जब भारत के केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 10 मार्च, 2026 को अपनी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ़डीआई) नीति में परिवर्तन करते हुए सात विनिर्माण क्षेत्रों में चीनी औद्योगिक निवेश के लिए 60 दिवसीय त्वरित स्वीकृति देने वाली व्यवस्था प्रारम्भ की, तो इस क़दम को 2020 के गलवान घाटी संकट के उपरांत भारत-चीन संबंधों में सुधार का एक और संकेत माना गया। हालाँकि, यह परिवर्तन राजनीतिक संबंधों के सामान्य होने के संकेत की तुलना में औद्योगिक आवश्यकता को अधिक दर्शाता है।
छह वर्षों तक, भारत ने निवेश की कड़ी जाँच, वीज़ा पाबंदियों और घरेलू विनिर्माण की शर्तों के माध्यम से रणनीतिक क्षेत्रों में चीन के प्रभाव को कम करने की चेष्टा की। इन उपायों के बावजूद, चीनी तकनीकी, यंत्र समूह और प्रारम्भिक औद्योगिक निवेश पर निर्भरता बनी रही। कई क्षेत्रों में, पाबंदियों के कारण क्षमता बढ़ाने का काम तो धीमा पड़ गया, लेकिन कोई बेहतर विकल्प भी तैयार नहीं हो पाया।
इसलिए, मार्च 2026 का संशोधन इस तथ्य को व्यापक रूप से दर्शाता है कि आपूर्ति श्रृंखला की मज़बूती केवल पाबंदियों से प्राप्त नहीं की जा सकती। जहाँ घरेलू क्षमताएँ अभी भी अविकसित हैं, वहाँ विदेशी भागीदारी को सीमित करने से निर्भरता कम होने के बजाय औद्योगिक विकास रुक सकता है। संशोधित ढाँचे में समिल्लित क्षेत्र—जैसे इलेक्ट्रॉनिक कलपुर्ज़े, पूँजीगत सामान, पॉलीसिलिकॉन और इनगॉट-वेफ़र विनिर्माण, उच्च-स्तरीय बैटरी कलपुर्ज़े, दुर्लभ मृदा शोधन और स्थायी चुंबक —में एक तथ्य समान है: इनकी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में चीन का दबदबा है। इस प्रकार से, चीनी निवेश हेतु भारत का चुनिंदा रूप से द्वार खोलना, रणनीतिक सावधानी और औद्योगिक हक़ीक़त के बीच तालमेल बिठाने की एक पहल है।
भारत में आपूर्ति श्रृंखला राष्ट्रवाद का उदय
2020 में उठाए गए क़दम केवल गलवान झड़प के प्रत्युत्तर नहीं थे। ये क़दम रणनीतिक क्षेत्रों में आर्थिक निर्भरता और मालिकाना हक़ के एक ही स्थान पर केंद्रित होने को लेकर पहले से मौजूद बड़ी चिंता पर आधारित थे। 17 अप्रैल 2020 को जारी प्रेस नोट 3 (पी॰एन॰3) गलवान घटना से पूर्व ही आ गया था। इसमें भारत के साथ ज़मीनी सीमा से सटे देशों से आने वाले निवेश के लिए सरकार की मंज़ूरी लेना ज़रूरी कर दिया गया था। यह क़दम कोविड के दौरान आई मंदी का लाभ उठाकर संस्थानों पर कब्ज़ा करने की कोशिशों को रोकने के लिए उठाया गया था।
ऐसी चिन्ताएँ कई वर्षों से परस्पर बढ़ रही थीं। 2014 के उपरांत, भारत में चीनी निवेश और व्यापारिक मौजूदगी बुनियादी ढाँचे से आगे बढ़कर प्रौद्योगिकी स्टार्टअप, डिजिटल प्लेटफॉर्म और उच्च-स्तरीय विनिर्माण तक फैल गई, जिससे नई दिल्ली में रणनीतिक जोखिम और विदेशी मालिकाना हक़ के एक ही जगह केंद्रित होने को लेकर चिंता का आभास हुआ। साथ ही, मई 2020 में प्रारंभ किए गए ‘आत्मनिर्भर भारत’ कार्यक्रम ने घरेलू विनिर्माण और तकनीकी के मामले में आत्मनिर्भरता की ओर औद्योगिक नीति के झुकाव को और मज़बूती मिली। इस दृष्टिकोण के अंतर्गत सौर ऊर्जा विनिर्माण ने एक अहम स्थान ग्रहण किया। पी॰एन॰ 3 से पहले ही, भारत ने घरेलू उत्पादकों को बचाने के लिए व्यापार और औद्योगिक नीति के तरीकों का प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया था, जिसमें सुरक्षा कर्तव्य और बाद में आयात किए गए सौर सेल और मॉड्यूल पर अंतिम सीमा शुल्क शामिल था।
तथापि, नीति निर्माताओं ने शायद इस तथ्य का सही अंदाज़ा नहीं लगाया था कि भारत की विनिर्माण से जुड़ी अपेक्षाएँ किस हद तक चीनी औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र पर निर्भर थीं। तीव्रता से विस्तार करने की चाह रखने वाले उद्योगों ने बार-बार चीनी यंत्र समूह, इंटरमीडिएट कलपुर्जे और ऑन-साइट तकनीकी सहायता का सहारा लिया, विशेषकर सोलर पीवी, इलेक्ट्रॉनिक्स और एडवांस्ड बैटरी के क्षेत्र में।
गलवान के बाद की नीति: विस्तारित प्रतिबंध
जून 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प ने निवेश की जाँच-पड़ताल करने वाले एक सावधानी उपाय को आर्थिक प्रतिबंधों के एक व्यापक ढांचे में बदल दिया। तथापि इसका उद्देश्य चीन पर निर्भरता से पैदा होने वाली रणनीतिक दुर्बलताओं को कम करना था, परंतु इसके बाद उठाए गए कदमों के परिणाम निवेश के प्रवाह से कहीं आगे तक गए। इनका असर बड़े पैमाने पर औद्योगिक विकास पर भी पड़ने लगा।
उदाहरण के लिए, गलवान के उपरांत भारत-चीन संबंधों में आई गिरावट के चलते भारत ने चीनी व्यावसायिक वीज़ा जारी करने में भारी कटौती की। समाचारों के अनुसार, वार्षिक स्वीकृति के साथ दिए जाने वाले वाले वीज़ा की संख्या 2019 में लगभग 2,00,000 से घटकर 2024 तक लगभग 2,000 रह गई, जो कि 99 प्रतिशत की कमी है। हालाँकि यह क़दम सुरक्षा कारणों से उठाया गया था, परंतु इन प्रतिबंधों से यह तथ्य सामने आया कि भारत का उभरता विनिर्माण क्षेत्र चीनी तकनीकी विशेषज्ञता पर निर्भर था। सौर पीवी, एडवांस्ड रसायन विज्ञान सेल बैटरी एवं इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन पहल (पीएलआई) पाने वाला विनिर्माण अक्सर अधिष्ठापन, अंशांकन और कमीशनिंग हेतु चीनी उपकरण आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर रहते थे। इनगट-ग्रोइंग फर्नेस, वेफर-प्रोसेसिंग प्रणाली और सटीक विनिर्माण उपकरण जैसे यंत्र समूहों के लिए अक्सर मूल उपकरण आपूर्तिकर्ता के अभियंताओं की आवश्यकता होती थी, इसलिए वीज़ा में देरी के कारण परियोजना की समय-सीमा प्रभावित हुई और क्षमता विस्तार की गति धीमी पड़ गई।
उपायों का एक अन्य समूह विक्रय और व्यापार नीति पर केंद्रित था। अनुमोदित प्रतिमान और निर्माता सूची (एएलएमएम) जैसे साधनों के साथ-साथ आयातित सौर सेल और मॉड्यूल पर सुरक्षा शुल्क और बाद में मूल सीमा शुल्क परस्पर भारतीय उत्पादकों के लिए एक संरक्षित बाज़ार निर्मित कर घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया गया। हालांकि, महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इन नीतियों ने उत्पादन से संबंधित उन बाधाओं को दूर करने में कोई ख़ास योगदान नहीं दिया, जो घरेलू उत्पादन को सीमित करती रहीं।
इसका समग्र प्रभाव कई क्षेत्रों में दिखाई देने लगा। भारत सेल्युलर एवं इलेक्ट्रॉनिक्स एसोसिएशन का अनुमान है कि वीज़ा प्रतिबंधों और संबंधित परिचालन बाधाओं के कारण 2020 से 2023 के बीच इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में लगभग 15 अरब अमेरिकी डॉलर के उत्पादन के अवसर खो दिए, साथ ही लगभग 100,000 नौकरियाँ भी गईं।
जून 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प ने निवेश की जाँच-पड़ताल करने वाले एक सावधानी उपाय को आर्थिक प्रतिबंधों के एक व्यापक ढांचे में बदल दिया।
नीतिगत महत्वाकांक्षा और औद्योगिक क्षमता के बीच का अंतर सौर पीएलआई योजना में सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। एक एकीकृत घरेलू विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र बनाने के उद्देश्य से तैयार की गई इस योजना ने मॉड्यूल उत्पादन में विस्तार करने में सफलता प्राप्त की, परंतु अपस्ट्रीम क्षेत्रों में इसकी प्रगति सीमित रही। जून 2025 तक, भारत की मॉड्यूल विनिर्माण क्षमता 120 गीगावाट तक पहुँच गई थी, जबकि पॉलीसिलिकॉन क्षमता केवल 3.3 गीगावाट थी—यह चौंकाने वाला 36 से 1 का अनुपात देश की अपस्ट्रीम आपूर्ति श्रृंखला की निरंतर कमज़ोरी को प्रदर्शित करता है।

आपूर्ति श्रृंखला की वास्तविकताएँ: चीन का संरचनात्मक प्रभुत्व
इन नीतियों की सापेक्षिक अक्षमता का एक बड़ा कारण ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और विनिर्माण क्षेत्रों में महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं पर चीन का प्रभुत्व है। चीन का व्यापक नियंत्रण सौर ऊर्जा मूल्य श्रृंखला के प्रारंभिक चरणों में सबसे अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उदाहरण के लिए, 2024 में, वैश्विक पॉलीसिलिकॉन उत्पादन में चीन की हिस्सेदारी 93.5 प्रतिशत थी, और विश्व के दस सबसे बड़े उत्पादकों में से नौ चीन में स्थित थे। चीनी उत्पादक वैश्विक इंगोट और वेफर उत्पादन के 97 प्रतिशत से अधिक हिस्से पर क़ब्ज़ा हैं, जिससे उन्हें उन महत्वपूर्ण प्रारंभिक चरणों पर नियंत्रण प्राप्त होता है जो व्यापक सौर विनिर्माण प्रणाली में लागत और प्रतिस्पर्धात्मकता निर्धारित करते हैं।
चीन का प्रभाव सौर ऊर्जा से कहीं अधिक व्यापक है और स्वच्छ ऊर्जा उद्योग के व्यापक परिदृश्य को परस्पर आकार दे रहा है। देश वैश्विक दुर्लभ पृथ्वी शोधन का लगभग 91 प्रतिशत और सिंटरड स्थायी चुंबक उत्पादन का 94 प्रतिशत हिस्सा रखता है, जो इलेक्ट्रिक वाहन मोटरों, पवन टर्बाइनों, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा प्रणालियों हेतु आवश्यक हैं। चीनी उद्योग वैश्विक बैटरी सामग्री निर्यात व्यापार का 53 प्रतिशत हिस्सा रखती हैं और बैटरी आपूर्ति श्रृंखला के अधिकांश मध्य-चरण खंडों में 80 प्रतिशत या उससे अधिक की प्रमुख हिस्सेदारी रखती हैं।
इस आपूर्ति शृंखला में भारत की स्थिति अभी भी सीमित है। जून 2025 तक, देश की पॉलीसिलिकॉन क्षमता लगभग 3.3 जीडबल्यू और इंगॉट-वेफर क्षमता 5.3 जीडबल्यू थी, जबकि सेल विनिर्माण क्षमता 29.3 जीडबल्यू और मॉड्यूल विनिर्माण क्षमता 120 जीडबल्यू थी। तथापि भारत ने अंतिम चरण के विनिर्माण में तरक्की की है, लेकिन प्रारंभिक क्षेत्र, जो तकनीकी आत्मनिर्भरता और आपूर्ति शृंखला की मज़बूती तय करते हैं, – अभी भी अविकसित हैं। इस वजह से घरेलू उत्पादक आयातित कच्चे माल पर अधिक निर्भर हैं।
महत्त्वपूर्ण खनिजों के मामले में भी ऐसा ही प्रतिमान दिखता है। यूएसजीएस खनिज माल सारांश 2025 के अनुसार, भारत के पास विश्व का तीसरा सबसे बड़ा दुर्लभ मृदा संरक्षणतीसरा सबसे बड़ा दुर्लभ पृथ्वी भंडार – लगभग 6.9 मिलियन टन है। फिर भी देश में इसका बहुत कम हिस्सा ही परिशोधित किया जाता है। नतीजतन, भले ही अंतिम उत्पाद निर्मित करने का कार्य बढ़ा हो, परंतु मूल्य-श्रृंखला का एक बड़ा हिस्सा अभी भी देश के बाहर ही है।
इस निर्भरता के आर्थिक परिणाम साफ़ तौर पर दिखाई देते हैं। वित्तीय वर्ष 2024-25 में भारत के सौर्य क्षेत्र का कुल आयात 7 अरब अमेरिकी डॉलर का था, जिसमें से 3.89 अरब अमेरिकी डॉलर का आयात चीन से हुआ था। इससे भी अहम तथ्य यह है कि बीजिंग ने भारी दुर्लभ मृदा और उनसे जुड़े चुम्बक के निर्यात पर जो निर्यात नियंत्रण लगाए हैं, उनसे ज्ञात होता है कि कैसे आपूर्ति शृंखला का एक ही स्थान पर केंद्रित होना तीव्रता से रणनीतिक दुर्बलता बन सकता है। भारत के मार्च 2026 के संशोधन के महत्व को समझने के लिए इस व्यापक संदर्भ को जानना आवश्यक है।

मार्च 2026 संशोधन: आपूर्ति-श्रृंखला रणनीति को पुनः व्यवस्थित करना
विशुद्ध रूप से प्रतिबंधात्मक दृष्टिकोण की सीमाओं को पहचानते हुए, सरकार ने मार्च 2026 में अपनी आपूर्ति-श्रृंखला रणनीति को पुनर्गठित किया ताकि क्षमता निर्माण को प्राथमिकता दी जा सके, साथ ही चीनी पूँजी, प्रौद्योगिकी और विशेषज्ञता तक सीमित पहुँच भी बनी रहे । इस संशोधन में दो मुख्य तंत्रों का उपयोग किया गया है। प्रथम, यह 10 प्रतिशत तक निष्क्रिय चीनी लाभकारी स्वामित्व वाली ग़ैर-भूमि-सीमावर्ती देशों की संस्थाओं से स्वचालित-मार्ग निवेश की अनुमति देता है, जिससे वैश्विक संस्थागत निवेशकों की चिंताओं का समाधान होता है, जिनका जमाधन अनजाने में पीएन3 के दायरे में आ गया था। द्वितीय , यह सात रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों – पूंजीगत वस्तुएँ, इलेक्ट्रॉनिक पूंजीगत वस्तुएँ, इलेक्ट्रॉनिक घटक, पॉलीसिलिकॉन और इनगॉट-वेफर निर्माण, उन्नत बैटरी घटक, दुर्लभ-पृथ्वी स्थायी चुंबक और दुर्लभ-मृदा प्रसंस्करण – में भूमि-सीमावर्ती देशों से उत्पन्न प्रत्यक्ष निवेश हेतु 60 दिनों की वैधानिक अनुमोदन अवधि अनिवार्य करता है, जबकि संबंधित मंत्रालयों और एजेंसियों द्वारा सुरक्षा समीक्षा को बरकरार रखता है।
एक सहायक नियामक क़दम का उद्देश्य नए जुड़ाव की क्षमता विकसित करने में सहायक है: 18 मार्च, 2026 को एमएनआरई ने एएलएमएम सूची-III जारी की, जिसके अंतर्गत सरकार समर्थित सौर्य परियोजनाओं हेतु 1 जून, 2028 से देश में निर्मित हुए इनगॉट और वेफर का प्रयोग करना आवश्यक हो गया। इससे प्रारंभिक उत्पादकों के लिए भविष्य में एक मज़बूत बाज़ार सुनिश्चित करने में सहायता मिलेगी। इसका तात्पर्य यह भी है कि चीन की पॉलीसिलिकॉन और वेफर उद्योगों के लिए, जो घरेलू स्तर पर आवश्यकता से अधिक क्षमता और अंतर के दबाव का सामना कर रही हैं, भारत में स्थानीय साझेदारी या संयुक्त उद्यम निर्मित करना इनके लिए अधिक आकर्षक प्रतीत हो सकता है।
राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो यह संशोधन कूटनीतिक सम्बन्धों को नए सिरे से प्रारम्भ करने के बजाय आर्थिक व्यावहारिकता का संकेत देता है। 2024 के अंत में सीमा पर तनाव कम होने और 2025 में उड़ानों को पुनः प्रारम्भ करने से परिस्थिति बेहतर हुई, परंतु यह संशोधन मुख्य रूप से औद्योगिक आवश्यक्तयों से प्रेरित लगता है, जिसमें रणनीतिक सावधानी को भी अपनाया गया है।
शेष रुकावटें: संशोधन समाधान क्यों नहीं है?
मार्च 2026 का संशोधन कुछ अहम रुकावटों को दूर करता है, परंतु यह भारत के विनिर्माण से जुड़ी महत्वाकांक्षाओं के सामने विद्यमान ढांचागत चुनौतियों को समाप्त नहीं करता। विशेषकर तीन ऐसी रुकावटें हैं जिन पर ध्यान देने की आवश्यक है।
पहला मुद्दा प्रौद्योगिकी स्थानांतरण से जुड़ा है। यह मानना कि चीनी निवेश से अपने देश में क्षमता अपने-आप तेज़ी से बढ़ेगी, ऐतिहासिक अनुभवों से सिद्ध नहीं होता। सौर विनिर्माण में चीन की तरक्की मुख्य रूप से घरेलू स्तर, ऊर्ध्वाधर एकीकरण एवं सरकार के परस्पर सहयोग के कारण हुई, न कि विदेशों से उत्पादन की जानकारी या प्रौद्योगिकी के स्थानांतरण की वजह से। वियतनाम और मलेशिया जैसे देशों में भी, जहाँ चीनी उद्योगों ने बड़े पैमाने पर निर्यात-उन्मुख सौर विनिर्माण क्षमता निर्मित करने में सहायता की, प्रारंभिक पॉलीसिलिकॉन या वेफर प्रौद्योगिकी और विशेषज्ञता अधिकतर चीन तक ही सीमित रही। भारतीय उद्योगों की अधिक हिस्सेदारी नियामक नियंत्रण तो पक्का कर सकती है, परंतु यह दशकों से जमा विनिर्माण की बारीक़ जानकारी या अनुभव के स्थानांतरण हेतु मजबूर नहीं कर सकती। निकट भविष्य में अधिक व्यावहारिक परिणाम संयुक्त उद्यम, उपकरण साझेदारी और चुनिंदा उत्पादन के स्थानीय उत्पादन से हो सकती है, न कि प्रारंभिक प्रौद्योगिकी क्षमता का पूरी तरह से स्थानांतरण। भले ही ये सीमित हों, फिर भी ऐसी व्यवस्था भारत की विद्यमान स्थिति में सुधार ला सकती हैं।
दूसरी चुनौती व्यावसायिक सुगमता है। चीन का दबदबा बड़े पैमाने पर कार्य करने और सरकारी सहायता की वजह से भी है। ‘इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन फाउंडेशन’ (आईटीआईएफ़) का कहना है कि चीन की पॉलीसिलिकॉन निर्मित करने वाले उद्योगों ने अक्सर लम्बी अवधि तक बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी बनाए रखने हेतु बहुत कम अंतर या नुक़सान में काम करते हुए भी अपनी क्षमता विकसित की है। ‘ऑर्गनाइज़ेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट’ (ओईसीडी) का विश्लेषण भी बताता है कि कैसे परस्पर सरकारी सहायता से तीव्रता से क्षमता बढ़ी और आवश्यकता से अधिक आपूर्ति बनी रही, जिससे अन्य इकाइयों के लिए मुक़ाबला करना कठिन हो गया। ऐसी परिस्थिति में, केवल विदेशी निवेश मिलने से भारत में व्यावसायिक तौर पर लाभ प्रदान करने वाले प्रारंभिक विनिर्माण परिस्थितिकि तंत्र निर्मित करने की संभावना कम है। यदि घरेलू विनिर्माण को बड़े पैमाने पर मुक़ाबला करना है, तो इसके लिए कुछ और क़दम उठाने आवश्यक होंगे—जैसे पॉलीसिलिकॉन हेतु ख़ास पीएलआई , जिस पर वित्त मंत्रालय के साथ बातचीत चल रही है, लंबे समय तक विक्रय का वादा, और आवश्यक आगत हेतु सहायता।
तीसरी चुनौती रणनीतिक है। इस संशोधन का उद्देश्य चीनी आपूर्ति शृंखला पर निर्भरता कम करना है, जिसके लिए उनके विकास में चुनिंदा तौर पर चीन की अधिक भागीदारी की अनुमति दी जा रही है। आर्थिक दृष्टिकोण से सही होने के बावजूद, इस तरीके से जोखिम के नए रूप भी पैदा होते हैं। भविष्य में दोनों देशों के सम्बन्धों में खटास आने पर व्यापारिक संबंध रणनीतिक दुर्बलता का ज़रिया बन सकते हैं। इस जोखिम से निपटने के लिए विविधता लाने की आवश्यकता है।
अच्छी बात यह है कि भारत इस तरह के विविधीकरण की दिशा में कार्यरत है। फरवरी 2026 में, भारत ‘पैक्स सिलिका’ का हिस्सा बना। यह अमेरिका के नेतृत्व वाली 12 देशों की एक पहल है, जिसका उद्देश्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित करना है। मई 2026 में, भारत ने ‘क्वाड खनिज पहल ढाँचा”क्वाड महत्वपूर्ण खनिज पहल ढाँचा’ के उद्घाटन में हिस्सा लिया। इसके तहत क्वाड ने खनन, प्रसंस्करण, पुनर्चक्रण के लिए आपूर्ति श्रृंखला हेतु 20 अरब अमेरिकी डॉलर तक का सरकारी और निजी निवेश जुटाने का वादा किया। ये पहल भारत को चीन के साथ चुनिंदा जुड़ाव बनाए रखते हुए वैकल्पिक आपूर्ति शृंखला साझेदारी निर्मित करने का अवसर प्रदान करती है।
भारतीय उद्योगों की अधिक हिस्सेदारी नियामक नियंत्रण तो पक्का कर सकती है, परंतु यह दशकों से जमा विनिर्माण की बारीक़ जानकारी या अनुभव के स्थानांतरण हेतु मजबूर नहीं कर सकती।
2020 के उपरांत से भारत के अनुभव से ज्ञात होता है कि आपूर्ति शृंखला की मज़बूती केवल पाबंदियों द्वारा हासिल नहीं की जा सकती। गलवान के उपरांत बने ढाँचों ने चीनी भागीदारी को तो सीमित कर दिया, परंतु चीनी प्रौद्योगिकी, समूह यंत्रों और प्रारम्भिक औद्योगिक आगत पर निर्भरता कम करने में अधिक कामयाबी नहीं देखी। मार्च 2026 का संशोधन इस बढ़ती समझ को दर्शाता है कि औद्योगिक आत्मनिर्भरता असल में घरेलू क्षमता बनाने पर निर्भर करती है, न कि केवल बाह्य जुड़ाव को सीमित करने पर। आने वाले समय में, इस लक्ष्य प्राप्ति के लिए, चीन के साथ चुनिंदा सहयोग और वैकल्पिक आपूर्ति शृंखला साझेदारी विकसित करने की तीव्र चेष्टा, दोनों की परम आवश्यकता होगी।
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Image 1: Narendra Modi via X
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