कई महीनों के वार्तालाप के उपरांत, भारत और यूरोपियन संघ 27 जनवरी, 2026 को एक मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर कर एक राजनैतिक पढ़ाव पर पहुँच गए। व्यापार समझौते को सार्वजनिक रूप से “सभी समझौतों की जननी” के रूप में प्रस्तुत किया गया था, परंतु साथ ही सुरक्षा और रक्षा साझेदारी (एसडीपी) पर हस्ताक्षर एक शांत लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पढ़ाव था। हालाँकि पहले के संयुक्त वक्तव्य और परामर्श अधिकतर केवल घोषणात्मक रहे है। एसडीपी में असली संस्थागत दायरा और महत्त्वाकांक्षा हैं, जो एक बड़ी रूपरेखा को आकार देकर परंपरागत और ग़ैर-परंपरागत कार्यक्षेत्र में सहयोग को स्थापित करता है। यह संवाद तंत्र पर आधारित है एवं निरंतरता की नींव पक्की करता है|
विशेष रूप से, यह समझौता सुरक्षा और रक्षा पर वार्षिक मंत्रिस्तरीय और निदेशक-स्तरीय संवादों को संस्थागत रूप प्रदान करता है। इसके साथ, समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद-विरोधी उपायों, हाइब्रिड खतरों, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) तथा उभरती प्रौद्योगिकियों को अपने दायरे में लाता है और विषयगत कार्यधाराओं की स्थापना करता है। यह गोपनीय सामग्री के निरंतर आदान-प्रदान और गहन रक्षा औद्योगिक सहयोग के लिए आवश्यक सूचना सुरक्षा समझौते (एसओआईए) के लिए वार्ता भी प्रारंभ करता है। महत्वपूर्ण रूप से, यह समझौता भारत की “प्रासंगिक यूरोपीय संघ की रक्षा पहलों” में भागीदारी की संभावनाओं को खोजने की बात करता है। यूरोपीय रक्षा कार्यक्रमों में संभावित भागीदारी को स्वीकृति प्रदान करता है, परंतु भारत की वास्तविक भागीदारी को भविष्य की अनुमति प्रक्रिया के अधीन रखता है।
रक्षा औद्योगिक सहभागिता
मूल रूप से, भारत-ईयू एसडीपी के पीछे रक्षा उद्योग का उद्देश्य एक पारस्परिक सौदेबाज़ी जैसा है। यूरोप के लिए, इसका आकर्षण रक्षा उद्योग में व्याप्त तीव्र तनाव के युग में व्यापकता, गति और लागत दक्षता प्राप्त करने में निहित है; वहीं भारत के लिए, इसका मूल्य प्रौद्योगिकी तक पहुँच, सह-विकास और उन्नत रक्षा आपूर्ति श्रृंखलाओं में गहन एकीकरण में निहित है। एसडीपी इस सौदेबाज़ी को औपचारिक रूप नहीं देती, लेकिन यह संस्थागत और नियामक ढांचा तैयार करती है जिसके माध्यम से मूर्त रूप दिया जा सकता है|
यूरोपीय संघ की सुरक्षा और रक्षा साझेदारियाँ आम तौर पर तीन कार्यात्मक स्तंभों से निर्मित हैं: यूरोपीय संघ के नागरिक और सैन्य मिशनों और अभियानों में भागीदारी, गुप्तचर सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए समझौते और स्थायी संरचित सहयोग (पीईएससीओ) परियोजनाओं में भागीदारी। हालाँकि, भारत की रुचि बाहरी अभियान संबंधी मिशनों पर कम और बाद के दो स्तंभों पर अधिक केंद्रित होने की संभावना है। नई दिल्ली के दृष्टिकोण से, एसओआईए के समापन और संबंधित रक्षा पहलों तक पहुंच, यूरोपीय साझेदारों के साथ रक्षा प्रणालियों के सह-विकास और सह-उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण हैं, जो भारत के घरेलू रक्षा औद्योगिक आधार को मजबूत करने के दीर्घकालिक उद्देश्य के अनुरूप हैं। उद्योग जगत के जानकारों का मानना है कि समझौते के तहत गठित नया रक्षा उद्योग मंच इन प्रयासों में एक संभावित महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है, जिससे भारतीय कंपनियाँ केवल “उत्पादन-से-उत्पादन” तक सीमित रहने वाली कंपनियों से कार्यक्रम स्तर की हितधारक बन जाएंगी, जो रचना, एकीकरण और दीर्घकालिक रखरखाव के लिए ज़िम्मेदार होंगी।
यूरोपीय दृष्टिकोण से, भारत के साथ गहन रक्षा औद्योगिक सहभागिता यूरोपीय संघ के व्यापक पुनःशस्त्रीकरण अभियान के अनुरूप है। अपने “रीआर्म पहल” के तहत, यूरोपीय संघ ने 2030 तक रक्षा खर्च में लगभग 800 बिलियन यूरो (945 बिलियन अमेरिकी डॉलर) जुटाने की योजना बनाई है, जिसमें उत्पादन में तीव्रता से विस्तार, आपूर्तिकर्ताओं में विविधता लाने और यूरोपीय आपूर्ति श्रृंखलाओं के भीतर संरचनात्मक निर्भरता को कम करने पर स्पष्ट रूप से बल दिया गया है| फ़रवरी 2024 में, यूरोपीय संघ के वरिष्ठ अधिकारी जोसेप बोरेल ने सार्वजनिक रूप से सदस्य देशों से ग़ैर-यूरोपीय संघ के आपूर्तिकर्ताओं से खरीदारी करने का आग्रह किया, अगर यह “बेहतर, सस्ता और तेज़” सिद्ध होता है।
“यूरोप के लिए, इसका आकर्षण रक्षा उद्योग में व्याप्त तीव्र तनाव के युग में व्यापकता, गति और लागत दक्षता प्राप्त करने में निहित है; वहीं भारत के लिए, इसका मूल्य प्रौद्योगिकी तक पहुँच, सह-विकास और उन्नत रक्षा आपूर्ति श्रृंखलाओं में गहन एकीकरण में निहित है।”
भारत की गोला-बारूद, छोटे मानवरहित हवाई प्रणालियों और लोइटरिंग मुनिशन्स में बढ़ती पकड़ को देखते हुए, यूरोप भारत से इन वस्तुओं को कम लागत पर प्राप्त कर सकता है। महत्वपूर्ण तर्क यह है कि भारतीय 155 मिमी के गोले काफ़ी सस्ते हैं, जिनकी अनुमानित क़ीमत अमेरिकी या पश्चिमी यूरोपीय ठेकेदारों द्वारा निर्मित समकक्ष गोलों की लागत के एक तिहाई से भी कम है। इन फ़ायदों की वजह से ईयू देशों के भारतीय रक्षा निर्यात में पहले ही थोड़ी तेज़ी आई है: फ़रवरी 2022 और जुलाई 2024 के बीच, भारत ने इटली, चेक गणराज्य, स्पेन और स्लोवेनिया से $135.25 मिलियन के हथियार निर्यात किए, जिसमें तैयार तोप के गोले भी शामिल थे, जो रूस-यूक्रेन युद्ध प्रारंभ होने से पूर्व दो सालों में दर्ज $2.8 मिलियन के निर्यात से काफ़ी ज़्यादा है।
इस बीच, यूरोपीय राजधानियों ने लंबे समय से नई दिल्ली पर रूस पर अपनी निर्भरता कम करके पश्चिमी देशों के प्रति झुकाव के लिए दबाव डाला है, जो पिछले दशक में इसकी कुल संपत्ति का 76 प्रतिशत थी। इस दबाव का सामना भारतीय व्यावहारिकता से किया गया है: पिछले दशक में सशस्त्र बलों के खरीद संबंधी निर्णय न केवल भू-राजनीति को दर्शाते हैं, बल्कि प्रदर्शन, रखरखाव और समय पर वितरण के ठोस सबक भी दर्शाते हैं। हाल के परिचालन अनुभवों ने कुछ यूरोपीय प्लेटफार्मों में विश्वास विकसित किया है। सबसे स्पष्ट रूप से, ऑपरेशन सिन्दूर जैसी उच्च-तीव्रता वाली प्रक्षेपास्त्रों में राफेल की भूमिका, जहाँ विमान को मुख्य रूप से स्कैल्प क्रूज़ प्रक्षेपास्त्रों और हैमर रॉकेट-पाउडर ले जाने वाले प्रक्षेपास्त्रों को वायु-से-भूमि मिशनों के लिए पंजीकृत किया गया था, ने डोसॉल्ट एविएशन द्वारा आपूर्ति की गई फ्रेंचाइज़ी में रॉकेट को प्रबल किया है – जैसा कि हाल ही में 114 और राफेल प्रणाली की मंजूरी से स्पष्ट होता है। इसके अतिरिक्त, भारतीय योजनाकारों ने वायु स्वतंत्र प्रणोदन (एआईपी) को सम्मिलित करने वाले उन्नत पारंपरिक पनडुब्बी रचना में लगातार दिलचस्पी दिखाई है। यह एक ऐसा खंड है जिसमें यूरोपियन पोत प्रांगण ख़ासकर जर्मन उत्पादक टीकेएमएस से जुड़े पोत प्रांगण, तकनीक के मामले में परिपक्व और क्रियात्मक रूप से सिद्ध माने जाते हैं।
प्लेटफ़ॉर्म के प्रदर्शन के अलावा, आपूर्ति पक्ष के दो दबावों ने नई दिल्ली को यूरोप के करीब ला खड़ा किया है। पहला, इज़राइल और रूस जैसे पारंपरिक आपूर्तिकर्ता अपनी परिचालन गति और घरेलू प्राथमिकताओं में इतने व्यस्त हो गए हैं कि भारत की बढ़ती खरीद और रखरखाव की समय-सीमा को पूरा करने की उनकी क्षमता सीमित हो गई है। दूसरा, अमेरिका-भारत संबंधों में बढ़ते अविश्वास ने नई दिल्ली को किसी एक बाह्या आपूर्तिकर्ता पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिमों का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए प्रेरित किया है। ये सभी कारक मिलकर यह समझने में सहायता करते हैं कि यूरोप द्वारा प्रौद्योगिकी साझेदारी, सह-उत्पादन और वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखला के प्रस्ताव को इतना समर्थन क्यों मिला है।
साथ ही, नियामक ढांचे के संबंध में यूरोपीय पुनःशस्त्रीकरण तर्क और भारत के आत्मनिर्भर भारत कार्यसूची के बीच संरचनात्मक तनाव के कारण यह औद्योगिक उदारीकरण सीमित है। एसडीपी के तहत भारत यूरोपीय संघ के सिक्योरिटी एक्शन फॉर यूरोप (एसएएफई) विनियमन में भाग लेने के लिए नया पात्र बन गया है, जो मई 2025 में प्रारंभ किया गया एक अस्थायी ऋण-आधारित साधन है, जिसका उद्देश्य पूरे ब्लॉक में रक्षा उत्पादन, खरीद और औद्योगिक क्षमता को गति देने के लिए 150 बिलियन यूरो (178 बिलियन अमेरिकी डॉलर) तक जुटाना है। हालाँकि, भारत इस वित्तपोषण प्रणाली का लाभ उठाने में सक्षम सीमित बाहरी साझेदारों में से एक होगा, लेकिन इसकी रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (डीएपी 2020) स्वदेशीकरण को प्राथमिकता देती है: “बाय इंडियन – आईडीडीएम” के अंतर्गत वर्गीकृत प्लेटफार्मों को वास्तव में घरेलू स्तर पर डिज़ाइन, विकसित और निर्मित होने के लिए कम से कम 50 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, एसएएफई को स्पष्ट रूप से यूरोप में उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इस ऋण सुविधा का लाभ उठाने के लिए, परियोजनाओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि घटक लागत का कम से कम 65 प्रतिशत यूरोपीय संघ या यूरोपीय आर्थिक क्षेत्र के भीतर से उत्पन्न हो, जिससे ग़ैर-यूरोपीय संघ की भागीदारी प्रभावी रूप से 35 प्रतिशत तक सीमित हो जाती है। एक एकल मंच भारत की स्वदेशीकरण की सीमा और एसएएफई की यूरोपीय-सामग्री संबंधी आवश्यकताओं, दोनों को कुशलतापूर्वक पूरा नहीं कर सकता। हालाँकि भारत के लिए यह संभव है, लेकिन, ऐसा करने से प्रणाली की लागत बढ़ जाएगी और सह-विकास के आर्थिक लाभ नकारे जाएंगे।

सामरिक संदर्भ
खरीद में विविधता लाने और औद्योगिक तर्क के अलावा, भारत-ईयू एसडीपी को बदलते अंतरराष्ट्रीय परिवेश में रणनीतिक प्रासंगिकता स्थापित करने के यूरोप के निरंतर प्रयास के हिस्से के रूप में भी देखा जाना चाहिए। पिछले एक दशक में, यूरोपीय संघ अपने आर्थिक बल और अपने पड़ोस में सुरक्षा परिणामों को प्रभावित करने की सीमित क्षमता के बीच सामंजस्य स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहा है। ब्रसेल्स में यह मान्यता बढ़ती जा रही है कि तीव्रता से प्रतिस्पर्धी वैश्विक परिवेश में यूरोपीय हितों की रक्षा के लिए केवल आर्थिक निर्भरता ही पर्याप्त नहीं है।
इस संदर्भ में, मध्य शक्तियों के साथ यूरोपीय संघ की सहभागिता एक विश्वसनीय भू-राजनीतिक कर्ता के रूप में कार्य करने की उसकी महत्वाकांक्षा को दर्शाती है। एसडीपी निष्क्रिय कूटनीति से रणनीतिक औद्योगिक कूटनीति की ओर परिवर्तन का संकेत देती है। यह यूरोप को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की अवधारणा को स्थापित करने में सहायता करती है, जिसके लिए वह क्षेत्र की रक्षा आपूर्ति श्रृंखलाओं, समुद्री संरचना और प्रौद्योगिकी मानकों में अपनी भूमिका को प्रबल करता है। भारत के लिए, यह प्रतिमान इसलिए आकर्षक है क्योंकि यह उन पदानुक्रमित और दायित्व से भरी संरचनाओं से बचता है जो पारंपरिक सुरक्षा गठबंधनों को परिभाषित करती हैं।
प्राथमिकताओं का यह तालमेल बताता है कि एसडीपी रूपरेखा और बातचीत पर क्यों बल देती है| भारत ने ऐतिहासिक रूप से ऐसे रक्षा गठबंधनों का विरोध किया है जो रणनीतिक स्वायत्तता को रोक सकते हैं या तीसरे पक्ष के झगड़ों में अंतरसंचालनीयता की अपेक्षाएँ पैदा कर सकते हैं। ईयू, अपनी ओर से, यूरोप के बाह्य सैन्य अभियान भूमिकाओं के लिए संस्थागत रूप से अनुपयुक्त बना हुआ है, क्योंकि रक्षा निर्णय लेने में सदस्य देशों की प्राथमिकता और ख़तरे की धारणा में लगातार अंतर है – ख़ासकर चीन के संबंध में। इस प्रकार से यह साझेदारी तालमेल एक अभिसरण प्रदर्शित करती है जो गठबंधन का एक ऐसा प्रतिमान है जिसमें दोनों पक्ष अपने नीति लचीलेपन को बनाए रखते हुए अनिश्चितता से बचने की अनुमति देते हैं।
परंतु, यह दूरी ज़रूरी सीमाओं के साथ है। गहरी अंतरसंचालनीयता और ख़तरे की साझा समझ के बिना, यह अक्सर एक औपचारिक गठबंधन के रूप में निर्मित लगता है। यह शायद समुद्री डकैती विरोधी या मानवीय राहत जैसे कम-तीव्रता वाले मिशन तक ही सीमित रहेगा, और उच्च अंत एकीकरण के समय काम नहीं कर पाएगा। इसी तरह, औद्योगिक सहभागिता को संवेदनशील प्रौद्योगिकी स्थानान्तरण पर परिसीमन का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि कोई भी पक्ष वह बाध्यकारी सुरक्षा गारंटी नहीं दे सकता जो आमतौर पर रणनीतिक बौद्धिक संपदा को साझा करने का आधार होती है।
समुद्री सहयोग इस तर्क को साफ़ तौर पर दर्शाता है, जिसमें सहभागिता समुद्री डोमेन जागरूकता, सूचना संलयन और हिंद महासागर और लाल सागर जैसे क्षेत्र में प्रासंगिक समन्वय के आस-पास होता है। यह दृष्टिकोण यूरोप को उपग्रह, विश्लेषणात्मक मंच और नियामक ढाँचा को अपने दायरे में लाने में, विशेष क्षमताओं में योगदान करने की अनुमति देता है, एवं प्राथमिक क्षेत्रीय सुरक्षा प्रदाता के तौर पर भारत की भूमिका को पहचान देता है। यह भारत को क्षेत्रीय सुरक्षा परिणाम पर अपना नियंत्रण कम किए बिना यूरोपियन आदानों से लाभ उठाने की भी अनुमति देता है।
“इस कोशिश की राजनीतिक बुनियाद एक जैसी नहीं है। अभी जो तेज़ी है, वह यूरोप में लंबे समय के शक्ति प्रक्षेपण पर आधारित आम सहमति से कम और पारंपरिक सुरक्षा व्यवस्था के भरोसे को लेकर बेचैनी से ज़्यादा उपजी हुई लगती है।”
भारत-ईयू एसडीपी का समय उतना ही महत्वपूर्ण है जितनी उसकी विषयवस्तु। यूक्रेन में युद्ध को अक्सर रक्षा साझेदारी में यूरोप की नई दिलचस्पी के पीछे मुख्य कारण बताया जाता है। तथापि इस लड़ाई ने बेशक यूरोप की रक्षा बहस को बदल दिया है, लेकिन यह पिछले साल भारत के साथ सुरक्षा में तेज़ी से हुए वार्तालाप को पूर्ण रूप से नहीं समझाता है। एक वजह अटलांटिक के पार सम्बन्धों में बढ़ता तनाव लगता है। अमेरिका का ज़्यादा खुले तौर पर लेन-देन करने वाला रवैया, जिसमें सहयोगी देशों पर रक्षा हेतु खर्च को सकल घरेलू उत्पाद के 5 प्रतिशत तक बढ़ाने का नया दबाव और एक विस्तृत “अमेरिका प्रथम” वाला दृष्टिकोण शामिल है, जिसने यूरोप की लंबे समय से चली आ रही रक्षा की अनिश्चितता के डर को फिर से पैदा किया है।
इस मेल से एक बड़ा प्रश्न उठता है: क्या यूरोपियन संघ सच में एक रणनीतिक ताक़त बनने की प्रक्रिया में है, या उसे कुछ समय के लिए ऐसा करने के लिए उकसाया जा रहा है? इसके संरचनात्मक इरादों के सबूत हैं: इयू की हिंद प्रशांत रणनीति, रक्षा तत्परता पहल, और जापान, दक्षिण कोरिया और अब भारत जैसे एशियाई देशों के साथ सुरक्षा साझेदारी, यूरोप के बाह्य सुरक्षा नतीजों को बनाने में अधिक अहम भूमिका निभाने की चाहत की ओर संकेत करती हैं।
साथ ही, इस कोशिश की राजनीतिक बुनियाद एक जैसी नहीं है। अभी जो तेज़ी है, वह यूरोप में लंबे समय के शक्ति प्रक्षेपण पर आधारित आम सहमति से कम और पारंपरिक सुरक्षा व्यवस्था के भरोसे को लेकर बेचैनी से ज़्यादा उपजी हुई लगती है। अगर अटलांटिक पार संबंध स्थिर होते हैं, तो यूरोप के आस-पास के इलाकों के बाहर जोखिमभरे रणनीतिक लक्ष्यों को बनाए रखने की राजनीतिक इच्छा दुर्बल हो सकती है।
इस दृष्टिकोण से देखें तो, भारत- ईयू एसडीपी को एक बहुध्रुवीय विश्व में बहुसंरेखण का परिणाम माना जा सकता है, जो एक ऐसे समय को दर्शाता है जब दोनों पक्षों के लिए साझेदारी में विविधता लाना सही लगता है, भले ही कोई भी अभी तक उस विकल्प को बाध्यकारी प्रतिबद्धता या गहरे परिचालन एकीकरण में बांधने के लिए तैयार नहीं हो।
This article is a translation. Click here to read the original in English.
***
Image 1: European External Action Service
Image 2: Dylan Agbagni via Wikimedia Commons