2025 में भारतीय विदेश नीति को एक जटिल बाह्य वातावरण से गुज़रना पड़ा है| इस दौरान भारत को कुछ कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा है – विशेष रूप से, 2047 तक विकसित भारत की परिकल्पना की दिशा में आर्थिक विकास और उन्नति के अपने आंतरिक लक्ष्यों की पूर्ति हेतु | भारत के लिए, विदेश नीति और घरेलू राजनीति के बीच संबंध इससे अधिक गहरे नहीं हो सकते, क्योंकि भारत की मंशाएँ एक समावेशी और स्थिर विश्व व्यवस्था को आकार देने में भूमिका, और उसके आर्थिक विकास को बनाए रखने के उद्देश्य, वैश्विक तकनीकी प्रगति का लाभ उठाने, और बिना अवरोध के ऊर्जा की आपूर्ति सुनिश्चित करने से जुड़े हुए है।
इस संदर्भ में, वाशिंगटन में दूसरे ट्रंप प्रशासन के आने का नई दिल्ली पर क़ाफ़ी असर पड़ा है। राष्ट्रपति ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों के स्वरूप को ऐसे तरीकों से बदल दिया है जिसकी कल्पना किसी भी अनुकरण अभ्यास में नहीं की गई थी, एवं जिससे कई अकल्पित चुनौतियाँ उभरी हैं। इस वर्ष संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ संबंध भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को व्यवहार में लाने के लिए उसे एक स्ट्रेस टेस्ट झेलना पड़ा, क्योंकि इसके सबसे महत्वपूर्ण साझेदारों में से एक ने उनके द्विपक्षीय संबंधों की शर्तों में उलटफेर कर दिया| दोनों देशों के बीच अलग-अलग दायरों में सहयोग जारी रहने के बावजूद, राष्ट्रपति ट्रंप की शैली, भारतीय नीतिगत निर्णयों पर अमेरिकी अधिकारियों की तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया एवं भारत पर अमेरिका द्वारा 50 प्रतिशत जवाबी प्रशुल्क दर लगाने से पिछले 25 वर्षों में बड़े परिश्रम से निर्मित सहयोग की रवायते खतरे में पड़ गई हैं।
भारत-अमेरिका संबंधों में यह नवीनतम निम्न स्तर ऐसे समय पर आया है जब वैश्विक व्यवस्था में भारी उथल-पुथल मची हुई है। हम एक ऐसे दौर से गुज़र रहे हैं जिसे अक्सर “भटकती दुनिया” कहा जाता है; स्थापित व्यवस्था अप्रचलित हो चुकी है, परन्तु नई व्यवस्था का खाका हमें स्पष्ट नहीं है| अपनी बढ़ती राष्ट्रीय शक्ति के कारण, भारत इस बड़े परिवर्तन से निकलने वाली आगामी व्यवस्था में एक बड़ा स्तम्भ/पोल होगा। हालांकि, नई दिल्ली को अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली में दूसरी शक्तियों की तुलना में अपनी शक्ति में असंतुलन का भी ध्यान रखना होगा, जो उससे ज़्यादा भौतिक रूप से मज़बूत हैं, और उन दबावों का भी, जो उसकी विदेश नीति पर असर डालेंगी। इससे तात्पर्य यह है कि 2026 एवं इसके बाद नई दिल्ली अपने बाह्य समझौतों की शर्तों और नियमों को लागू करने की गति में परिवर्तन लाएगी|
“नई दिल्ली को अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली में दूसरी शक्तियों की तुलना में अपनी शक्ति में असंतुलन का भी ध्यान रखना होगा, जो उससे ज़्यादा भौतिक रूप से मज़बूत हैं, और उन दबावों का भी, जो उसकी विदेश नीति पर असर डालेंगी।”
नई दिल्ली की तीव्र राह
2025 में अपनी आर्थिक साझेदारियों के विविधीकरण की उसकी कोशिशों से ज्ञात होता है, कि भारत को पहले ही यह आभास हो गया था कि, बदलते गठबंधनों वाले अनिश्चित विश्व में उसे अपनी रणनीतियों में परिवर्तन लाने की आवश्यकता है| जुलाई में, भारत-यूनाइटेड किंगडम मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर हस्ताक्षर और दिसंबर में हुए संवाद के माध्यम से भारत-यूरोपीय संघ (ईयू) मुक्त व्यापार समझौते के लिए वार्तालाप को तीव्रता से आगे बढ़ाना यह दर्शाता है कि नई दिल्ली ट्रंप प्रशासन के प्रशुल्क दरों द्वारा उजागर की गई नई दरारों को भाँप लिया गया है| इसके अलावा, चीन और रूस के साथ वॉशिंगटन के महाशक्तियों से संबंधों पर राष्ट्रपति ट्रंप के बदलते रुख ने नई दिल्ली को बीजिंग और मॉस्को के साथ अपनी रणनीति को पुनर्निर्धारित करने पर मजबूर कर दिया है।
जहां एक ओर, चीन के साथ आर्थिक दबाव और राजनीतिक तालमेल बिठाने की प्रशासन के प्रयत्नों और उसके नए “जी 2” संकेतन के बेमेल मिश्रण ने नई दिल्ली में परस्पर ढांचागत चुनौतियों के बावजूद बीजिंग के साथ द्विपक्षीय वार्तालाप को पुनः प्रारम्भ करने की प्रवृत्ति को जन्म दिया है। वहीं दूसरी ओर, यूक्रेन युद्ध को सुलझाने और अमेरिका-रूस संबंधों को स्थिर करने के लिए राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा मॉस्को के साथ किए गए प्रयासों के साथ-साथ रूस के साथ भारत के ऊर्जा और रक्षा संबंधों को लक्षित करने से भारत-रूस साझेदारी में एक नई तात्कालिकता और रणनीतिक तर्क का संचार हुआ है।
इस संदर्भ में, सितंबर में तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ प्रदर्शित सौहार्दपूर्ण संबंध और दिसंबर के प्रारम्भ में भारत और रूस के बीच हाल ही में संपन्न 23वें वार्षिक शिखरवार्ता से संकेत मिलता है कि नई दिल्ली अपनी बहुसंरेखण रणनीति पर ओर अधिक दृढ़ रुख अपना रही है। यह ऐसे समय में हुआ है जब क्वाड नेताओं का शिखर सम्मेलन, जो इस वर्ष नई दिल्ली में आयोजन किया जाना था, वह आयोजित नहीं हो पाया, जिससे उन लोगों को क्वाड की आवश्यकता पर प्रश्न चिन्ह लगाने का अवसर मिल गया जो क्वाड को “समुद्र के झाग” की तरह विलुप्त होते देखना चाहते हैं। इस बात को लेकर भ्रम बढ़ रहा है कि दूसरा ट्रंप प्रशासन हिंद प्रशांत क्षेत्र को किस दृष्टि से देखता है, जो हाल के वर्षों में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर भारत के लिए एक अहम भू-राजनैतिक क्षेत्र रहा है। नई दिल्ली के लिए चिंता का विषय यह है यह है कि ट्रंप प्रशासन द्वारा हाल ही में जारी की गई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (एनएसएस) में पश्चिमी गोलार्ध में मोनरो सिद्धांत के समकक्ष ट्रंप की घोषणा के साथ, हिंद-प्रशांत क्षेत्र अमेरिकी रणनीतिक रडार स्क्रीन से और भी दूर जा सकता है।
क्वाड की दुर्बलता ऐसे समय में प्रदर्शित हो रही जब भारत ब्रिक्स की अध्यक्षता पाने वाला है, जिसके अंतर्गत दक्षिण-दक्षिण सहयोग और विशेष रूप से भारत, रूस और चीन के बीच के सम्बन्ध अधिक प्रबल हो रहे हैं। इस तरह, 2026 भारत के लिए अपने अलग-अलग, मुद्दे-आधारित छोटे-छोटे समूह को बनाए रखने के लिए एक अहम परीक्षा होगी। इसके साथ ही, भारत पश्चिम और पूरब, या उत्तर और दक्षिण के बीच कैसे तालमेल बिठाता है तथा अपने नुकसान को कम करते हुए अपने लाभ को ज़्यादा से ज़्यादा कैसे बढ़ाता है।

पुनर्संतुलन की अनिवार्यता
अटलांटिक के पार गठबंधन, या जिसे “पश्चिम” के नाम से जाना जाता है, उसमें दरारें पड़ना एक ऐसा घटनाक्रम है जिसके कारण भारत को अपनी आर्थिक और सुरक्षा रणनीतियों को पुनः संतुलित करना होगा। यूरोपियन संघ स्वयं अपनी विदेश नीति में एक नई दृष्टि और स्वतंत्रता की खोज में है, जिसके लिए भारत के साथ तालमेल बिठाना आवश्यक है। लेकिन यह भारत के लिए अच्छा है, जब वह वॉशिंगटन के साथ संबंधों में गिरावट के बीच अपने आर्थिक संबंधों में विविधता लाने का लक्ष्य रेखांकित कर रहा है ताकि यूरोपीय और एशियाई बाज़ारों में विकल्प मिल सकें। नई दिल्ली को तालमेल बिठाने वाले और विरोधी रक्षा औद्योगिक समूहों के एक जटिल संघ को भी संभालना होगा, क्योंकि वह “सह-विकास और सह-उत्पादन” के लिए भागीदारों में विविधता लाने, अपने रक्षा निर्यात हेतु खरीदारों को खोजने और विश्वसनीय भागीदारों की तलाश करने की चेष्टा कर रहा है जो उन्नत प्रौद्योगिकी साझा करने के लिए तत्पर रहें। यह परिवर्तन संरचनात्मक होगा, क्योंकि रक्षा साझेदारी अब लेन-देन वाली नहीं रहेगी, बल्कि लंबे समय तक चलने वाले औद्योगिक और रणनीतिक पारिस्थितिकी तंत्र में सम्मिलित होगी |
भारत के पड़ोसी देशों में हो रहे घटनाक्रम भी परिवर्तन का संकेत दे रहे हैं, जिससे नई दिल्ली को अपनी नीति पर पुन: विचार करने की आवश्यकता है| पिछले कुछ सालों में उपमहाद्वीप में यह रुझान देखा गया है कि सत्तारूढ़ सरकारों को हटाने के लिए राजनीतिक विरोध बढ़ रहा है, ताकि उन्हें लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक, सामाजिक-आर्थिक और शासनकाल के दौरान हुई ग़लतियों के लिए जवाबदेह ठहराया जा सके। बड़े पैमाने पर विरोध और जन-केन्द्रित जवाबदेही के इस मेल ने इन देशों में क्षेत्रीय राजनीति और नीति का अंदरूनी तौर पर फिर से आंकलन करने पर भी मजबूर किया है, जिससे कुछ मामलों में भारत विरोधी भावना पैदा हुई है। इसलिए, नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार में होने वाले चुनावों के राजनीतिक परिणामों के लिए शायद भारत को उन देशों के साथ अपने संबंधों को नए सिरे से प्रारम्भ करना होगा। हालांकि चीन और अमेरिका जैसे दूसरे बाह्य हितधारकों का असर अत्यधिक है, लेकिन भूगोल और इतिहास दृष्टि से ही भारत इस उप क्षेत्र में एक बड़ी भूमिका निभाता रहेगा। हालांकि, इस स्थिति के अपने संरचनात्मक जोखिम भी हैं। आने वाले महीनों में भारतीय विदेश नीति के फैसले लेने वालों के सामने यह चुनौती है कि वे नई दिल्ली के आस-पास हो रहे घटनाकर्मों के नतीजों में बढ़त रखें। उन्हें उस जटिल राजनीतिक आंधी से निपटने के लिए तैयार रहना होगा, जिसके नतीजों से, अन्य बातों के अलावा, उप क्षेत्रीय संपर्क और विकास को बढ़ावा देने वाले परियोजनाओं से मिलने वाले निवेश पर मिलने की संभावना है।
“यह स्पष्ट है कि भारत विपरीत परिस्थिति में भी किसी एक गुट में सम्मिलित होने से बचना चाहता है, और किसी का पक्ष लेने के बजाय रणनीतिक स्वायत्तता की नीति पर टिके रहने के कारण होने वाले नुकसान भी झेलगा|”
रणनीतिक स्वायत्तता की नवीनकृत महत्ता
अप्रासंगिक होने के बजाय, भारत की लंबे समय से चली आ रही रणनीतिक स्वायत्तता की विदेश नीति विद्यमान समय में और भी ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गई है, जब प्रशुल्क से लेकर अप्रवासन तक, सबका हथियारीकरण हो गया है। यह स्पष्ट है कि भारत विपरीत परिस्थिति में भी किसी एक गुट में सम्मिलित होने से बचना चाहता है, और किसी का पक्ष लेने के बजाय रणनीतिक स्वायत्तता की नीति पर टिके रहने के कारण होने वाले नुकसान भी झेलगा |
जैसा कि 2025 में देखा गया, वैश्विक प्रणाली की अनिश्चितताओं ने विदेश नीति में भारत के स्वतंत्र विकल्पों को प्रबल किया है, भले ही वह आर्थिक और सुरक्षा लाभों के लिए दुश्मनों और साझेदारों दोनों के साथ अपने संबंधों को पुनः संतुलित कर रहा हो। मॉस्को के साथ अपनी साझेदारी को ओर प्रबल करने एवं चीन के साथ सावधानी से वार्तालाप करने का नई दिल्ली का निर्णय इसी सोची-समझी रणनीतिक दृष्टि को प्रदर्शित करता है| आपूर्ति श्रृंखला के जोखिमों को कम करने, ऊर्जा के पारंपरिक और नए स्रोतों की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने और सैन्य और नागरिक उपयोग दोनों के लिए नई प्रौद्योगिकियों तक पहुँच के सर्वोत्तम संभव विकल्पों की खोज करने की प्राथमिकताएं भारत को प्रेरित करती रहेंगी, क्योंकि वह अपने घरेलू लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए बाहरी परिवेश में अनुकूल वातावरण बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।
भारत की व्यापक रणनीति की सापेक्षिक सफलता न केवल उसकी बढ़ती राष्ट्रीय शक्ति के आंकलन पर निर्भर करेगी, बल्कि उसकी त्रुटियों के आंकलन पर भी निर्भर करेगी। अंतर्राष्ट्रीय संबंध तुलनात्मक दृष्टिकोण से ही चलते रहेंगे, और महाशक्तियों के मुक़ाबले अपनी शक्ति के अंतर की गहरी समझ भारत को अपने आंतरिक और बाह्य संतुलन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए बेहतर ढंग से तैयार करेगी। 2025 की भू-राजनीति ने निर्दय यथार्थवाद को उजागर किया है, और यह प्रवृत्ति 2026 में घटने के बजाय जारी रहने की अधिक संभावना है। राष्ट्रीय शक्ति का अधिक स्पष्ट उपयोग अंतरराज्यीय राजनीतिक और आर्थिक वार्ताओं को दिशा देने में प्रभावशाली भूमिका निभाएगा। यह स्थिति नई दिल्ली के लिए भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक उथल-पुथल से अपने घरेलू विकास को सुरक्षित रखने के लिए विभिन्न साझेदारों के साथ व्यवहारिकता एवं लगन सहित नए संबंधों की शर्तों पर वार्तालाप करने की अनिवार्यता पैदा कर रही है।
This article is a translation. Click here to read the original in English.
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Image 1: PMIndia.Gov.In
Image 2: Dr. S. Jaishankar via X