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“डिएगो गार्सिया को किसी को मत दीजिए,” अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 19 फ़रवरी को चेतावनी दी, जब यूनाइटेड किंगडम चागोस द्वीपसमूह की संप्रभुता मॉरीशस को हस्तांतरित करने की योजनाओं के साथ आगे अग्रसर हो रहा था। तथापि चागोस द्वीपसमूह को अक्सर यूनाइटेड किंगडम और मॉरीशस के बीच संप्रभुता विवाद के दृष्टिकोण से देखा जाता रहा है, परंतु आज ये द्वीप क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता और महाशक्तियों के बीच की होड़ का एक केंद्र बन गए हैं।

पिछले कुछ दशकों में, व्यापक हिंद महासागर क्षेत्र की भू-राजनीति में अतिबृहत परिवर्तन आए हैं। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका और जापान जैसी पारंपरिक समुद्री शक्तियों ने इस क्षेत्र में भारत, चीन और संयुक्त अरब अमीरात जैसी उभरती नौसेनाओं के साथ हिंद महासागर में अपना स्थान साझा करना प्रारम्भ कर दिया है। यह परिवर्तन वैश्विक सुरक्षा परिवेश में आए व्यापक गिरावट का ही एक परिणाम है, विशेष रूप से समुद्री क्षेत्र में: लाल सागर में व्यापारिक जहाज़ों पर हूती हमलों से लेकर ईरानी नौसेना के जहाज़ों पर अमेरिकी हमलों और चीन-रूस के संयुक्त नौसैनिक अभ्यासों तक—हिंद महासागर में सैन्यीकरण में एक उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिल रही है।

चागोस द्वीपसमूह इस प्रभावशाली रुझान के केंद्र में स्थित है और—मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष को देखते हुए—विशेष रूप से डिएगो गार्सिया पहले से कहीं अधिक चर्चा एवं विवादों के घेरे में आ गया है। चागोस से जुड़े हालिया घटनाक्रम यह दर्शाते हैं कि कैसे बाह्य शक्तियाँ, क्षेत्रीय पक्ष और छोटे द्वीपीय देश एक ही समय पर पूरे हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति को विस्तारित कर रहे हैं। यह द्वीपसमूह, व्यापक क्षेत्र में बढ़ते सैन्यीकरण की उभरती हुई चेतावनी का संकेत हैं।

पृष्ठभूमि: चागोस और अमेरिकी नीति में परिवर्तन 

चागोस द्वीपसमूह हिंद महासागर के मध्य में स्थित लगभग साठ छोटे द्वीपों का एक समूह है, जो वर्तमान में यूनाइटेड किंगडम द्वारा ‘ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र’ (बीआईओटी) के रूप में प्रशासित है। इन द्वीपों में सबसे बड़ा और सबसे दक्षिणी द्वीप, डिएगो गार्सिया, 1973 से ही यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका के एक संयुक्त सैन्य अड्डे के रूप में कार्यरत है।

विशेष तथ्य यह है कि चागोस, यूनाइटेड किंगडम और मॉरीशस के बीच लंबे समय से चले आ रहे संप्रभुता विवाद का केंद्र रहा है। 2024 में, दोनों देशों के बीच चागोस की संप्रभुता पोर्ट लुइस को सौंपने पर एक समझौता हुआ, जिसमें यूके और यूएस के सैन्य हितों की सुरक्षा के लिए कई शर्तें समिल्लित थीं। जहाँ एक ओर इस समझौते को विश्व भर में तुरंत ही वी-उपनेविशीकरण की विजय के तौर पर सराहा गया, वहीं दूसरी ओर यूके और यूएस के रूढ़िवादियों ने अपने क्षेत्रों के हाथ से निकलने और क्षेत्र में चीन की बढ़ती मौजूदगी को लेकर चिंताएँ जताईं। इन चिंताओं के बावजूद, यूनाइटेड स्टेट्स और यूनाइटेड किंगडम—दोनों ही देशों की सरकारें इस समझौते को आगे बढ़ाने की अपनी इच्छा पर क़ायम रहीं। 

हालाँकि, दूसरे ट्रंप प्रशासन के सत्ता संभालने के तुरंत बाद ही, अमेरिकी सेना की प्राथमिकताओं में विशेष परिवर्तन दिखाई दिया। अमेरिकी सैन्य शक्ति के प्रदर्शन पर प्रशासन का समग्र ज़ोर, और ईरान के प्रति उसकी विशेष दबाव वाली रणनीति ने, विश्व भर में अमेरिकी अभियानों हेतुएक सहायक केंद्र के तौर पर डिएगो गार्सिया के महत्व को ओऔर बढ़ा दिया है। सैन्य सिद्धांतों से परे, ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी कूटनीति को भी नए सिरे से व्यवस्थित किया है—विशेष रूप से यूनाइटेड किंगडम जैसे प्रमुख सहयोगियों के साथ अपने संबंधों को।

“यह द्वीपसमूह, व्यापक क्षेत्र में बढ़ते सैन्यीकरण की उभरती हुई चेतावनी का संकेत हैं।”

इन परिवर्तनों के चलते, ट्रंप ने चागोस द्वीपसमूह को लेकर अमेरिका-ब्रिटेन की विद्यमान परिस्थिति को बार-बार चुनौती दी है। जनवरी 2026 में, उन्होंने ब्रिटेन-मॉरीशस समझौते की आलोचना ग्रीनलैंड पर अमेरिका के दावे को लेकर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर पर दबाव डालने के उद्देश्य की थी। फ़रवरी और मार्च के बीच, जब वॉशिंगटन ईरान पर हमला करने की तैयारी कर रहा था, तब ट्रंप ने अपनी इन आलोचनाओं को फिर से दोहराया। रिपोर्टों से ज्ञात होता है कि आलोचनाओं की यह दूसरी लहर दोनों सहयोगी देशों के बीच ईरान के विरुद्ध अमेरिकी हमलों के लिए ब्रिटेन के सैन्य ठिकानों का प्रयोग किया जाने को लेकर प्रारम्भ हुई थी।

इन घटनाक्रमों के उत्तर में, 19 फरवरी को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को लिखे एक पत्र में ईरान ने कहा कि यदि अमेरिका किसी हमले को अंजाम देने के लिए डिएगो गार्सिया का प्रयोग करता है, तो तेहरान के लिए यह एक वैध निशाना माना जाएगा। इससे पहले, जून 2025 में ईरान के विरुद्ध अमेरिकी हमलों के दौरान, तेहरान ने डिएगो गार्सिया पर पूर्वव्यापी प्रहार के द्वारा ड्रोन और प्रक्षेपास्त्र भेजने की धमकी दी थी। जैसे-जैसे अमेरिकी अभियान अब ब्रिटिश समर्थन से जारी है, इसलिए चागोस की संप्रभुता हस्तांतरण की विद्यमान स्थिति पहले से कहीं अधिक अनिश्चित हो गई है।

क्षेत्रीय दृष्टिकोण 

हाल के सैन्य प्रहारों के बीच, चागोस ने मीडिया के द्वारा कई सुर्खियाँ बटोरी हैं। हालाँकि, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका के बारे में प्रचलित धारणाएँ अक्सर वहाँ चल रही महत्वपूर्ण क्षेत्रीय गतिशीलता को नज़रअंदाज़ कर देती हैं। संप्रभुता को लेकर ऊपरी तौर पर चल रहे विवाद के नीचे कई ऐसी महत्वपूर्ण घटनाएँ घट रही हैं—जिन्हें भारत, मालदीव और चीन जैसे क्षेत्रीय देश विकसित कर रहे हैं—जो हिंद महासागर के भविष्य पर गहरा असर डाल सकती हैं।

भारत

भारतीय रणनीतिकारों ने ऐतिहासिक रूप से हिंद महासागर को नई दिल्ली की “विशाल झील” के रूप में प्रदर्शित किया है। इसी के चलते, भारत ने इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति विकसित करने हेतु एवं मॉरीशस समेत अन्य द्वीपीय देशों के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित करने हेतु ज़ोर दिया है। वि-उपनिवेशीकरण और क्षेत्रीय स्थिरता पर अपनी नीति के अंतर्गत, भारत ने हमेशा चागोस द्वीपसमूह पर मॉरीशस की संप्रभुता का निरंतर समर्थन किया है। इसके अतिरिक्त, हिंद महासागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी का मुक़ाबला करने हेतु भारत के प्रभाव को प्रबल बनाने की दिल्ली के प्रयत्नों एक अहम हिस्सा मॉरीशस का समर्थन करना भी रहा है। इन तमाम प्रयासों के बावजूद, भारत ने हमेशा व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए डिएगो गार्सिया स्थित सैन्य अड्डे के लंबे समय तक जारी रहने वाले संचालन को स्वीकृति प्रदान की है।

हाल के वर्षों में, भारत ने यूनाइटेड किंगडम और मॉरीशस के बीच वार्तालाप को सरल बनाने में एक शांत लेकिन प्रभावशाली भूमिका निभाई है। ऐसा उसने क्षेत्रीय वर्चस्व को बनाए रखने और यह सुनिश्चित करने के लिए किया है कि कोई भी समझौता भारत के हितों के अनुरूप हो। इसमें मॉरीशस के अगालेगा द्वीप पर एक भारतीय सैन्य हवाई अड्डे का निर्माण समिल्लित है, जो डिएगो गार्सिया से लगभग 1100 मील की दूरी पर स्थित है।  इस हवाई अड्डे में एक लंबी रनवे, गहरे पानी की जेट्टी, और रडार व संचार बुनियादी ढांचा शामिल होगा, जो भारतीय समुद्री गश्ती विमानों को सहायता प्रदान करने में सक्षम होगा। मॉरीशस इस निर्माण का बचाव करते हुए इसे आपसी रूप से लाभकारी तटरक्षक सहायता के साधन के रूप में प्रस्तुत करता है। वहीं दूसरी ओर, यह नया हवाई अड्डा पश्चिमी हिंद महासागर में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने और लंबी दूरी की निगरानी करने की भारत की क्षमता को काफ़ी हद तक मज़बूती प्रदान करेगा।

इसके अतिरिक्त, 2025 में, भारत ने मॉरीशस को स्वास्थ्य सेवा, बुनियादी ढांचे और समुद्री सुरक्षा परियोजनाओं के लिए अतिरिक्त $680 मिलियन अमेरिकी डॉलर की आर्थिक सहायता देने पर सहमति जताई। इसमें चागोस द्वीपसमूह के आसपास स्थित समुद्री संरक्षित क्षेत्र के विकास और निगरानी के लिए सहायता भी समिल्लित है। पर्यावरणीय औचित्य के बावजूद, ऐसी समुद्री निगरानी, ​​व्यवहार में, चागोस के चारों ओर भारत के नेतृत्व वाला एक सुरक्षा घेरा निर्मित कर सकती है।

चीन

हिंद महासागर में चीन की उपस्थिति, यूके-मॉरीशस संप्रभुता समझौते के आलोचकों द्वारा सबसे अधिक उठाई जाने वाली चिंताओं में से एक है। आज, चीन हिंद महासागर क्षेत्र में एक ऐसा खिलाड़ी है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। 2020 तक, चीन लगभग $900 अरब अमेरिकी डॉलर के व्यापार के साथ हिंद महासागर क्षेत्र का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया है। इस क्षेत्र में चीन की सैन्य उपस्थिति—समुद्री डकैती रोकने के अभियानों, संभार तंत्र सुविधाओं और पत्तन परियोजनाओं के मामले में—इसकी आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ बढ़ी है और समय के साथ परस्पर विकसित होती जा रही है।

मॉरीशस भी इस प्रवृत्ति का अपवाद नहीं है। 2021 में, इसने चीन के साथ एक मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए, ऐसा करने वाला यह प्रथम अफ्रीकी देश बन गया, और तब से यह हर वर्ष चीन से लगभग $1.25 अरब अमेरिकी डॉलर का सामान आयात करता रहा है। तथापि, चीनी सरकार ने आमतौर पर चागोस द्वीपसमूह विवाद पर सीधे टिप्पणी करने से परहेज़ किया है।

भारत की तरह, चीन भी चागोस विवाद को वि-उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया का एक हिस्सा मानता है और द्विपक्षीय वार्तालाप की प्रक्रिया का समर्थक है; हालाँकि, कुछ पर्यवेक्षकों का तर्क है कि “वि-उपनिवेशीकरण” का अर्थ यूरोपीय और अमेरिकी प्रभाव की जगह चीन की बढ़ती मौजूदगी का आना है। इस दृष्टिकोण से देखें तो, डिएगो गार्सिया पर अमेरिका-ब्रिटेन के सैन्य अड्डे का परस्पर चालू रहना, शर्तें चाहे जो भी हों, चीन की महत्वाकांक्षाओं हेतु एक झटका है। क्योंकि यह पोर्ट लुइस को बीजिंग के साथ घनिष्ठ रणनीतिक संबंध बनाने से रोकता है। इसके अतिरिक्त, मॉरीशस की भारत के साथ कूटनीतिक नज़दीकी, चीन के साथ उसके संबंधों के मुकाबले एक महत्वपूर्ण संतुलन का काम करती है। इस अर्थ में, हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक तालमेल और प्रतिस्पर्धा को शायद अमेरिका-चीन की प्रतिद्वंद्विता के बजाय भारत-चीन की प्रतिद्वंद्विता ही अधिक प्रभावित करती है।

मालदीव

भारत और चीन के अतिरिक्त, मालदीव भी चागोस विवाद में परस्पर प्रभावशाली भूमिका निभा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के तहत, मालदीव के कुछ ‘विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र’ (ईईज़ेड) चागोस द्वीपसमूह के साथ अतिव्यापी हैं। 1992 में, मालदीव ने यूके  के साथ इस को “ठीक बीच से” विभाजित करने के लिए बातचीत की थी। हालाँकि इस समझौते पर कभी हस्ताक्षर नहीं हुए, फिर भी दोनों देशों ने व्यावहारिक रूप से इस सीमा का सम्मान किया।

हालाँकि, 2019 में जब अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने चागोस पर मॉरीशस की संप्रभुता को मान्यता दी, तो यह व्यवस्था टूट गई। 2021 में, समुद्र के क़ानून पर अंतर्राष्ट्रीय अधिकरण ने मॉरीशस और मालदीव के बीच के अतिव्यापि क्षेत्रों को पुनः विभाजित किया। इस निर्णय के उपरांत, मालदीव के राष्ट्रपति इब्राहिम सोलिह ने औपचारिक रूप से चागोस पर मॉरीशस की संप्रभुता को मान्यता प्रदान की। 

“चागोस द्वीपसमूह हिंद महासागर में व्यवस्था के भविष्य के लिए एक ‘लिटमस टेस्ट’ साबित होगा। यदि विद्यमान रुझान जारी रहते हैं, तो हिंद महासागर का सुरक्षाकरण इस तरह से होगा जिसके अंतर्गत कूटनीतिक गुंजाइश कम हो जाएगी और दबावकारी उपाय प्राथमिक हो जाएँगे।”

तब से, मालदीव में सोलिह को “समुद्री क्षेत्र सौंपने” के कारण आलोचना का सामना करना पड़ा है। 2023 में, मालदीव में हुए चुनावों के उपरांत मोहम्मद मुइज़ू के नेतृत्व में एक नई सरकार सत्ता में आई, जिन्होंने तुरंत अधिकरण के निर्णय को चुनौती देने के प्रयास प्रारम्भ कर दिया। मुइज़ू ने मॉरीशस की संप्रभुता की मान्यता वापस ले ली, सीमा संबंधी निर्णय की जाँच के लिए एक आयोग का गठन किया, और मालदीव की समुद्री सीमाओं को परिभाषित करने के लिए एक कार्यालय स्थापित किया। फ़रवरी 2026 में, मालदीव के रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की कि उसके सैन्य बल देश के क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए निगरानी करेंगे, और विवादित चागोस क्षेत्र में एक विशेष अभियान प्रारम्भ करेंगे। इसके उपरांत मुइज़्ज़ू ने इस मुद्दे को एक क़दम और आगे बढ़ाते हुए पूरे चागोस द्वीपसमूह पर अपनी संप्रभुता का दावा किया, जो मालदीव की किसी भी पूर्ववर्ती सरकार ने कभी नहीं किया था। ये क़दम केवल एक सीमा विवाद से कहीं अधिक दर्शाते हैं – यह क़दम बढ़ते क्षेत्रीय मुक़ाबले के बीच रणनीतिक स्वायत्तता स्थापित करने के मालदीव के व्यापक प्रयासों के अनुरूप हैं।

भारत-चीन की प्रतिद्वंद्विता मॉरीशस-मालदीव के बढ़ते तनावपूर्ण संबंधों में भी गहराई से समाहित हुई है, और मोहम्मद मुइज़्ज़ू के चुनाव के बाद से चीन और मालदीव के बीच संबंध और भी घनिष्ठ हो गए हैं। इसी तरह, मालदीव और भारत के बीच संबंध भी कुछ समय से अस्थिर रहे हैं, “भारत बाहर” अभियान के दौरान ये संबंध बिगड़े और माले में हाल ही में हुए समझौते के बाद धीरे-धीरे सुधरने लगे। मालदीव के रुख़ में ये बदलाव सरकार द्वारा राष्ट्रवादी भावनाओं, चुनावी वादों और बाहरी दबावों के बीच संतुलन खोजने के प्रयास को दर्शाते हैं।

इस संदर्भ में, मुइज़्ज़ू सरकार ने रक्षा आधुनिकीकरण में तीव्रता का विकास किया है और तुर्की और चीन के साथ नई सैन्य साझेदारियाँ स्थापित करने का प्रयास किया है। एक ऐसे देश के लिए जो ऐतिहासिक रूप से कूटनीति और बाह्य सुरक्षा प्रावधानों पर निर्भर रहा है, यह सैन्यीकरण उल्लेखनीय है। समुद्री दावों का विस्तार करके और विवादित जलक्षेत्रों में सेना की तैनाती कर, मालदीव अपने हितों की रक्षा हेतु अधिक प्रत्यक्ष रूप से तत्परता का संकेत दे रहा है। यह दर्शाता है कि हिंद महासागर में चल रही व्यापक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच छोटे द्वीपीय देश भी किस प्रकार सैन्यीकरण की ओर अग्रसर हो रहे हैं।

सैन्यीकरण की ओर मार्ग प्रशस्ति

हिंद महासागर में सैन्यीकरण की यह प्रक्रिया धीमी होने के कोई संकेत नहीं दिखा रही है। फ़िलहाल, चागोस द्वीपसमूह ‘ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र’ का अंग बना हुआ है और यहाँ अमेरिका-ब्रिटेन का संयुक्त सैन्य अड्डा ‘डिएगो गार्सिया’ स्थित है। श्रीलंका के तट के पास एक ईरानी जहाज़ पर अमेरिका के तत्कालीन टॉरपीडो प्रहार और ईरान द्वारा ‘हॉरमुज़ जलडमरूमध्य’ को बंद किए जाने के उपरांत, डिएगो गार्सिया परस्पर चर्चा का केंद्र बना रहेगा, क्योंकि मध्य-पूर्व में जारी उथल-पुथल अब हिंद महासागर के व्यापक क्षेत्र तक फैल रही है। इसके अतिरिक्त, यदि ईरान के साथ यह संघर्ष बढ़ता है, तो तेहरान चागोस पर अपना निशाना साध सकता है। वहीं दूसरी ओर, भारत भी इस क्षेत्र में अपना सैन्य अड्डा स्थापित कर रहा है, और मालदीव ने इस पूरे द्वीपसमूह पर अपना दावा प्रस्तुत किया है। इन सभी घटनाक्रमों का परिणाम यह है कि यह समुद्री क्षेत्र अब और भी अधिक भीड़भाड़ वाला और अस्थिर होता जा रहा है।

आगे चलकर, चागोस द्वीपसमूह हिंद महासागर में व्यवस्था के भविष्य के लिए एक ‘लिटमस टेस्ट’ साबित होगा। यदि विद्यमान रुझान जारी रहते हैं, तो हिंद महासागर का सुरक्षाकरण इस तरह से होगा जिसके अंतर्गत कूटनीतिक गुंजाइश कम हो जाएगी और दबावकारी उपाय प्राथमिक हो जाएँगे। ऐसे परिवेश में, स्थिरता न केवल बड़ी शक्तियों की नौसेनाओं की ताक़त पर निर्भर करेगी, बल्कि उन द्वीपीय देशों के प्राथमिकताओं पर भी निर्भर करेगी जो इस महासागरीय क्षेत्र को अपना घर मानते हैं।

This article is a translation. Click here to read the original in English.

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Image 1: Jordan Steis via Wikimedia Commons

Image 2: NASA via Wikimedia Commons

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