Munir Sharif

पाकिस्तान की राष्ट्रीय विधायिका ने 12 नवंबर, 2025 को, विरोध प्रदर्शनों से भरे एक अस्त-व्यस्त सत्र के बाद, दो-तिहाई बहुमत प्राप्त करके, विवादित 27वें संविधान संशोधन को मंज़ूरी दे दी| सरकार और संशोधन समर्थकों ने यह तर्क देकर विवादास्पद परिवर्तनों को उचित ठहराया कि वे सैन्य कमान को स्पष्टता प्रदान करेंगे, रणनीतिक समन्वय का आधुनिकीकरण करते हैं और संवैधानिक व्याख्या के लिए एक समर्पित न्यायालय का निर्माण करते हैं| इसके अतिरिक्त, वे संशोधन को केवल प्रशासनिक सुधार के रूप में प्रस्तुत करते हैं। हालांकि, व्यवहारिक तौर पर, यह प्रावधान पाकिस्तान के सेना प्रमुखों द्वारा लम्बी अवधि समय से प्रयोग किए जा रहे वास्तविक अधिकार और विशेषाधिकारों को औपचारिक रूप देता है, जिससे उन्हें कानूनी ढांचे के भीतर वैधानिक शक्ति का दर्जा प्राप्त होता है। 

पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी ने भारत और अफगानिस्तान के साथ चल रहे संघर्षों का हवाला देते हुए और सैन्य कमान को स्पष्ट करने तथा रणनीतिक समन्वय को आधुनिक बनाने की आवश्यकता बताते हुए संशोधन के प्रति अपनी पार्टी के समर्थन का बचाव किया और इसे “पाकिस्तान के युद्ध जैसी स्थिति” में आवश्यक बताया। इस “युद्ध जैसी स्थिति” को ध्यान में रखते हुए, यह लेख 27वें संशोधन द्वारा किए गए परिवर्तनों का उपयोग भारत के लिए इसके राजनयिक और सैन्य-रणनीतिक निहितार्थों का विश्लेषण करने के लिए करता है।

27वां संशोधन: ऐतिहासिक उदाहरण और संभावित निहितार्थ

27वां संवैधानिक संशोधन, पाकिस्तान की सत्ता संरचना में दशकों के सबसे व्यापक  बदलावों में से एक है, जो नागरिक सरकार, सेना और न्यायपालिका के बीच पहले से ही नाज़ुक और असंतुलित संबंधों को मौलिक रूप से परिवर्तित करता है। यह संशोधन दो मोर्चों पर सत्ता को प्रबलता प्रदान करता है: यह न्यायिक स्वतंत्रता को दुर्बल करता है क्योंकि इसे एक ऐसी कार्यपालिका के अधीन रखा गया है जो लंबे समय से थल सेना के प्रति झुकी रही है, साथ ही नौसेना और वायु सेना पर थल सेना की सर्वोच्चता को औपचारिकता प्रदान करती है| 

यह संयुक्त चीफ़्स ऑफ़ स्टाफ़ कमेटी के अध्यक्ष का पद ख़त्म करता है और चीफ़ ऑफ़ डिफेंस फोर्सेज के नए पद के ज़रिए तीनों सेनाओं की कमान चीफ ऑफ़ आर्मी स्टाफ  के हाथों में देता है, साथ ही, उन्हें ज़िंदगी भर के लिए सबसे ऊंचे सैन्य पद पर पदोन्नति का अधिकार देता है। यह नेशनल स्ट्रेटेजिक कमांड का ऑपरेशनल कंट्रोल थल सेना चीफ़ के हाथ में देकर रणनीतिक सत्ता का भी का केंद्रीकरण करता है, जिससे परमाणु कमान प्राधिकरण को औपचारिक रूप से बनाए रखने के बावजूद असैन्य निगरानी कमज़ोर होती है। न्यायिक रूप से, यह संशोधन संवैधानिक अधिकार क्षेत्र संभालने के लिए एक संघीय संवैधानिक न्यायालय का निर्माण करता है, सर्वोच्च न्यायालय को असैन्य और आपराधिक मामलों तक सीमित करता है, और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के स्थानांतरण हेतु कार्यकारी शक्ति का विस्तार करता है, जिससे न्यायिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक नियंत्रणों के बारे में गंभीर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं। 

सैन्य सत्ता में पहले किए गए समायोजन, जो अक्सर अस्थायी एवं/या राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर होते थे, उसके विपरीत, 27वें संशोधन ने इन विशेषाधिकारों को संविधान में ही अन्तर्निहित कर दिया है, जिससे इन्हें पलटना कठिन हो गया है। यह पाकिस्तान के नागरिक-सैन्य सत्ता के ऐतिहासिक उथल-पुथल के सन्दर्भ में एक बड़ा परिवर्तन है। यह अनुच्छेद 248 को कुछ बदलावों के साथ लागू कर, सरकार में सेना की जगह को और परिपक्वता प्रदान करता है, जिससे अब स्थायी पद पर बैठे सैन्य नेतृत्व को ज़िंदगी भर के लिए प्रतिरक्षा की सुविधा मिल जाती है।

“अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, पश्चिमी साझेदार और बहुपक्षीय संस्थान जो लंबे समय से इस्लामाबाद से संस्थागत सुधार करने का आग्रह कर रहे हैं, वे इस संशोधन को नागरिक जवाबदेही से एक कदम दूर जाना मान सकते हैं।”

इन परिवर्तनों के निहितार्थ प्रणालीगत और रणनीतिक दोनों ही हैं। सबसे पहले, शक्ति का यह “संवैधानिकरण” पाकिस्तान के राजनीतिक प्रणाली में आर्मी/सेना की भूमिका को केंद्रीय निर्णायक के तौर पर मज़बूत करता है—जो स्वयं दशकों की दखलअंदाज़ी और राजनीतिक अभियांत्रिकी से पहले ही कमज़ोर हो चुका है—और भविष्य की नागरिक सरकारों की सैन्य सहमति के बिना रणनीतिक और राजनीतिक संस्थानों पर नियंत्रण रखने की क्षमता को कम करता है। पीटीआई के अंतरिम सभापति बैरिस्टर गोहर अली खान ने कहा, “इस संशोधन के पारित होने के उपरांत […] यहां लोकतंत्र केवल नाम का रह जाएगा” दूसरा, जैसा कि पाकिस्तानी विश्लेषकों ने तर्क दिया है, परमाणु हथियारों का असल परिचालन नियंत्रण एक ही कार्यालय के हाथ में देने से संकट के समय आदेश और नियंत्रण की दुर्बलताएँ बढ़ जाती हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े निर्णय लेने में आम लोगों की भागीदारी कम हो जाती है|

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, पश्चिमी साझेदार और बहुपक्षीय संस्थान जो लंबे समय से इस्लामाबाद से संस्थागत सुधार करने का आग्रह कर रहे हैं, वे इस संशोधन को नागरिक जवाबदेही से एक कदम दूर जाना मान सकते हैं। इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि मुनीर को अपनी और सेना की ताकत को संस्थागत बनाने की वैधता आंशिक रूप से इसलिए मिली, क्योंकि, उन्हें अंतर्राष्ट्रीय मंच पर इसके फायदे मिले: मई 2025 में भारत के साथ संकट में पाकिस्तान के प्रदर्शन के बारे में सकारात्मक धारणाओं के बाद ट्रंप द्वारा मुनीर को अपना “पसंदीदा फील्ड मार्शल” बताए जाने का असर घरेलू स्तर पर यह हुआ कि सेना के प्रति अभिजात वर्ग और आम जनता का विरोध कम हो गया।  कुल मिलाकर, इन बदलावों ने संकट की विश्वसनीयता को अंतरराष्ट्रीय और घरेलू मान्यता में परिवर्तित दिया, जिससे मुनीर को एक व्यक्तिगत या अस्थायी लाभ को पाकिस्तान के हाइब्रिड नागरिक-सैन्य शासन ढांचे के भीतर सेना की शक्ति और संसाधनों में स्थायी संवैधानिक वृद्धि में बदलने में सहायता मिली।

भारत का आंकलन

नई दिल्ली के द्रष्टिकोण से, इन घटनाओं को पाकिस्तान की राजनीतिक दिशा पर सेना के दबदबे के मज़बूत होने, मिश्रित नागरिक-सैन्य व्यवस्था में तेज़ी आने और पाकिस्तान की रणनीतिक स्थिति को मजबूत होने के तौर पर भी देखा जा सकता है, जबकि वह घरेलू स्तर पर आर्थिक कमज़ोरी से जूझ रहा है। यह सोच, जिसे अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों और क्षेत्रीय साझेदारों के बीच भी समर्थन मिला है, भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी लोकतांत्रिक स्थिरता और नागरिक नियंत्रण को रणनीतिक संपत्ति के तौर पर पेश करने के लिए ज़्यादा जगह दे सकती है, जिसके दो कारण हैं—पहला, पाकिस्तान के साथ सुरक्षा से जुड़े मामलों में अपने और अपने साझेदारों की तरफ से सख़्त रुख अपनाने को सही ठहराना, और दूसरा, क्षेत्रीय तनावों को द्विपक्षीय विवादों के बजाय पाकिस्तान की अंदरूनी सत्ता संरचना के नतीजों के तौर पर पेश करना।

साथ ही, भारत के आंकलन में, पाकिस्तान के 27वें संशोधन के सिद्धांत और निहितार्थ अमेरिका की एक लंबे समय से चली आ रही असंगति को पुनर्जीवित करते हैं: वाशिंगटन लोकतांत्रिक पतन के लिए भारत की आलोचना करने में तत्पर रहा है, जबकि पाकिस्तान में इसी तरह के या इससे भी गहरे क्षरण को नियमित रूप से अनदेखा करता रहा है, और अक्सर वहां सैन्य-केंद्रित स्थिरता का पक्ष लेता रहा है। तथापि, ट्रंप के शासनकाल में यह विरोधाभास एक अलग ही रूप धारण कर लेता है: अमेरिका मुनीर का समर्थन करते हुए भी भारत की आलोचना करता है, सैद्धांतिक रूप से नहीं, बल्कि पाकिस्तानी नेतृत्व के प्रति एक लेन-देन संबंधी वरीयता के कारण, जिसे वह अल्पकालिक अमेरिकी सुरक्षा हितों के साथ अधिक संरेखित मानता है। अमेरिका-भारत संबंधों में वास्तविक आर्थिक और भू-राजनीतिक तनाव के बिंदुओं के साथ—विशेष रूप से संभावित अमेरिका-भारत व्यापार समझौते का टूटना, भारी प्रशुल्क दर लगाना और भारत-पाकिस्तान संघर्ष में वाशिंगटन की कथित भूमिका को भारत द्वारा स्वीकार न करना—पाकिस्तान की तुलना में, भारत की लोकतांत्रिक साख पर चुनिंदा ज़ोर देना नई दिल्ली में राजनीतिक संवेदनशीलता को बढ़ाता है। इन व्यापारिक टकरावों से भारत की विनिर्माण और निर्यात संबंधी महत्वाकांक्षाओं पर घरेलू स्तर पर ठोस लागतें आती हैं, जिससे यह धारणा और मजबूत होती है कि रणनीतिक साझेदारी ने भारत को दंडात्मक आर्थिक दबाव से नहीं बचाया है। 

इस्लामाबाद तक संयुक्त राज्य अमेरिका की राजनयिक पहुंच पाकिस्तान की डिप्लोमैटिक तेज़ी को दिखाती है, जैसा कि चीन, सऊदी अरब और तुर्की जैसे साझेदारों के साथ उसके बढ़ते रिश्तों से ज्ञात होता है| पाकिस्तान की सैन्य नेतृत्व की ओर संयुक्त राज्य अमेरिका का झुकाव, माना जाने वाला रणनीतिक दोहरे मापदंड एवं आर्थिक दबावों का यह मेल, संयुक्त राज्य अमेरिका -भारत के कई तरह के संबंधों में में मतभेद को गहराई प्रदान करता है, जो रक्षा, तकनीकी और आपूर्ति श्रृंखला पहलों की कोशिशों में कार्य स्तर पर जारी है| 

इसके अतिरिक्त, नई दिल्ली के लिए, मई संघर्ष के महीनों बाद इस संशोधन का पारित होना मुनीर के नेतृत्व वाली प्रतिष्ठान द्वारा पाकिस्तान को अधिक युद्ध-तैयार मुद्रा की ओर ले जाने के विचार को और मजबूत कर सकता है, जिससे भविष्य में तनाव बढ़ने की स्थिति में नागरिक संयम सीमित हो जाएगा। ऑपरेशन सिंदूर के बाद, पाकिस्तान द्वारा एक समर्पित सेना रॉकेट फ़ोर्स कमान (एआरएफसी) की स्थापना का निर्णय रणनीतिक क्षमताओं के ऊर्ध्वाधर एकीकरण की दिशा में सैन्य प्रयास को स्पष्ट करता है। प्रक्षेपास्त्र बल पर नियंत्रण मज़बूत करने और तेज़ी से जवाब देने वाले प्रहार समन्वय को बेहतर बनाने के लिए रचा गया, रॉकेट फ़ोर्स 27वें  संशोधन के उसी तर्क को प्रदर्शित करता है: ज़्यादा सख़्त कमान और अधिकार का कम फैलाव। कुल मिलाकर, इन डेवलपमेंट से पता चलता है कि यह संशोधन कोई अकेला संवैधानिक सुधार नहीं है, बल्कि पाकिस्तान के युद्ध लड़ने के तरीके को बड़े पैमाने को पुन: स्थापित करने का एक बड़ा हिस्सा है, जिसका मकसद संकट के समय तदर्थ व्यवस्थाओं पर निर्भर रहने के बजाय केंद्रीकृत निर्णय लेना संस्थागत बनाना है। 

गौरतलब है कि भारतीय रणनीतिक या आधिकारिक हलकों में एआरएफसी को लेकर सार्वजनिक तौर पर बहुत कम चर्चा हुई है। इसे एक अलग घटनाक्रम के रूप में देखने के बजाय, एआरएफसी को पाकिस्तान की सेना-केंद्रित कमान संस्कृति के दीर्घकालिक आकलन के अंतर्गत समाहित किया जा सकता है, और यह एक परिवर्तनकारी बदलाव के बजाय केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता के रूप में दिखाई दे सकता है। संज्ञानात्मक दृष्टि से, भारतीय रणनीतिक समुदाय के भीतर यह दृष्टिकोण घोषणात्मक प्रतिक्रिया की प्रवृत्ति को कम करता है, जिससे नई दिल्ली को रणनीतिक धैर्य बनाए रखने और यह निगरानी करने का अवसर मिलता है कि क्या पाकिस्तान का संगठनात्मक सुदृढ़ीकरण अंततः संकटकालीन व्यवहार में परिवर्तन लाता है। यह रुख नवंबर 2025 में लाल किले के विस्फोटों से निपटने के नई दिल्ली के तरीके के अनुरूप है, जिसमें किसी भी बाहरी आरोप या घोषणात्मक प्रतिक्रिया का सार्वजनिक रूप से उल्लेख करने से परहेज किया गया था। संस्थागत नियंत्रणों में कमी का अर्थ पाकिस्तान की गुप्तचर सेवाओं को अधिक स्वतंत्रता भी हो सकता है, जिनका सुरक्षा नीति पर प्रभाव ऐतिहासिक रूप से नागरिक निगरानी की मजबूती के साथ घटता-बढ़ता रहा है – यह एक चिंता का विषय है जिसे भारत अपनी दीर्घकालिक सुरक्षा योजना में सम्मिलित करेगा। 

“इस पृष्ठभूमि में, भारत के लिए मुनीर के नेतृत्व वाले पाकिस्तान का सीमित आकर्षण इस बात में निहित होगा कि एक अधिक केंद्रीकृत सत्ता से एकजुटता का आश्वासन मिलेगा—यह विश्वास स्थापित होगा कि शीर्ष स्तर पर लिए गए निर्णय सुरक्षा तंत्र में एकसमान रूप से लागू किए जा रहे हैं।”

इसके बावजूद भी, मध्यम अवधि में, भारत को यह विश्वास हो सकता है—भले ही यह अभी असंभव लगे—कि एक शक्तिशाली नेता के नेतृत्व में पाकिस्तान एक अधिक अनुमानित, भले ही सीमित, वार्ताकार साबित हो सकता है: एक अधिक केंद्रीकृत, निर्णायक नेता साहसिक शांति पहल करने में अधिक सक्षम हो सकता है। यह धारणा उस समय की याद दिलाती है जब राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़, 2000 के दशक के आरंभ में, समेकित सत्ता के साथ कार्य करते हुए, समग्र वार्ता प्रक्रिया के माध्यम से भारत से जुड़ने में सक्षम थे। कश्मीर पर गहरे मतभेदों और पूरे दशक में हुए प्रमुख आतंकवादी हमलों के बावजूद, उस अवधि में व्यापार, यात्रा और सैन्य तनाव कम करने के संबंध में सीमित लेकिन ठोस विश्वास-निर्माण उपाय किए गए, और यह 1971 के उपरांत भारत-पाकिस्तान संबंधों के सबसे निरंतर चरणों में से एक है। नई दिल्ली के लिए, यह इतिहास बताता है कि यद्यपि केंद्रीकृत सत्ता शांति की गारंटी नहीं देती है, लेकिन यह कूटनीति को तत्काल राजनीतिक पतन से बचाकर वार्ता को आगे बढ़ाने और उसे गहरा करने का रास्ता दे सकता है। 

इस पृष्ठभूमि में, भारत के लिए मुनीर के नेतृत्व वाले पाकिस्तान का सीमित आकर्षण इस बात में निहित होगा कि एक अधिक केंद्रीकृत सत्ता से एकजुटता का आश्वासन मिलेगा—यह विश्वास स्थापित होगा कि शीर्ष स्तर पर लिए गए निर्णय सुरक्षा तंत्र में एकसमान रूप से लागू किए जा रहे हैं। इससे गलत दिशा में की गई कार्यवाहियों, अस्पष्ट संकेतों और संभावित बाधाओं का जोखिम कम होगा। यदि पाकिस्तानी सेना पाकिस्तान में इतनी शक्ति जुटा सकती है कि वह ग़ाज़ा में कर्मियों की तैनाती पर गंभीरता से विचार कर सके, तो सैद्धांतिक रूप से यह उसी नेतृत्व को भारत के साथ नए सिरे से तनाव कम करने के लिए भी सक्षम बनाता है। यह कोई अपरिहार्य तथ्य नहीं है, लेकिन यह इस बात को रेखांकित करता है कि सत्ता का केंद्रीकरण नेताओं के लिए उपलब्ध विकल्पों की सीमा को बढ़ा सकता है—इसके बावज़ूद ये आवश्यक नहीं कि वे अधिक टकरावपूर्ण व्यवहार अपनाएंगे।

This article is a translation. Click here to read the original in English.

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Image 1: The White House via Wikimedia Commons

Image 2: The White House via Wikimedia Commons

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