भारत की एनएसजी अभ्यर्थिता में आश्चर्यजनक मोड़

परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में  जगह बनाने के लिए भारतीय प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी का प्रयास एक बार फिर विफल रहा जब जून में हुई २७ वी  बैठक के दौरान भारत को समर्थन देने वाला प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया गया। भाग लेने वाले राज्यों ने नवंबर में एक और अनौपचारिक बैठक आयोजित करने पर सहमति जताई , जिससे भारत को पूर्ण सदस्यता के लिए अपनी योजना तैयार करने  का एक और मौका मिलेगा।

पर भारत का प्रयास एक आश्चर्यजनक विरोधी द्वारा बाधित हो सकता है–अमेरिका। ट्रम्प से मिले संकेतों के अनुसार, यह स्पष्ट नहीं है कि अमेरिकी प्रशासन भारत की सदस्यता के लिए किस हद तक समर्थन देगा। भारत का एनएसजी इतिहास बुश और ओबामा प्रशासन के दौरान मजबूत अमेरिकी समर्थन से परिभाषित रहा है।  यह समर्थन महत्वपूर्ण था, लेकिन अब लगता है  जैसे ट्रम्प की प्राथमिकताएं कहीं और  हैं। प्रशासन  के पास पहले से ही ढेर सारी परेशानियां हैं जिसपर ध्यान देने की आवश्यकता है, जैसे की कोरियाई प्रायद्वीप में बढ़ता तनाव, अफगानिस्तान में पुनर्गठित प्रयास और इस्लामी राज्य के खिलाफ लड़ाई । यदि ट्रम्प प्रशासन एनएसजी में भारत के प्रवेश के लिए अपने संसाधन केंद्रित भी करता है तो भी यह स्पष्ट नहीं है कि वह कोशिशें कितनी सफल होंगी।

एनएसजी में भारत-अमेरिका दोस्ती का इतिहास

जॉर्ज डब्लू बुश प्रशासन ने भारत के परमाणु कार्यक्रम के विरोध में दशकों पुरानी अमेरिकी  नीति को उलट दिया और भारत के लिए एनएसजी में विशेष छूट का समर्थन किया| यह २००८ में भारत अमेरिका परमाणु समझौते के एक आवश्यक घटक के रूप में भारत को प्रदान किया गया। इस समझौते के माध्यम से, बुश प्रशासन ने भारत के साथ परमाणु सहयोग में एक नया अध्याय शुरू किया और यह किसी गैर एनपीटी हस्ताक्षरकर्ता देश के साथ परमाणु सहयोग का सबसे पहला उदाहरण बना। भारत को परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर किए बिना, नागरिक परमाणु के व्यापार के लिए अनुमति प्रदान की गई। एनएसजी में इस छूट के परिणामस्वरूप, भारत को वैश्विक परमाणु बाजार का हिस्सा मिला और अब जापान, रूस और ऑस्ट्रेलिया सहित कई अन्य राज्यों के साथ भारत के परमाणु सहयोग समझौते हैं।    

बुश प्रशासन की अभूतपूर्व नीति ओबामा प्रशासन में भी जारी रही | उदाहरण के लिए, ओबामा प्रशासन ने परमाणु कार्टेल में भारत को लाने के लिए महत्वपूर्ण राजनयिक पूँजी का विस्तार किया । इस प्रकार, अमेरिका ने लगभग एक दशक से एनएसजी में भारत को समर्थन दिया है। परमाणु अप्रसार के दौर में गैर-एनपीटी राज्यों के सामान्यकरण पर चिंता और दक्षिण एशियाई क्षेत्र में असंतुलन पैदा करने वाले भारत के परमाणु विस्फोटक पदार्थों (fissile material) के होते हुए भी, बुश और बाद में ओबामा ने भारत अमेरिका परमाणु सहयोग का समर्थन किया । २०५० तक परमाणु ऊर्जा के माध्यम से  २५ प्रतिशत बिजली आपूर्ति करना भारत का उद्देश्य है, इसकी वजह से भारतीय परमाणु ऊर्जा क्षेत्र अमेरिका के परमाणु उद्योग के लिए एक आकर्षक बाजार बन गया है।

ऊर्जा और आर्थिक चिंताओं से परे, भारत इस समूह में  प्रवेश इस लिए भी करना चाहता है ताकि भारत अपनी “महान शक्ति” कि छवि को सुधार सके और विशेष रूप से वैश्विक स्तर पर परमाणु निर्यात नीतियों को प्रभावित कर सके।

भारत की एनएसजी अभ्यर्थिता: नई चुनौतियाँ

एनएसजी  सदस्यता के लिए भारत का प्रयास कहाँ तक “अमेरिका फर्स्ट” नीति से मील खाते  हैं, यह अभी कहना कठिन है । लेकिन ट्रम्प  प्रशासन द्वारा इस मुद्दे को दिए गए महत्व पर संदेह रहा है क्योंकि मार्च में भारत की सदस्यता के लिए औपचारिक रूप से समर्थन की घोषणा करने से पहले  प्रशासन महीनों तक चुप था। नई दिल्ली के लिए संभावित चुनौती का हालिया संकेत यह है कि जब व्हाइट हाउस के प्रवक्ता से यह पूछे गया कि क्या अमेरिका ने चीन के साथ भारत की एनएसजी सदस्यता का प्रश्न उठाया, तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया

China in South Asia

अगर ट्रम्प प्रशासन भारत की सदस्यता के लिए प्रयास करने का विचार करता भी है, तो इसकी संभावना कम है कि वह एनएसजी सदस्य राज्यों के लिए नियमों को नियंत्रित करने की स्थिति में होगा। २००८ के बाद से परमाणु बाजार में सफल सहभागिता प्राप्त करने के बाद भी भारत एनएसजी सदस्यता के लिए वोट जोड़ने में सक्षम नहीं रहा है। जून में एनएसजी की बैठक के दौरान, एनएसजी सदस्य देशों ने एनपीटी की एक व्यापक और प्रभावी कार्यान्वयन पर ज़ोर दिया ताकि यह एनएसजी सदस्य राज्य द्वारा दिए गए पूर्ण मतदान अधिकार और व्यापार की अनुमति के लिए शर्त बन जाए। इससे पहले जून २०१६ में सियोल शिखर सम्मेलन के दौरान, चीन,आस्ट्रिया,आयरलैंड, स्विट्जरलैंड, ब्राजील, तुर्की और मैक्सिको जैसे राज्यों ने भारत की सदस्यता का विरोध किया और यह कहा कि एनपीटी का पालन सदस्यता के लिए आवशयक है। कुछ एनएसजी सदस्यों द्वारा इस सैद्धांतिक रुख के कारण, भारत को एनएसजी में लाने के लिए अमेरिका की देश-विशिष्ट विस्तार की कोशिशों की जोरदार आलोचना की गई। यदि एनपीटी  गैर-हस्ताक्षरकर्ता के रूप में भारत शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए वैश्विक परमाणु व्यापार में भाग ले कर परमाणु हथियार क्षमता विकसित करता है तो एनपीटी- हस्ताक्षरकर्ता राज्यों के साथ धोखा होगा। इसके अतिरिक्त, एनएसजी के ४८सदस्य राज्यों में से ३३ यूरोपीय देशों हैं जहां ट्रम्प की नीतियों ने पहले से ही संदेह पैदा कर रखा है।

इसी तरह पिछले दो अमेरिकी प्रशासनों की महत्वपूर्ण उपलब्धियों के बाद भी, काम से काम अभी तो पूर्ण भारतीय एनएसजी सदस्यता का सवाल ही पैदा नहीं होता। घरेलू नीति में किसी महत्त्वपूर्ण बदलाव की स्थिति को छोड़कर, ऐसा नहीं लगता कि भारत कभी भी एनपीटी पर हस्ताक्षर करेगा । केवल एकमात्र तरीका है जिससे भारत पूर्ण एनएसजी सदस्यता प्राप्त कर सकता है–यदि  एनपीटी पर मूलभूत विचार रखने वाले कुछ एनएसजी सदस्य अपना मन बदल लें। और ट्रम्प इस संबंध में कोई मदद नहीं कर सकेंगे। न केवल वह घरेलू और विदेशी प्राथमिकताओं से विचलित होंगे बल्कि उनके नाम वह वज़न नहीं है जो पिछले दो राष्ट्रपतियों में था। इन कारणों की वजह से नवंबर में होने वाले एनएसजी बैठक में भारत  की सदस्यता की संभावना को नुकसान पहुँचेगा।

Editors note: To read this article in English, click here

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Image 1: Press Information Bureau, Government of India

Image 2: The British Foreign and Commonwealth Office via Flickr

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Yasir Hussain

Yasir Hussain

Yasir Hussain is SAV Visiting Fellow July 2017. He holds a masters degree in International Relations from Quaid-i-Azam University, Islamabad. He has a deep interest in global issues, particularly nuclear arms control and disarmament, nuclear safety and security, political economy, and conflict resolution. He tweets @yasirhunzai1.

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