पिछले महीने, ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने मुंबई में 125 सदस्यों वाले एक व्यापार प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व किया, जो पहले कभी नहीं हुआ। यह भारत-यूनाइटेड किंगडम व्यापक आर्थिक व्यापार समझौता (सीईटीए) पर आधारित था, जिस पर तीन महीने पहले भारतीय प्रधानमंत्री मोदी की लंदन यात्रा के दौरान हस्ताक्षरित किया गया था। भारत की अपनी पहली आधिकारिक यात्रा के लिए, स्टारमर ने नई दिल्ली के राजनीतिक वैभव को दरकिनार करते हुए देश की वित्तीय राजधानी में अपनी यात्रा की शुरुआत, ऐसे समय में की जब संयुक्त राज्य अमेरिका की व्यापार नीति ने ज़बरदस्त भू-आर्थिक विखंडन के दौर को पैदा किया है।
डाउनिंग स्ट्रीट ने भारत के साथ इस साझेदारी को ब्रेक्सिट के उपरांत की अपनी आर्थिक रणनीति का आधार माना है। यूरोपियन संघ से ब्रिटेन के निकास के उपरांत, एक के बाद एक ब्रिटिश सरकारों — जॉनसन, ट्रस, सुनक, और अब स्टारमर — ने परस्पर भारत के साथ गहरे संबंध स्थापित करने, हिन्द प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा को प्रबलता प्रदान करने, एवं व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने को प्राथमिकता दी है, जो दोनों देशों के बीच एक “जीवित पुल” का कार्य करते हैं। स्टार्मर मुंबई से पक्के नतीजों के साथ लौटे: £1.3 बिलियन ($1.7 बिलियन) के नए भारतीय निवेश के वादों से प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी और शिक्षा में 10,000 से अधिक नौकरियाँ पैदा होने की उम्मीद है।
भारत में, इस दौरे से घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दर्शकों को एक मज़बूत संदेश मिला कि संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारतीय अर्थव्यवस्था को “मृत” घोषित करने के बावजूद, भारत की वैश्विक आर्थिक पकड़ मज़बूत बनी हुई है। कई वर्षों तक परिश्रम एवं बहुस्तरीय वार्ता करने के उपरांत, इस सौदे ने अंतरराष्ट्रीय साझेदारों को यह संकेत दिया है कि भारत विकसित अर्थव्यवस्था के लिए अपने बाज़ार खोलने हेतु तेज़ी से तत्पर है। इस घनिष्ठ होती साझेदारी का रणनीतिक तर्क अंतरराष्ट्रीय राजनीति के बदलते हालात से चलता है: जिस समय भारत बढ़ते आर्थिक राष्ट्रवाद और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच सामरिक स्वायत्तता को क़ायम रखने के प्रयत्न कर रहा है, उसी वक़्त, यूके आपसी आर्थिक विकास, रक्षा सहयोग और तकनीकी नवाचार पर केंद्रित एक आवश्यक मध्य शक्ति साझेदार के रूप में खुद को प्रस्तुत कर रहा है|
आधार: व्यापार तथा प्रौद्योगिकी
मुंबई दौरे में स्टार्मर की कार्य सूची में सबसे ऊपर सीईटीए को लागू करने की शुरुआत करना था। लंदन में इसे ब्रेक्सिट के उपरांत “यूके का सबसे बड़ा और आर्थिक रूप से सबसे अहम द्विपक्षीय व्यापार सौदा” और “भारत का अब तक का सबसे अच्छा सौदा” बताया गया। उनका आपसी व्यापार, जो अभी लगभग $56 बिलियन है, अगले पाँच सालों में दोगुना होने की उम्मीद है, इस समझौते से यूके और भारत की सकल घरेलू उत्पाद में प्रति वर्ष क्रमशः 0.13% और 0.06% की बढ़ोतरी होगी। इस सौदे के अंतर्गत, यूके का 85 प्रतिशत निर्यात – व्हिस्की और कृषि सामग्री से लेकर एयरोस्पेस उपकरण तक के उत्पाद भारत में बिना किसी प्रशुल्क दर के आयातित होंगे, जबकि 99 प्रतिशत भारतीय निर्यात पर यूके में कोई शुल्क नहीं लगेगा| इस दौरे में दोनों वैश्विक वित्तीय प्रौद्योगिकी हॉटस्पॉट के बीच एक “फिनटेक कॉरिडोर” भी निर्मित किया गया ताकि सीमा पार भुगतान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) द्वारा निर्मित वित्तीय सेवाओं का विकास किया जा सके| यूके कई विश्वविद्यालयों को भारत में परिसर खोलने की अनुमति मिली, और स्टार्मर ने भारत के बड़े चलचित्र उद्योग को यूके में “बॉलीब्रिट” चलचित्रों को निर्मित करने हेतु आमंत्रित भी किया|
“जिस समय भारत बढ़ते आर्थिक राष्ट्रवाद और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच सामरिक स्वायत्तता को क़ायम रखने के प्रयत्न कर रहा है, उसी वक़्त, यूके आपसी आर्थिक विकास, रक्षा सहयोग और तकनीकी नवाचार पर केंद्रित एक आवश्यक मध्य शक्ति साझेदार के रूप में खुद को प्रस्तुत कर रहा है|”
उभरती हुई प्रौद्योगिकी साझेदारी भी एक महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरा है, एवं नई दिल्ली और लंदन इस दिशा में अपनी साझेदारी को सुरक्षा के दृष्टिकोण से देख रहे हैं। महत्वाकांक्षी हैं| भारत- यूके दृष्टि 2035 का एक हिस्सा, प्रौद्योगिकी सहयोग में अत्यावश्यक खनिज पदार्थ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) क्वांटम, दूरसंचार, चिप्स, जैव प्रौद्योगिकी और उन्नत सामग्री में निवेश के अवसर और अनुसंधान साझेदारी सम्मिलित हैं। स्थापना के केवल एक वर्ष पश्चात, इस साझेदारी ने पहले ही एआई, ग़ैर स्थलीय मंडली और साइबर सुरक्षा पर संयुक्त केंद्रों और महत्वपूर्ण खनिज आपूर्ति श्रृंखलाओं में निवेश विकसित करने हेतु एक समूह भी स्थापित किया गया है| विशेष रूप से, नई दिल्ली की एकमात्र अन्य तकनीकी साझेदारी जो रणनीतिक आशय में इतनी गहराई से अन्तर्निहित है एवं जिसका नेतृत्व दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार कर रहे हैं, वह वाशिंगटन के साथ है, जो संयुक्त राष्ट्र अमेरिका- भारत भरोसा (“रणनीतिक प्रौद्योगिकी का उपयोग कर संबंधों को परिवर्तित करना”) के अंतर्गत परिकल्पित है, जो बाइडेन-युग की प्रभावशाली और उभरती प्रौद्योगिकी पर यूएस-भारत पहल (आईसीईटी) का उत्तराधिकारी है।
बढ़ते रक्षा संबंध
रक्षा में सहयोग दोनों देशों के संबंधों का एक और आवश्यक पहलू है। दृष्टि 2035 के हिस्से के तौर पर, भारत और यूके 10 वर्ष का रक्षा औद्योगिक मानचित्र अपनाने की दिशा में कार्यरत हैं। यह मानचित्र मोदी सरकार के “आत्मनिर्भरता” और “मेक इन इंडिया” लक्ष्यों के अनुसार, उपार्जन के बजाय सह-उत्पादन पर प्रबल ज़ोर देता है। स्टार्मर के दौरे के समय दो प्रमुख रक्षा सौदों की घोषणा की गई: भारतीय नौसेना प्लेटफॉर्मों के लिए समुद्री विद्युत प्रणोदन प्रणाली का संयुक्त विकास, और भारतीय सेना को यूके में निर्मित हल्के भार वाली बहु-भूमिका प्रक्षेपास्त्र उपलब्ध करवाने के लिए £350 मिलियन ($461 मिलियन) का सौदा भी किया गया है।
यह दौरा शाही नौसेना के कैरियर स्ट्राइक ग्रुप के पश्चिमी हिंद महासागर में भारतीय नौसेना के साथ कोंकण अभ्यास करने के समय हुआ। इतिहास में यह पहली बार था जब ब्रिटेन और भारत के कैरियर स्ट्राइक ग्रुप ने एक साथ किसी अभ्यास में हिस्सा लिया। यह विकास 2021 में हिंद महासागर में यूके कैरियर स्ट्राइक ग्रुप की तैनाती के उपरांत हुआ है, जब यूके ने औपचारिक रूप से हिंद प्रशांत क्षेत्र की ओर अपने “झुकाव” की पुष्टि की थी। दोनों देशों ने यह भी घोषणा की कि वे हिंद प्रशांत महासागरों की पहल के अंतर्गत एक उत्कृष्ट क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा केन्द्र का निर्माण कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य, जैसा कि भारत के पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल करमबीर सिंह ने कहा था, “समुद्री क्षेत्र के लिए मानव पूँजी का विकास करना” है| अतः, समुद्री जुड़ाव इस सुरक्षा साझेदारी की रीढ़ बन रहा है, जो दोनों देशों के नीली जल शक्ति के तौर पर विकास को प्रदर्शित करता है, जिसमें हिंद प्रशांत के हितों में तीव्रता से एकरूपता आ रही हैं: इस सामरिक तौर पर आवश्यक क्षेत्र को स्वतंत्र, खुला, समृद्ध, सुरक्षित और बहुध्रुवीय बनाए रखने हेतु चीन की उपस्थिति को संतुलित करना है|

सीमाएँ: घरेलू राजनीति, रणनीतिक परिवर्तन
दोनों सरकारों के नेक इरादों के बावजूद, भारत-यूके साझेदारी में अभी भी बड़ी चुनौतियाँ अन्तर्निहित हैं| उदाहरण के लिए, रक्षा संविभाग में, भारत के अन्य निकटतम भागीदारों के साथ संबंधों में देखी जाने वाली संस्थागत संरचना भारत- यूनाइटेड किंगडम संबंधों में विद्यमान नहीं है| यद्यपि भारत और यूके के बीच “2+2 विदेश एवं रक्षा वार्ता” के दो संस्करण आयोजित किए गए हैं, किंतु ये केवल वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक ही हैं, न कि मंत्री स्तर की बैठक/ वार्तालाप जैसी नई दिल्ली अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और रूस के साथ करती है। इस बीच, ऑकस साझेदारों और जापान के साथ लंदन का गहरा जुड़ाव – जो यूएस गठबंधन वास्तुकला का अभिन्न अंग है, जो यूके को ज़्यादा मज़बूत रक्षा ढांचा और परिचालन संरेखण देता है। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता एवं औपचारिक गठबंधनों के प्रति अनिच्छा, जो ज़्यादातर उसके औपनिवेशिक अतीत से उपजी होने के कारण यूके के साथ रक्षा संबंधों के संस्थागतकरण में अनूठी रुकावटें पैदा करती है|
घरेलू राजनीति भी कभी-कभी भारत-यूके के संबंधों में रुकावट का काम करती है। कई संवेदनशील ऐतिहासिक या संप्रभुता से जुड़ी चिंताएँ, जिनमें से कुछ औपनिवेशिक शासन की विरासत हैं, दोनों देशों के बीच आवधिक अविश्वास की भावना को जन्म दे सकती है। यूके में, उपमहाद्वीपीय प्रवासी राजनीति, विशेषकर खालिस्तान और कश्मीर को लेकर—कभी-कभी सुरक्षा संबंधी चिंताएँ और राजनीतिक संवेदनशीलता पैदा करती हैं| हाल के वर्षों में, हिंसक विरोध प्रदर्शन, भारतीय राजनयिकों को धमकियाँ, और भारत के हितों के लिए बड़ी चुनौतियाँ देखी गई हैं, जिससे दोनों देशों के संबंधों में जटिलता उत्पन्न हो गई है| इसके अतिरिक्त, यूके में, आप्रवासियों के विरोध की भावनाओं ने राजनीतिक चुनौतियाँ पैदा की हैं, ख़ासकर, भारतीय नागरिकों के लिए वीज़ा से जुड़ी समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं|
भारत- यूके की बढ़ती साझेदारी का रणनीतिक तर्क भी दुर्बल हो सकता है। इस वर्ष, स्टारमर की लेबर सरकार को ट्रंप प्रशासन के अटलांटिक पार संबंधों के दृष्टिकोण के उत्तर में, “यूरोप की सुरक्षा पर तुरंत ध्यान देना” पड़ा है। एक तो, यूरोपीय क्षेत्र में, रूस के साथ भारत के पुराने संबंध यूके की प्राथमिकताओं के उलट हैं; परन्तु इससे भी आवश्यक तथ्य यह है कि यूके यूरोप की सुरक्षा और नीति पर संसाधनों के रूप में ध्यान केंद्रित करना, भारत-यूके के साझा हितों से यूके का ध्यान भटका सकता है|
मध्य शक्ति साझेदारियाँ: भारतीय विदेश नीति की धुरी
नई दिल्ली के दृष्टिकोण से, ऊपर अंकित की गई चुनौतियों के बावजूद, यह विकसित हो रही साझेदारियाँ भारत की बदलती विदेश नीति में पूर्ण रूप से संरेखित हो रही है: मध्य शक्तियाँ के भिन्न-भिन्न संघों के साथ ठोस, कार्यसूची में मसौदा-वर्धक संबंधों की स्थापना भारत की विदेश नीति का एक स्तंभ बनकर उभरा है। पिछले कुछ माह से, भारत ने ऑस्ट्रेलिया के प्रथम रक्षा व्यापार प्रतिनिधि मंडल का स्वागत किया है, जापान के साथ सुरक्षा सहयोग की एक घोषणा पर हस्ताक्षर किए है, और यूरोपीय संघ-भारत सुरक्षा और रक्षा साझेदारी की दिशा में कार्यरत है|
राजनयिक गतिविधियों में यह तेज़ी ऐसे समय पर आई है जब नए संयुक्त राज्य अमेरिका प्रशासन की परिवर्तित हो रही है वैश्विक प्राथमिकताओं को लेकर विश्व में गहरी अनिश्चितता का माहौल है| नवंबर 2024 में डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव के समय, नई दिल्ली उन राजधानियों में से थी जो अमेरिका के साथ स्थिर संबंधों को लेकर सबसे आश्वस्त थी, परन्तु आज वह खुद को अमेरिकी विदेश नीति के एक नए दौर के सबसे तीखे मोड़ पर पाती है। भारत पर अमेरिका द्वारा भारतीय निर्यातों के लिए सबसे अधिक प्रशुल्क दर लागू किए गए हैं, और इसके साथ-साथ, जिसमें रूस से ऊर्जा (तेल एवं गैस) खरीदने हेतु 25 प्रतिशत अधिकतर शुल्क भी सम्मिलित है — कुछ लोगों ने इसे व्यापार में छूट लेने के लिए चयनात्मक दंड के रूप में देखा है एवं भारत-पाकिस्तान युद्ध-विराम में अमेरिका की किसी भी भूमिका को नई दिल्ली द्वारा ख़ारिज करने के प्रतिशोध के रूप में प्रस्तुत भी किया है| कभी पाकिस्तान के कड़े आलोचक रहे राष्ट्रपति ट्रंप ने, मई 2025 के भारत-पाकिस्तान संकट के पश्चात्, इस्लामाबाद के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित किए हैं, और बार-बार मध्यस्थता के दावों के माध्यम से भारत और पाकिस्तान को पुनः हाइफ़नेट (दो भिन्न इकाइओं को एक समान देखने का प्रयास) किया है| अमेरिका, जो कभी चीन से प्रतिस्पर्धा करने हेतु भारत के साथ जुड़ाव को लेकर उत्साहित था, अब अमेरिका-चीन “जी2” के विचार पर विचार-विमर्श कर रहा है, एवं इक्कीसवीं सदी में, अमेरिका-भारत साझेदारी के मुख्य तर्क को कमजोर कर रहा है|
यद्यपि, संबंधों में इस “तूफ़ान” के बावजूद, अमेरिका, अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, और प्रौद्योगिकी जैसे अधिकतर क्षेत्रों में भारत का सबसे आवश्यक द्विपक्षीय साझेदार बना हुआ है। परंतु इस समय, भारत के पास वॉशिंगटन के साथ वार्तालाप में बढ़त करने हेतु कोई उत्प्रेरक नहीं है—जैसे, चीन की दुर्लभ पृथ्वी पर एकाधिकार। इस समय, भारत की संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रति रणनीति आवश्यक रूप से व्यावहारिक है: प्रतीक्षा करो, देखो, और आगे बढ़ो।
“नई दिल्ली के दृष्टिकोण से, ऊपर अंकित की गई चुनौतियों के बावजूद, यह विकसित हो रही साझेदारियाँ भारत की बदलती विदेश नीति में पूर्ण रूप से संरेखित हो रही है: मध्य शक्तियाँ के भिन्न-भिन्न संघों के साथ ठोस, कार्यसूची में मसौदा-वर्धक संबंधों की स्थापना भारत की विदेश नीति का एक स्तंभ बनकर उभरा है।”
व्यावहारिक रूप से, इस रणनीति ने भारत के लिए मध्य-शक्ति साझेदारी का एक दायरा विकसित करने हेतु उपयुक्त स्थान एवं प्रोत्साहन का निर्माण भी किया है – जिसके अंतर्गत यूके, ऑस्ट्रेलिया, जापान, ईयू, फ्रांस, रूस, यूएई, इज़रायल और अन्य सभी साझेदार भारत की व्यापक लचीली संरचना में रिक्त स्थानों की पूर्ति कर रहे हैं, एवं वैश्विक अनिश्चितताओं और व्यवधानों का सामना कर, उनके अनुकूल स्वरुप लेने की नई दिल्ली की क्षमता को प्रबलता प्रदान कर रहे हैं|
चीन के प्रति भारत के दृष्टिकोण में व्यावहारिक परिवर्तन आया है। गलवान संकट के उपरांत जहाँ भारत के दृष्टिकोण में यह परिवर्तन कुछ समय से हो रहा है, व्हाइट हाउस के साथ तनावपूर्ण संबंधों ने बीजिंग के साथ संबंधों को सामान्य करने का रास्ता खोल दिया है| अल्पावधि में, इसका तात्पर्य है कि चीनी उपकरण और आवश्यक सामग्री तक पहुँच स्थापित कर, भारत विनिर्माण में आत्मनिर्भरता की महत्वाकांक्षाओं को पूर्ण कर सकता है, कम से कम तब तक, जब तक भारत आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेता|
यूके के साथ भारत के सम्बन्ध शायद वॉशिंगटन या बीजिंग जितनी सुर्खियाँ न बटोरें, लेकिन वे आज विश्व की राजनीति में हो रहे परिवर्तन को दर्शाते हैं। जैसे-जैसे दोनों देश आर्थिक राष्ट्रवाद और भूराजनीतिक उतार-चढ़ाव से निपट रहे हैं, उनकी साझेदारी एक उदाहरण देती है कि व्यावहारिक, आपसी हितों पर आधारित मध्य शक्ति सहयोग किस प्रकार का रूप धारण कर सकता है| पिछले कुछ वर्षों से, दोनों पक्षों ने संबंधों में काफ़ी राजनीतिक और कूटनीतिक पूँजी निवेश की है| अब काम यह है कि इस उत्कृष्ट गति को कैसे क्रियात्मकतंत्र में बदला जाए जो व्यापार, रक्षा और प्रौद्योगिकी पर कार्य करें। स्टारमर की भारत यात्रा के दौरान बनी समझ को आगे बढ़ाने के लिए नवंबर के प्रारंभ में भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिसरी का लंदन दौरा एक अच्छा पहला क़दम है। अगर वे सफल होते हैं, तो भारत – यूके साझेदारी हिंद प्रशांत क्षेत्र एवं उसके पार, स्थिर शक्ति के रूप में उभर सकती है|
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