तापी गैस पाइपलाइन: प्रगति और चुनौतियाँ

फरवरी के अंत में तुर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-भारत (तापी) गैस पाइपलाइन के अफगानिस्तान हिस्से के हेरात में उद्घाटन के साथ उम्मीद है कि यह परियोजना अगले कुछ सालों में पूरी हो जाएगी। तापी की प्रगति को बताते हुए अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ ने एक ट्वीट में कहा कि यह “आर्थिक विकास और क्षेत्रीय संपर्क का एक नया अध्याय है, जो अफगानिस्तान और इससे जुड़े चारों देशों के लिए इस परियोजना के महत्व को दर्शाता है। तुर्कमेनिस्तान द्वारा प्रचारित, यह १८१४ किलोमीटर (११२७ मील) पाइपलाइन मध्य एशिया से दक्षिण एशिया तक जाएगी, जिसमें अफगानिस्तान दोनों क्षेत्रों को जोड़ने का काम करेगा। उन चुनौतियों को देखते हुए जिनकी वजह से तापी पाइपलाइन के सफल समापन में देरी हुई है, प्रत्येक छोटा कदम महत्वपूर्ण है। हालांकि, इनमें से कई चुनौतियाँ, जैसे वित्तीय संसाधनों की कमी और साथ ही कई सुरक्षा और भू-राजनीतिक चिंताएं, अभी भी परियोजना के पूरे होने में रुकावट बन सकती हैं।

तापी पाइपलाइन की सुरक्षा में बाधाएं

तापी परियोजना से संबंधित चिंताओं में अफगानिस्तान की सुरक्षा स्थिति प्रमुख चिंता रही है। हालांकि, यह बहुत महत्वपूर्ण है कि तालिबान ने हाल ही में पाइपलाइन के निर्माण के लिए अपना खुला समर्थन देने की घोषिणा की है। यह आशा का कारण हो सकता है, लेकिन यह पहली बार नहीं है कि तालिबान ने इस परियोजना के लिए अपना समर्थन दिया है। १९९८ में, सत्तारूढ़ तालिबान ने तापी को सुरक्षा और समर्थन प्रदान करने पर अपनी सहमति व्यक्त की थी, लेकिन यह व्यवस्था बाद में बिगड़ गई। २०१६ में भी, तालिबान नियंत्रण क्षेत्रों में अफगानिस्तान की महत्वपूर्ण अवसंरचना परियोजनाओं को संरक्षण और समर्थ देने के बारे में तालिबान ने इसी तरह का बयान दिया था। पर बाद में यह खोखले वादों के रूप में सामने आए, और अफगानिस्तान में आतंकवादी समूहों द्वारा तापी को रुकावट का खतरा बना रहा।

काबुल में अफगानिस्तान के अधिकारियों के अनुसार, अफगानिस्तान की ऊर्जा की कमी को पूरा करने के अलावा, तापी की इतनी छमता है कि वह ५०० मिलियन अमरीकी डालर तक आवश्यक वित्तीय संसाधन के द्वारा इस युद्धग्रस्त देश के पुनर्निर्माण में सहायता कर सकता है। पर इन हितों की रक्षा के लिए, अफगानिस्तान ने पाइपलाइन की रक्षा के लिए ७००० सुरक्षा कर्मियों को तैनात करने का वादा किया है, जो काबुल के लिए एक बड़ा वित्तीय बोझ साबित होगा। इसके अलावा, अफगानिस्तान को अपनी ऊर्जा अवसंरचना की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी होगी , जिसमें ट्रांसमिशन लाइन और बिजली ग्रिड शामिल हैं जो अक्सर तालिबान द्वारा निशाना बनते हैं। अगर तापी को अफगानिस्तान के लिए सफल होना है, और पाकिस्तान और भारत के लिए भी, तो काबुल सरकार को पाइपलाइन और उसकी ऊर्जा अवसंरचना के संरक्षण के लिए विशाल संसाधन समर्पित करना होगा।

इसी तरह, पाकिस्तान में ऊर्जा की कमी है जो अपनी ऊर्जा की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए मध्य एशियाई गैस का लाभ उठाएगा। हालांकि, ८२६ किमी (५१३ मील) लंबी तापी  पाइपलाइन के पाकिस्तान खंड का एक बड़ा हिस्सा बलूचिस्तान प्रांत में आता है, जो उग्रवाद से ग्रस्त है। बलूचिस्तान की राजधानी   क्वेटा में कई इस्लामी राज्य के आतंकवादी हमले हुए हैं। इस प्रकार, तापी पाइपलाइन के अफगानिस्तान और पाकिस्तान के भागों में बड़ी सुरक्षा चुनौतियाँ हो सकती हैं।

भू-राजनीतिक चुनौतियाँ

सुरक्षा चुनौतियों के अलावा, इस अंतर्राष्ट्रीय पाइपलाइन परियोजना के लिए भू-राजनीतिक चिंताएं भी प्रमुख हो सकती हैं। जैसे उसकी ऊर्जा ज़रूरतें लगातार बढ़ती हैं, भारत, जो २००६ में इस परियोजना का हिस्सा बना था, को तापी के कार्यात्मक होने से बेहद लाभ होगा। इस परियोजना के माध्यम से, भारत ऊर्जा-संपन्न मध्य एशियाई गणराज्यों के साथ संपर्क स्थापित करने में सक्षम हो जाएगा, जिनसे अपने पड़ोसी देशों पाकिस्तान और चीन के साथ तनाव के कारण नई दिल्ली अभी संपर्क नहीं बना पाया है। इस कारण, नई दिल्ली वैकल्पिक मार्ग तलाश कर रहा है, खासकर ईरान के रास्ते। मध्य एशियाई देशों ने भी भारत के साथ अपने आर्थिक संबंध बढ़ाने में रुचि दिखाई है–इस बात का सबूत यह है कि कजाकिस्तान ने पाइपलाइन के माध्यम से भारत में हर साल ३ बिलियन क्यूबिक मीटर प्राकृतिक गैस की आपूर्ति करने में दिलचस्पी दिखाई है। लेकिन नई दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच बढ़ती दूरी को भी हल करना होगा ताकि भारत ऊर्जा पर क्षेत्रीय सहयोग से लाभ उठा सके। एक गंतव्य देश के रूप में, भारत का नुकसान हो सकता है अगर एक पारगमन देश, विशेष रूप से पाकिस्तान, अपने निहित स्वार्थ को पूरा करने के लिए भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव के दौरान गैस की आपूर्ति को रोकने या नियंत्रित करने के लिए अपनी मजबूत स्थिति का लाभ उठाए।

वित्तीय चिंताएं

एक चुनौती जो परियोजना से जुड़े सभी देशों के लिए सामान्य है वह है पाइपलाइन की वित्त व्यवस्था। सभी देशों की सरकारी गैस कंपनियां पाइपलाइन की कंसोर्टियम, तापी पाइपलाइन कंपनी लिमिटेड, का हिस्सा हैं। पर तुर्कमेनिस्तान की सरकारी कंपनी तुर्कमेन्गाज कंसोर्टियम की अगुवाई कर रही है और उसने परियोजना के लिए आवश्यक ८५ % वित्तपोषण की व्यवस्था करने का वादा भी किया है। शेष १५ प्रतिशत अफगानिस्तान, पाकिस्तान, और भारत  को बराबर बराबर देना होगा। फिर भी, इस बड़ी परियोजना की वित्त व्यवस्था करने की कंसोर्टियम की क्षमता पर प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है। उदाहरण के लिए, तुर्कमेनिस्तान ने २०१५ में पाइपलाइन के २१४ किमी (१३३ मील) हिस्से के लिए एक अभूतपूर्व समारोह का आयोजन किया था, लेकिन क्या यह हिस्सा पूरा भी हुआ है या नहीं यह अभी सवाल के दायरे में है क्योंकि इसके पूरे होने या इसकी प्रगति का सबूत उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा, गैस की कीमत में कमी के चलते देश वित्तीय संकट से गुज़र रहा है और पाइपलाइन के निर्माण के लिए प्रमुख वैश्विक ऊर्जा कंपनियों से भी कुछ ज्यादा धन नही प्राप्त कर सका है। हालांकि एशियन डेवलपमेंट बैंक इस परियोजना का कुछ वित्तपोषण कर रहा है, लेकिन जैसे जैसे पाइपलाइन के निर्माण का काम आगे बढ़ रहा है विदेशी धन भी अधिक महत्वपूर्ण होता जा रहा है।

सऊदी अरब ने सऊदी विकास कोष के माध्यम से तापी पाइपलाइन के वित्तपोषण में कुछ रुचि दिखाई है। उम्मीद है कि जैसे ही जापान और तुर्कमेनिस्तान के बीच चल रही बातचीत समाप्त होती है, जापान भी इस परियोजना का समर्थन करेगा। बीजिंग भी यह भूमिका निभा सकता है क्योंकि तुर्कमेनिस्तान चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) का हिस्सा है और चीन तुर्कमेन गैस का सबसे बड़ा ख़रीदार भी है। इससे बीआरआई को भारत की पश्चिमी सीमाओं तक विस्तारित करने में चीन को मदद मिलेगी, क्योंकि तापी के कार्य का मतलब मध्य एशिया और भारत के बीच अधिक संपर्क और संबंध होगा। पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, और तुर्कमेनिस्तान के साथ चीन के घनिष्ठ संबंध के कारण बीआरआई को पाकिस्तान तक बढ़ाना मुमकिन होगा, जहां चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (सीपीईसी) गति पकड़ रहा है। हालांकि, आर्थिक रूप से तापी पाइपलाइन को समर्थन देने की इच्छा पर चीन की तरफ से अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। पाइपलाइन और इसकी अवसंरचना के निर्माण के लिए देशों की तरफ से वित्तीय सहायता की आवश्यकता होगी ताकि भागीदार देश उन तक पहुंचने वाली गैस का उपयोग कर सकें। तापी के लिए विदेशी वित्तीय सहायता के सवाल पर अभी तक दृष्टिकोण साफ़ नहीं है और यह देखने की बात है कि यह परियोजना कैसे पूरी होती है।

निष्कर्ष

तापी के भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक महत्व को देखते हुए, उम्मीद यह है कि भारत और पाकिस्तान भी पारस्परिक आर्थिक लाभ के लिए अपने मतभेद को अलग रख कर एक साथ आएँगे। लेकिन चुनौतियाँ कई हैं और उनसे निपटने के लिए बहुत कम वित्तीय सहायता उपलब्ध है। इस १० अरब डॉलर की परियोजना के लिए तालिबान की तरफ से सुरक्षा का आश्वासन २०२० तक सभी दलों में ऊर्जा और उसकी सुरक्षा बढ़ाने में परिवर्तनकारी हो सकता है, अगर यह पाइपलाइन प्रस्तावित समय सीमा तक पूरी हो जाती है। वित्तीय और सुरक्षा मुद्दे हल हो जाने पर और निर्माण के सुचारु रूप से आगे बढ़ने के बावजूद भी बाधाएं हैं: सभी पार्टियों को अभी भी मूल्य निर्धारण व्यवस्था, गैस कोटा, और सैन्य चुनौतियों पर सहमति बनानी होगी। एक और पुराना और जटिल मुद्दा है भारत और पाकिस्तान के बीच सहयोग और मुकाबले का खेल, जो एक हताश-जनक मुद्दा है जिसके जल्द हल होने की संभावना नहीं है। इन सारी मुश्किलों के बावजूद, तापी गैस पाइपलाइन दक्षिण एशिया में ऊर्जा और विश्वास के अभाव को कम करने में मददगार हो सकती है।

Editor’s note: To read this piece in English, please click here.

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Image 1: USACE Afghanistan Engineer District-South via Flickr

Image 2: Hoshang Hashimi via Getty

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Chithra Purushothaman

Chithra Purushothaman

Chithra Purushothaman is a researcher in the Non-Traditional Security Centre at Institute for Defence Studies and Analyses (IDSA), New Delhi. She recently received her PhD from the Centre for International Politics, Organization and Disarmament (CIPOD), Jawaharlal Nehru University, specializing in emerging powers and their development assistance. At IDSA, her work is focussed on India's foreign policy and energy security. She has previously worked as a guest faculty in Jawaharlal Nehru University and has held research positions in Centre for Policy Research and MyGov India.

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