Not War, Not Peace?: Motivating Pakistan to Prevent Cross-Border Terrorism  यह किताब वर्तमान समय के द्विपक्षीय इतिहास के संदर्भ में, दक्षिण एशिया के दो प्रमुख खिलाड़ियों, भारत और पाकिस्तान, कि व्यवहारिक अभिप्रेरणओं को समझने का परकोविच और डॉल्टन द्वारा एक प्रयास है। सीमा पार आतंकवाद को रोकने के लिए, भारत पाकिस्तान को कैसे प्रेरित कर सकता है इस तथ्य को समझने की एक कोशिश है। यह एक कठिन लेकिन महत्वपूर्ण अभ्यास है । यह किताब दक्षिण एशिया में स्पष्ट राज्य प्रायोजित हिंसा के घटते पदचिह्न की प्रशंसा करती है, और इस बात की भी कि उसकी जगह धीरे-धीरे दूसरे समूहों ने ले ली है जो राज्य के नियंत्रण में हो भी सकते हैं और नहीं भी। नई दिल्ली और इस्लामाबाद में राजनीतिक बहस की अपवर्तित प्रकृति को देखते हुए, परकोविच और डॉल्टन यह भी लिखते हैं कि जब बात पड़ोसी संबंधों के समीकरण की आती  है तो कार्यनीति, एकात्मक तर्कसंगत अभिकर्ता, कोम्पेल्लेंस (compellence) और डिटरेन्स (deterrence) के बारे में पाठ्यपुस्तक धारणाएं एवं मान्यताएं शायद दुनिया के इस हिस्से में ठीक से लागु न हो पाए।

वर्ष 2008 के बाद से ये सवाल इस्लामाबाद में काफी अटकलों का विषय रहा है कि सीमा पार आतंकी गतिविधियों के दोहराए जाने के बावजूद क्या भारत सामरिक संयम की नीति का पालन जारी रखेगा? ये शायद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के तेजी से वृद्धि और उसके पाकिस्तान पर सख्त बात करने की प्रवृत्ति की वजह से हो सकता है। Not War, Not Peace मे प्रस्तुत तर्को से कुछ नतीजे निकलते है: पहला, भारतीय राजनीति पारंपरिक सैन्य प्रतिशोध (conventional military retaliation) से परहेज करने वाली है, इसके बावजूद कि भारत का एक मजबूत राज्य में क्रमिक परिवर्तन सैन्य और गुप्त क्षमताओं को बढ़ाता है। दूसरा, अहिंसक कोम्पेल्लेंस (non-violent compellence), जिसमे आतंकवाद प्रतिरोधी प्रतिबंधों (counterterror sanctions) से लेकर राजनीतिक अलगाव सब शामिल है, सबसे सही रास्ता है जिस पर चल कर भारत आतंकवादी ढांचे को धवस्त करने के लिए पाकिस्तान को मजबूर कर सकता है।

भारत और पाकिस्तान के बाहर पड़ोसी-संबंधी रूझानों का आकलन करें तो हम पाएंगे कि ऐसा जरूरी नहीं कि इस नीति के सकारात्मक परिणाम हों। पिछले डेढ़ सालों मे पाकिस्तान संबन्धित मुद्दों पर भारत को चीन की तरफ से विरोध का सामना करना पड़ा है। इसमें मुंबई बम धमाकों के आरोपी को यूनाइटेड नेशनस मे ब्लैकलिस्ट करने का भारत का प्रयास तथा न्यूक्लीयर सप्लायर्स ग्रुप मे भारत की सदस्यता शामिल हैं। क्षेत्रीय संतुलन भविष्य में नई दिल्ली के प्रयासों को काफी मुश्किल में डाल सकता है। ग्वादर में चीन के बढ़ते निवेश और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की वजह से बीजिंग नई दिल्ली के निवेदन पर पाकिस्तान पर दबाव डालने के लिए और भी अनिच्छुक होगा।

इस धारणा पर सवाल न करना गलत होगा कि भारत ने पारंपरिक तौर से पाकिस्तान के खिलाफ अहिंसक प्रतिरोध की एक वास्तविक रणनीति अधिनियमित की है। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का ओफ़ेन्सिव डिफ़ेन्सिव डॉक्ट्रिन (offensive defensive doctrine) और बलूचिस्तान के सवाल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से पाकिस्तान की आलोचना भारत की उस बढ़ती उप-परंपरागत प्रतिक्रिया की पक्षधर प्रवृत्ति को रेखांकित करते हैं जो आतंकवाद के सवाल पर भारतीय मांगो का पालन करने के लिए पाकिस्तान पर दबाव डाल सकती है। पाकिस्तान ने न सिर्फ बलूचिस्तान बल्की अफगानिस्तान मे भी उप-पारंपरिक युद्ध के कुछ सबूत पेश किये हैं जिससे यह साबित होता है कि भारत पारंपरिक सीमा से नीचे इस्लामाबाद को नुकसान पहुँचाने का रास्ता

ढूँढ़ने में कामयाब हो गया है। खासतौर पर बलूचिस्तान के मुद्दे पर भारत ने आक्रमक रुख का प्रदर्शन करते हुऐ इस्लामाबाद को यह संकेत दिया है कि वह नियंत्रण रेखा की दूसरी तरफ भी युद्ध करने की स्थिति मे है।

पाकिस्तान असुरक्षित पाकिस्तानी क्षेत्र में भारत का हाथ होने का सबूत देता आया है। भारतीय नौसेना के कमांडर कुलभूषण यादव की गिरफ्तारी के बाद उनकी रैंक को खारिज न करना इस बात का उदाहरण है कि पाकिस्तान को रणनीति मे विवश करने के लिए भारत उप-परंपरागत जवाब को अपना रहा है। यह बदलाव इस बात को बतलाता है कि आने वाले वर्षों मे भारत अपनी प्रतिष्ठा कि परवाह किए बिना पाकिस्तान की बराबरी मे अपनी सामरिक ताकत एवं मुद्रा में बढ़ोतरी जारी रखने का इच्छुक हो सकता है। लोगों का यह मानना है कि अफगानिस्तान में वाणिज्य दूतावासों (भारतीय और पाकिस्तानी) पर हमला एक नई हकीक़त दिखलाता है जिसमे दोनों देश बाहर से एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखते हैं।

सीमित दंडात्मक हवाई हमलों (punitive air strikes) पर अध्याय पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद कसूरी की हाल ही में टिप्पणी के आलोक में विशेष रूप से प्रासंगिक है । उन्होंने हाल ही मे खुलासा किया कि भारत ने वर्ष 2008 के मुंबई हमले के बाद पाकिस्तान में चुनिंदा आतंकी ठिकानों पर सर्जिकल ऐयर स्ट्राइक शुरु करने की योजना बनाई थी। यहां लेखकों ने सही लिखा है कि सीमा पर घुसपैठ रोकने के लिए इस तरह के हमलें सामरिक होने के बजाय प्रतीकात्मक ज्यादा है। लेकिन समस्या यह है कि कहीं ये आरोप-प्रत्यारोप गलत दिशा मे न चले जाए, विशेष रुप से उस स्थिति मे जहां पाकिस्तानी राज्य की भागीदारी स्पष्ट नही है। उलटा आरोपी पर सबूत का बोझ डालने से स्थिति और बिगड़ सकती है, खासकर तब जब नई दिल्ली पर कार्यवाही करने का दबाव हो। इस दुविधा का एक उदाहरण है पठानकोट एयरबेस पर हमला। हमले के बाद, यह घोषणा करने में भारत की राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को पांच महीने लग गए कि इस हमले मे पाकिस्तानी सरकार के हाथ होने का कोई सबूत नहीं है। इस दौरान भारत का संयम स्वभाविक नही था।

द्वीपक्षीय संदर्भ में, यह पुस्तक इस विषय पर भी जोर देती है कि बहिर्जात कारक (exogenous factors) (अर्थात आतंकवादी हमले के जवाब में भारत द्वारा की गई कार्रवाई) पाकिस्तानी व्यवहार के लिए प्राथमिक निर्धारक हो सकते है। लेकिन पाकिस्तान का हालिया व्यवहार बताता है कि भारत के साथ संबंध सुधारने का प्रयास प्रणालीबद्ध तरीके से अपने घरेलू राजनीतिक गणित के द्वारा संचालित किया गया है: जैसे पठानकोट एयरबेस पर हमले के तुरंत बाद पंजाब में अपराधियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई और हमले की जांच के लिए एक पारदर्शी संयुक्त जांच दल (JIT) का गठन किया गया। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जंजुआ की नियुक्ति के बाद गुजरात में आतंकवादी घुसपैठ की संभावना के बारे में नई दिल्ली को इस्लामाबाद के द्वारा एक गुप्त सुचना मिली । यह दोनों पड़ोसियों के बीच आतंकवाद प्रतिरोधी सहयोग के मामले में अभूतपूर्व है। जबकि पठानकोट मामले की जांच धीमी और बोझिल  है, इनमें से कोई भी भारत के कोम्प्ल्लेंस का सहारा  लेकर पाकिस्तान से सकारात्मक राज्य प्रतिक्रिया प्राप्त करने का उदाहरण नही है।

पुस्तक में उल्लिखित इस्लामाबाद पर नुकसान लादने का विचार एक खतरनाक परिदृश्य (endgame scenario) की तरफ इशारा करता है जिसमें पाकिस्तान की स्थिति घरेलू स्तर पर कमजोर है,और आईएसआई (ISI) के साथ-साथ सरकार के खिलाफ राजनीतिक प्रतिक्रिया एवं प्रतिक्षेप का वातावरण है। इसके पीछे यह सोच है कि इससे पाकिस्तान प्रत्यक्ष आतंकवाद विरोधी क़दम लेने पर मजबूर हो सकता है। यह तर्क पद्धति मानती है कि नागरिक समाज सहित पाकिस्तान की जनसंख्या भी शत्रुतापूर्ण भारतीय दबाव में आ जाएगी। नागरिक और सैन्य नेतृत्व की अनुकूलता पर एक जनमत सर्वेक्षण के हिसाब से अधिक संभावित परिणाम यह होगा कि पाकिस्तानी जनता राज्य के खिलाफ न जाकर राज्य का साथ दे। बाहरी संघर्ष के दौरान यह और भी अधिक संभव है, खासकर अगर उन्हें भारतीय जवाबी कार्रवाइयाँ अनुचित एवं विषम लगें। इसी तरह यह सोचना भी गलत होगा कि पाकिस्तानी नागरिक समाज की अपने पड़ोसी देश के साथ सुधार संबंधों की इच्छा अपरिवर्तनीय है और नई दिल्ली की तरफ से किसी भी बेलगाम प्रतिक्रियावाद से प्रभावशून्य है।

भारत की सीमित क्षमताओं और संयम के ऐतिहासिक विरासत के संदर्भ में लेखकों का अनुमान है की पाकिस्तानी क्षेत्र से हाई-प्रोफाइल हमले की प्रतिक्रिया नई दिल्ली निम्न तरीकों से कर सकता है, जैसे आजाद कश्मीर में आतंकवादी ठिकानों के खिलाफ प्रतीकात्मक हवाई हमला, कम से कम एक प्रमुख आतंकवादी नेता को मारने के लिए  कुछ अधिक आक्रमक गुप्त आपरेशन, बलूचिस्तान में अलगाववादी समूहों की गुप्त वित्तीय सहायता में वृद्धि और राजनयिक रूप से पाकिस्तान को अकेले  करने की अंतरराष्ट्रीय पैरवी (lobbying) का प्रयास। दोनों लेखकों ने सीमित हवाई हमलों या सीमित जमीनी कार्यवाही में वृद्धि से बड़े खतरों की सही पहचान कि हैा लेकिन वह भारत को श्रेय नही देता कि उसने एक उप-परंपरागत जगह तलाश ली है जिसका वह प्रभावी ढंग से फायदा उठा रहा है। इस किताब कि भविष्यवाणियां सटीक हो सकती हैं, लेकिन यह विश्लेषण और उभर कर आता अगर कोम्पेल्लेंस और डिटरेन्स की बहस पर और अधिक पाकिस्तानी राय शामिल होतीं।

एक अंतिम अवलोकन: 2008 आखरी बार था जब भारत में नागरिकी ठिकानों पर एक बड़ा आतंकवादी हमला हुआ था। क्या यह सक्रिय कोम्पेल्लेंस (compellence) का परिणाम है या डिटरेन्स  का, इसकी छान-बीन विस्तार से की जानी चाहिए।

Editor’s note: Click here to read this article in English.

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Image 1: Indian foreign secretary S Jaishankar with Pakistan foreign secretary Aizaz Chaudhry in April 2016 (MEA Photo Gallery, Flickr)

Image 2: Indian soldiers at the Pathankot Air Force base a day after it was attacked on January 2, 2016( Narinder Nanu-AFP, Getty)

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