में दूसरे स्थानों पर हिसाब अलग हो सकता है। भारत, जिसका बांग्लादेश के साथ 4,000 किलोमीटर (2,500 मील) से अधिक लंबी सीमा है और सालाना लगभग USD $13 बिलियन का व्यापार होता है, वह अपने पुराने साझेदार, अवामी लीग की तरफ़ खिंचा हुआ महसूस कर सकता है। यह सोच भारत के लिए नकारात्मक सिद्ध हो सकती है| कई बांग्लादेशी पहले से ही नई दिल्ली को अवामी लीग का बाह्य संरक्षक मानते हैं, जो हसीना को पनाह दे रहा है – जो अब पिछले अगस्त में प्रदर्शनकारियों पर हिंसक कार्यवाही का आदेश देने के आरोप में ढाका के एक न्यायालय में वांछित हैं। ऐसे समय में, दखल न देने का सार्वजनिक वादा—और बांग्लादेश के राजनीतिक वर्णक्रम में चुपचाप, बराबरी से वार्तालाप — एक स्थिर, बहुलवादी, और आर्थिक रूप से जुड़े हुए पड़ोसी के तौर पर भारत के हितों को सुरक्षित करने में कहीं अधिक सहायता प्रदान करेगा। इस महीने रूस का सीरिया के नए अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा का स्वागत करने का निर्णय, जबकि निष्कसित बशर अल-असद अभी भी उनकी मेज़बानी में हैं, एक उदाहरण प्रदान करता है: परिणामों को तय किए बिना संबंधों को संभालना। इसी प्रकार से ढाका में राजनीतिक परिदृश्य को संभालने के लिए नई दिल्ली को भी पक्षपात के बजाय, ढाका के सन्दर्भ में, व्यावहारिक सोच को महत्ता देनी होगी।

म्यांमार का गृहयुद्ध, विशेष रूप से, रखाइन में, इस मामले को और अधिक गंभीरता प्रदान करता है| इस गृहयुद्ध की वजह से शरणार्थी और ग़ैर कानूनी तत्व बांग्लादेश और भारत के उत्तर-पूरब की ओर कूँच कर रहे हैं| ढाका, नई दिल्ली और पश्चिमी साझेदारों को सीमा प्रबंधन, मानवीय योजना और उन ग्रे-ज़ोन खतरों से निपटने के लिए मिलकर काम करने की आवश्यकता है जो नागरिक सेना (militia) को प्रबलता प्रदान करती है, क्योंकि उपेक्षित किए गए शिविर भर्तीकर्ता और तस्करों के लिए पनपने की जगह बन जाते हैं। कॉक्स बाज़ार और भासन चार, जहाँ रोहिंग्या शरणार्थी अधिक मात्रा में निवास करते हैं, इस स्थान को स्थिर करना न केवल मानवीय बल्कि क्षेत्रीय जोखिम को कम करने का भी एक साधन है।

“क्षेत्रीय एवं वैश्विक शक्तियों के लिए उपयुक्त विधि यह है कि वे बांग्लादेशी राजनीतिक नेताओं के साथ व्यावहारिक रूप से संलग्न हो, वैचारिक शुद्धता के बजाय नरमी को बढ़ावा दें और प्रदर्शन को पुरस्कृत करें|”

बांग्लादेश के साथ यह जुड़ाव विशेष रूप से इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि बेजिंग ढाका में किसी भी सरकार को बुनियादी ढांचे के वित्तपोषण और बंदरगाह परियोजनाओं के लिए मना लेगा। असल में, जुलाई 2024 के विद्रोह के बाद, चीन ने बांग्लादेश के सभी बड़े राजनीतिक नेताओं को सीसीपी मुख्यालय आने का न्योता दिया; और उन सभी ने बिना किसी हिचकिचाहट के यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया|

बचाव चाहने वाले देश की सुरक्षा

इन चुनावों का मुख्य संदेश यह है कि युवा बांग्लादेशी अपना भविष्य स्वयं सुनीश्चित करने का अवसर ढूंढ रहे हैं। यदि पश्चिम या भारत, पक्षपात की राजनीति में संलग्न होते हैं, तो वे बांग्लादेशियों के दृष्टिकोण से, ऐसे आख्यान को सुदृढता प्राप्त होती है, जिसके अंतर्गत, ऐसा परिचालित होता है कि पश्चिम और भारत दोनों बांग्लादेश के प्रति तटस्थता का अभ्यास नहीं कर रहे हैं| यदि वे हितधारकों की तरह कार्य करते हैं—संस्थान, जवाबदेही और आर्थिक एकीकरण को प्राथमिकता देते हैं—तो वे 2026 में जो भी गठबंधन उभरेगा, उसके अंतर्गत समभाव के लिए पुरस्कार में वृद्धि कर सकते हैं| कार्य बांग्लादेश की दलों को आदर्शवादी रूप से प्रतिबिंबित करना नहीं है, बल्कि तात्पर्य को उद्देश्य से पृथक करना है|

यदि लक्ष्य दक्षिण एशिया और हिंदी प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन स्थापित करना है, तो क्षेत्रीय एवं वैश्विक शक्तियों के लिए उपयुक्त विधि यह है कि वे बांग्लादेशी राजनीतिक नेताओं के साथ व्यावहारिक रूप से संलग्न हो, वैचारिक शुद्धता के बजाय नरमी को बढ़ावा दें और प्रदर्शन को पुरस्कृत करें| अंतर्राष्ट्रीय नीति को समर्थन, चाहे वह राजस्व डिजिटलीकरण, पत्तन उन्नयन, अथवा स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं के लिए हो, पारदर्शी, मापनीय शासन परिणामों से उसे संलग्न करना चाहिए, तथा उसे तृतीय-पक्ष अंकेक्षण से सत्यापित करना चाहिए| रोहिंग्या के लिए व्यक्तिगत सहायता को बहु-वर्षीय प्रतिबद्धता में परिवर्तित करना चाहिए, जिसमें स्वास्थय, शिक्षा और शिविरों की सुरक्षा सम्मिलित हो| साथ ही, म्यांमार के युद्धरत गुटों और उनके समर्थकों पर कूटनीतिक दबाव डालना चाहिए ताकि वे स्वैच्छिक प्रत्यावर्तन कर सकें। आतंकवाद का मुक़ाबला, तस्करी और तटीय सुरक्षा पर सहयोग और गहरा होना चाहिए, जिसके अंतर्गत भड़कीले या चौकस हिंसा के  साफ़ परिणाम हों।

इसका उद्देश्य विजेताओं का चयन नहीं है, बल्कि नियमों पर आधारित, सक्षम शासन प्रणाली को विभाजनीय सांस्कृतिक युद्ध से अधिक लाभदायक सिद्ध करना है| यदि जमात से जुड़े गठबंधन 2026 के चुनावों पर अपनी छाप छोड़ते हैं, तो परस्पर लाभ का आंकलन और साफ़ जवाबदेही अत्यावश्यक सिद्ध होगी| नरमपंथियों का सम्मेलन तभी होता है जब संस्थाएं और हित, लोगों को बड़े गठबंधन बनाए रखने के लिए करती हैं| पश्चिम ऐसी संस्थाओं को प्रबलता प्रदान करके और उन साझा हितों को जोड़कर सहायता कर सकता है – विशेष रूप से, इसलिए, क्योंकि जमात के लिए, पश्चिम के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी चीन के साथ, सानिध्य स्थापित करने का लालच अत्यधिक है। जमात के सभी बड़े नेताओं ने—जिसमें राष्ट्रपति भी शामिल हैं—इस जुलाई में चीन का लंबा दौरा किया, और सीसीपी नेताओं के विकल्प देने का तात्पर्य होगा भूमि पट्टन पर सीमा शुल्क मानक को पक्का करना, आर्थिक समझौतों को को पक्की समय सरणी के अंतर्गत ले आना, और जापान जैसे साझेदारों के साथ वित्तीय परियोजनाओं को समायोजित करना ताकि पश्चिम एवं भारत भरोसेमंद साथी बन सकें, न कि आंतरायिक आलोचक|

छात्र-संघ के इन परिणामों को जल्द ही होने वाले इस्लामिस्ट कब्ज़े का संकेतक समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। अपितु ये फरवरी में होने वाले संसदीय चुनावों का प्रारंभ नहीं हैं, और न ही ये इस बात का संकेत है कि बांग्लादेशी समाज धार्मिक शासन की ओर मुड़ गया है। बल्कि, ये सालों के दबाव के बाद बांग्लादेशियों की निष्पक्षता और स्वायत्तता की इच्छा को दर्शाता है| देश के युवाओं से वहीं मिलकर, जहाँ वे हैं, बाह्य शक्तियाँ इस लोकतांत्रिक पथ को सक्षमता और सबको साथ लेकर चलने प्रवृत्ति की ओर दिशा प्रदान कर सकती हैं, न कि उन नैतिक तथ्यों की ओर, जिन्होंने पहले भी कई परिवर्तनशील बदलावों की चेष्टा को निष्क्रिय कर दिया है|

This article is a translation. Click here to read the original article in English.

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