फ़रवरी के अंत में, इस्लामाबाद राजधानी क्षेत्र (आईसीटी) में मस्जिदों पर हुए आतंकवादी हमलों के उपरांत, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) पर आरोप लगाते हुए पाकिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान के सीमावर्ती प्रांतों पर हवाई प्रहार किए, जिसके अंतर्गत टीटीपी और इस्लामिक राज्य खुरासान प्रांत (आईएसकेपी) के ठिकानों पर सीधा निशाना साधा गया। प्रतिउत्तर में, अफ़ग़ान तालिबान ने पाकिस्तान की सैन्य सीमा चौकियों पर हमला कर दिया। पिछले कुछ हफ़्तों के दौरान दोनों तरफ़ से जवाबी प्रहार जारी रहे हैं, जिनमें काबुल और कंधार में पाकिस्तान के ओर हमले जिसमें कंधार हवाई अड्डे पर एक ईंधन डिपो और, तालिबान अधिकारियों के अनुसार, काबुल के एक अस्पताल पर किया गया हमला भी शामिल है। अपनी ओर से, अफ़ग़ान सेना ने रावलपिंडी की ओर दो ड्रोन भेजे, जिन्हें पाकिस्तानी सेना ने उनके लक्ष्य तक पहुँचने से पूर्व, इलेक्ट्रॉनिक जवाबी उपायों की सहायता से नाकाम कर दिया। हालाँकि ईद-उल-फ़ित्र के मौके पर कुछ समय के लिए संघर्ष विराम रहा, परंतु अब लड़ाई पुनः प्रारम्भ हो गई है—जिसे पाकिस्तान के रक्षा मंत्री पहले ही “खुला युद्ध” घोषित कर चुके हैं।
पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच धारणाओं की लड़ाई भी है। 2021 में तालिबान शासन की वापसी के बाद से, पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान पर उन समूहों को पनाह एवं समर्थन देने का आरोप लगाता रहा है—जिनमें सबसे प्रमुख टीटीपी है—और जिसकी वजह से अकेले 2025 में ही पाकिस्तान में आतंकवादी हमलों की संख्या में 34 प्रतिशत की वृद्धि हुई। पाकिस्तानी वार्ताकारों ने बारम्बार यह कहा है कि टीटीपी और बलूच अलगाववादियों के विरुद्ध तालिबान अधिकारियों की कथित निष्क्रियता का तात्पर्य है कि वे दोहा शांति समझौते के तहत आतंकवाद पर लगाम लगाने के अपने आश्वासनों को पूरा करने में विफल हो रहे हैं। दूसरी ओर, तालिबान अधिकारी इस तथ्य पर प्रबल ज़ोर देते हैं कि टीटीपी और उससे जुड़ी सुरक्षा चिंताएँ पाकिस्तान की आंतरिक समस्याएँ हैं, और वे इस दावे को खारिज करते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान अपनी धरती से उग्रवादियों को कार्य करने की अनुमति देता है। वे यह तर्क भी देते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान की धरती पर प्रहार करके पाकिस्तान अफ़गानिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन करता है।
बार-बार उत्पन्न हुए संकटों के उपरांत, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच तनाव का यह नवीनतम विस्फोट इस तथ्य को रेखांकित करता है कि पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा एक प्रमुख सुरक्षा मोर्चे के रूप में उभर रही है। ऐसे समय में जब इस्लामाबाद – खाड़ी और मध्य पूर्व में बिगड़ती सुरक्षा स्थिति से पहले से ही अतिरिक्त दबाव का सामना कर रहा है – (ऐसे समय में) इस्लामाबाद किसी भी रणनीतिक भटकाव को बर्दाश्त नहीं कर सकता। हालाँकि अफ़ग़ानिस्तान से सीमा पार आतंकवाद पाकिस्तान के लिए एक गंभीर समस्या का कारण है, पश्चिमी सीमा पर बढ़ती आक्रामक नीति पाकिस्तान को रणनीतिक रूप से दुर्बल कर सकती है। भारत की आक्रामकता को रोकने और घरेलू आतंकवाद का मुक़ाबला करने जैसी दीर्घकालिक प्राथमिकताओं से ध्यान भटका सकती है। एक अधिक स्थायी दृष्टिकोण हेतु संस्थागत राजनयिक जुड़ाव और सुनियोजित सैन्य दंडात्मक उपायों की दोहरी रणनीति की आवश्यकता होगी।
अफ़ग़ानिस्तान और टीटीपी के प्रति पाकिस्तान की नीति
2021 में तालिबान की काबुल में वापसी के साथ, पाकिस्तान को अपेक्षा थी कि तालिबान दोहा शांति समझौते में अपनी प्रतिबद्धताओं के अनुसार टीटीपी को नियंत्रित करेगा, और संभवतः पाकिस्तान को भारतीय आक्रामकता के विरुद्ध वह रणनीतिक गहराई प्रदान करेगा जिसके लिए पाकिस्तान हमेशा से आशाविंत रहा है| ये धारणाएँ परंतु अल्पकालिक सिद्ध हुईं: तालिबान और टीटीपी के बीच ऐतिहासिक और वैचारिक संबंधों तथा सांगठनिक जुड़ावों के कारण तालिबान के लिए टीटीपी के विरुद्ध निर्णायक कार्यवाही करना कठिन हो जाता है, भले ही वे ऐसा करना चाहते हो। इन संबंधों के कारण तालिबान के लिए टीटीपी का प्रयोग अपने पूर्व संरक्षक के विरुद्ध एक छद्म के तौर पर करना भी आसान हो जाता है। इसके अतिरिक्त, तालिबान अपनी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय वैधता बनाना चाहता है, और ऐसा करने के लिए उसे अपनी रणनीतिक स्वायत्तता पर ज़ोर देना पड़ता है। नतीजतन, टीटीपी पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान दोनों के सीमावर्ती इलाकों में और अधिक मज़बूत हो गया है, जिससे उसे पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और बाद में आम नागरिकों पर होने वाले हमलों की रफ़्तार और हाल ही में उनके पैमाने को बढ़ाने का अवसर मिल गया है।
2021 से, पाकिस्तान अपने पश्चिमी पड़ोसी के साथ अपनी कुंठाओं को संभालने के लिए द्विपक्षीय कूटनीति और सैन्य-स्तरीय संपर्क के साथ-साथ, तीसरे पक्ष की मध्यस्थता पर निर्भर रहा है। अपनी निराशा के बावजूद, पाकिस्तान ने अक्टूबर 2025 तक इसी रणनीति का पालन किया; उस समय, पाकिस्तानी सैनिकों पर टीटीपी के हमले के उपरांत, उसने अफ़ग़ानिस्तान के भीतर, —विशेष रूप से काबुल में, जवाबी हवाई हमले किए, जिनका कथित उद्देश्य टीटीपी प्रमुख नूर वली महसूद पर निशाना साधना था। अफ़गानिस्तान के प्रति पाकिस्तान की नीति में आए बदलाव में न केवल अफ़ग़ानिस्तान में टीटीपी के ठिकानों पर सीधे हमले समिल्लित थे, बल्कि इसमें अफ़गान शरणार्थियों की वापसी और दोनों देशों के बीच सीमा चौकियों को बार-बार बंद करने से जुड़ी एक निर्णायक नीति भी शामिल थी। यह रणनीति एक प्रभावशाली बदलाव को इंगित करती है — सुलह-समझौते वाली रणनीति से हटकर दबाव बनाने वाले संकेतों वाली रणनीति की ओर परिवर्तन। इस रणनीति के पीछे का उद्देश्य अफ़ग़ान तालिबान के लिए मुश्किलों को बढ़ाना और एक ऐसा बचाव क्षेत्र निर्मित करना था, जिसके माध्यम से सीमा चौकियों को निशाना बनाकर और अमेरिका के हटने के बाद पीछे छूटे गोला-बारूद के विशाल भंडार को नष्ट करके, सीमा पार से होने वाले घुसपैठ को रोका जा सके।
हालाँकि अफ़ग़ानिस्तान से सीमा पार आतंकवाद पाकिस्तान के लिए एक गंभीर समस्या का कारण है, पश्चिमी सीमा पर बढ़ती आक्रामक नीति पाकिस्तान को रणनीतिक रूप से दुर्बल कर सकती है। भारत की आक्रामकता को रोकने और घरेलू आतंकवाद का मुक़ाबला करने जैसी दीर्घकालिक प्राथमिकताओं से ध्यान भटका सकती है।
ज़मीन पर हुई भीषण लड़ाई के बाद, अक्टूबर के आखिर में दोनों देशों ने एक दुर्बल युद्ध विराम पर स्वीकृति जताई, जिसे अंजाम देने के लिए, क़तर, तुर्की और सऊदी अरब ने मध्यस्थता की। इसके चलते युद्ध विराम को बनाए रखने और निगरानी के तरीके विकसित करने के लिए क़तर और तुर्की में वार्तालाप के कई दौर हुए। परंतु दोनों ओर से अलग-अलग दावों और टीटीपी के मुद्दे पर कोई आम राय न बन पाने की वजह से, यह युद्ध विराम अधिक समय तक नहीं चला, और 2026 में और ज़्यादा हमले हुए और तनाव में वृद्धि भी देखी गई।
पिछले कुछ सप्ताहों से बढ़े संघर्ष और कूटनीतिक गतिरोध ने तात्कालिक रणनीतिक जोखिम को जन्म दिया है। सर्वप्रथम, लम्बी अवधि से चल रहे संघर्ष ने सीमावर्ती क्षेत्रों को ओर सैन्यीकृत कर दिया है, जहाँ दुर्ग बंदी और ड्रोन निगरानी प्रणालियों का उपयोग आंतरिक निगरानी और आक्रमणकारी हमलों दोनों के लिए किया जा रहा है, जिससे यह असममित तकनीकी युद्ध में परिवर्तित हो गया है। इस दोहरे उपयोग वाली निगरानी से संघर्ष बढ़ने की संभावना कम हो जाती है क्योंकि यह अधिक बार, कम लागत वाले और अस्वीकार्य हमलों को संभव बनाती है, जबकि साथ ही यह सीमावर्ती क्षेत्रों के सैन्यीकरण को एक डिजिटल और निगरानी वाले तंत्र में परिवर्तित कर देती है।
द्वितीय, पाकिस्तान द्वारा चमन और तोरखम क्रॉसिंग को बंद करने से, सामान की कमी के कारण अफ़ग़ानिस्तान में मानवीय संकट का ख़तरा बढ़ गया है। मानवीय संकट के अतिरिक्त, इस स्थिति में कई रणनीतिक जोखिम भी समाहित हैं, जिनमें आर्थिक तंगी के कारण लोगों का बड़ी संख्या में और बिना किसी रोक-टोक के पाकिस्तान में प्रवेश करना, और उग्रवादियों की घुसपैठ में वृद्धि होना भी समिल्लित है।

अंत में, बारम्बार आने वाले संकटों ने पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के मध्य में पूर्ववर्ती रूप से विद्यमान नाज़ुक राजनयिक संबंधों को बुरी तरह से तोड़ दिया है। द्विपक्षीय वार्ता के किसी आधार या किसी तीसरे पक्ष के जान-बूझकर किए गए हस्तक्षेप के बिना, दोनों देश अपनी सीमाओं के भीतर हिंसा के प्रति और भी अधिक संवेदनशील हो जाएँगे और सीमा पार तनाव बढ़ाने हेतु पूर्ण रूप से तत्पर भी रहेंगे।
व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष के मध्य में पाकिस्तान का रणनीतिक संतुलन
ईरान पर अमेरिका और इज़राइल के हमलों ने खाड़ी और मध्य-पूर्व में सुरक्षा के समीकरण बदल दिए हैं, और इसका दक्षिण एशिया के रणनीतिक समीकरणों पर भी दूरगामी असर भी दिखेगा। पाकिस्तान को अब अपनी पश्चिमी और पूर्वी, दोनों सीमाओं पर सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, और वह क्षेत्रीय अस्थिरता के बढ़ने के प्रति अधिक संवेदनशील हो गया है—जिसमें उसकी ऊर्जा सुरक्षा भी समिल्लित है। इन सभी मोर्चों पर, पाकिस्तान अपनी निवारक क्षमता को बनाए रखते हुए तनाव बढ़ने से बचने के प्रयत्न कर रहा है। हालाँकि, इस्लामाबाद की इस रणनीति में कुछ सीमाएँ भी अंतर्निहित हैं।
सर्वप्रथम, तालिबान पर पाकिस्तान का प्रभाव सीमित है। 2021 से पूर्व, पाकिस्तान का प्रभाव विभिन्न कारकों पर आधारित था। —जिनमें तालिबानी नेतृत्व, उनके परिवारों और उनके व्यवसायों का पाकिस्तानी ज़मीन से जुड़ाव भी समिल्लित था। हालाँकि, तालिबान की अपने नए शासन के लिए अंतरराष्ट्रीय मान्यता और वैधता प्राप्त करने की इच्छा का मतलब था कि वह पाकिस्तान पर कम निर्भर था। इसके उत्तर में, पाकिस्तान का दंडात्मक उपायों पर निर्भर रहना—विशेष रूप से अफ़ग़ान शरणार्थियों की शीघ्र-अति-शीघ्र वापसी का विकल्प पाकिस्तान पर उल्टा पड़ गया: इसका विपरीत असर आम अफ़ग़ानों पर पड़ा, परंतु इसके चलते तालिबान नेतृत्व ने आतंकवादी समूहों को मजबूरी में आतंकवादी गुटों को पनाह देना समाप्त नहीं किया। इसके अलावा, पाकिस्तान के हवाई हमले भी बदलाव लाने में नाकाम रहे हैं; हालाँकि यह निश्चित रूप से विश्व भर में चल रहे हवाई अभियानों के समक्ष एक समस्या बनकर उभरा है, परंतु पाकिस्तान का सीमित प्रभाव और उसकी विद्यमान रणनीति उसके दबाव उत्पन्न करने के प्रयासों में कोई बड़ी सफलता दिला पाएगी, इसकी संभावना अभी कम प्रतीत होती है।
दूसरी बात, पश्चिम एशिया में चल रहे बड़े क्षेत्रीय संकट के कारण पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान विवाद से कूटनीतिक ध्यान हट गया है।क़तर, सऊदी अरब और तुर्की, जो इस्लामाबाद और काबुल के बीच मुख्य मध्यस्थ थे, अब विद्यमान युद्ध के कारण अपनी ही सुरक्षा को लेकर सीधी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। द्विपक्षीय कूटनीति की गुंजाइश कम होती देख, चीन ने अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने की चेष्टा की है। हालाँकि, दोनों पक्षों के साथ जुड़ाव के बावजूद, चीन को भी वैसी ही समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जैसी पहले के मध्यस्थों को करनी पड़ी थीं: पाकिस्तान ने यह साफ़ कर दिया है कि जब तक तालिबान सरकार अफ़ग़ानिस्तान की भूमि पर सक्रिय टीटीपी और अन्य आतंकी गुटों की उपस्थिति को लेकर अपना रुख नहीं बदलती, तब तक वह वार्ता न करने की अपनी नीति पर क़ायम रहेगा। ऐसे में, संभावना यही है कि पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच तनाव और टकराव का यह सिलसिला अभी कुछ समय तक जारी रहेगा।
निकट भविष्य में पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती सीमा पार से होने वाले उग्रवाद को कम करना होगी, और साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि काबुल के साथ उसका टकराव लम्बी अवधि का न हो।
निष्कर्ष
तथापि, दोनों देशों के व्यापार और सीमा पर स्थिरता पर निर्भरता होने के कारण, उनके बीच पूरी तरह से टकराव होने की संभावना कम है; फिर भी, अफ़ग़ानिस्तान से पाकिस्तान पर हाल ही में हुए ड्रोन हमले साफ़ तौर पर यह संकेत देते हैं कि भविष्य में तालिबान सस्ती, परंतु अशांति फैलाने वाली तकनीकों का सहारा ले सकता है—यह एक ऐसा सबक है जो शायद उन्होंने यूक्रेन युद्ध और ईरान संकट जैसे वैश्विक संघर्षों से सीखा है। निकट भविष्य में पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती सीमा पार से होने वाले उग्रवाद को कम करना होगी, और साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगी कि काबुल के साथ उसका टकराव लम्बी अवधि का न हो।
इस्लामाबाद के लिए एक टिकाऊ तरीका यह होगा कि वह काबुल के साथ कूटनीतिक वार्ता को अलग-थलग न करे, बल्कि चुनिंदा सख़्त उपायों के साथ-साथ इसे चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़े। इसके लिए मौजूदा दुश्मनी को समाप्त करने और तालिबान से टीटीपी को पनाह न देने का एक ऐसा पक्का वादा प्राप्त करने की दिशा में काम करने के लिए, द्विपक्षीय माध्यमों और किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को प्राथमिकता देना आवश्यक है। इसके लिए पाकिस्तान को टीटीपी के अहम ठिकानों के विरुद्ध, गुप्तचर संचालन समेत, सोच-विचार कर सख़्त क़दम उठाने होंगे। ये क़दम तालिबान पर निष्क्रियता का दबाव बनाने के लिए पाकिस्तान के मौजूदा आर्थिक और पारगमन के असर को और मज़बूती प्रदान करेंगे। हालाँकि, अपनी खुद की अंदरूनी सुरक्षा व्यवस्था को प्रबलता प्रदान किए बिना, पाकिस्तान कोई क़ामयाबी हासिल नहीं कर पाएगा। इस उद्देश्य से, पाकिस्तान को अपनी सीमा नियंत्रण व्यवस्था को बेहतर बनाना चाहिए और अपनी अंदरूनी आतंकवाद-रोधी क्षमता को मज़बूत करना चाहिए। इसके लिए उसे सीमा के अधिक संवेदनशील इलाकों और चौकियों पर ख़ुफ़िया, निगरानी और आईएसआर क्षेत्र को विकसित करना होगा, और अहम चौकियों पर बायोमेट्रिक सीमा प्रबंधन प्रणाली प्रारम्भ करनी होगी। इन क़दमों को उठाए बिना, अफ़ग़ानिस्तान के साथ एक लंबे समय तक चलने वाला टकराव पाकिस्तान को अपनी सैन्य शक्ति का एक बड़ा हिस्सा—जिसमें हवाई ताक़त भी शामिल है को पश्चिम सीमा से आने वाले ख़तरों से निपटने के लिए पुनःस्थापित करने के लिए मजबूर कर सकते हैं। इससे पूरब में अपने मुख्य प्रतिस्पर्धी, भारत को रोकने की उसकी क्षमता पर प्रश्न चिन्ह लग सकते हैं।
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