2021 में, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इस तथ्य पर ज़ोर दिया था कि भारत की बहु-संरेखण रणनीति का एक स्तंभ “यूरोप के साथ संबंध सुधारना” है। यह उद्देश्य तीव्रता से अनिवार्य हो गया है क्योंकि नई दिल्ली रक्षा और ऊर्जा में मॉस्को, विनिर्माण और प्रौद्योगिकी में बीजिंग और आर्थिक और तकनीकी रूप से वाशिंगटन पर निर्भरता के जोखिमों को पहचान रही है।
इसी उद्देश्य से, जयशंकर ने सितंबर 2026 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान आयोजित विसेगार्ड समूह – मध्य यूरोपीय देशों स्लोवाकिया, चेकिया, हंगरी और पोलैंड का एक सांस्कृतिक और राजनीतिक गठबंधन और भारत के बीच पहले शिखर सम्मेलन में भाग लिया। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य भारत और इन चार मध्य यूरोपीय देशों के बीच रक्षा एवं सुरक्षा, प्रवासन एवं गतिशीलता तथा व्यापार एवं निवेश के क्षेत्र में सहयोग का विकास करना था। व्यापक रूप से, यह प्रदर्शित करता है कि नई दिल्ली पेरिस और बर्लिन में अपने पारंपरिक साझेदारों के साथ पहले से ही प्रबल संबंधों के अतिरिक्त यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ अधिक नियमित और गहन रूप से जुड़ रही है।
यूरोपीय संघ के साथ भारत की बढ़ती भागीदारी दो उद्देश्यों से प्रेरित है: रक्षा साझेदारों और प्रौद्योगिकी एवं ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता। रक्षा के क्षेत्र में, नई दिल्ली ने रूस पर अपनी निर्भरता कम करने के साथ-साथ पोलैंड और इटली जैसे देशों के साथ गहन साझेदारी के माध्यम से फ्रांस पर अत्यधिक निर्भरता से बचने का प्रयास किया है। प्रौद्योगिकी एवं ऊर्जा क्षेत्र में, इसने आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाने और रणनीतिक दुर्बलताओं को कम करने के लिए नीदरलैंड और डेनमार्क सहित अन्य देशों के साथ सहयोग का विस्तार किया है।
ये विस्तारित साझेदारियाँ प्रदर्शित करती हैं कि भारत-यूरोपीय संघ संबंध ब्रुसेल्स के साथ एक एकल संबंध नहीं है, बल्कि विभिन्न यूरोपीय शक्तियों के साथ कई साझेदारियों का एक ताना-बाना है। परिवर्तित हो रहे वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य के बीच यूरोप के साथ जुड़ाव का यह विकेंद्रीकृत, विविध दृष्टिकोण भारत के लिए और भी अहम हो गया है।
ये विविध यूरोपीय साझेदार रक्षा औद्योगिक सहयोग, सेमीकंडक्टर, डिजिटल नवाचार एवं नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में विशिष्ट लाभ प्रदान करते हैं, जो भारत के लिए अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध हुआ हैं।
कूटनीतिक सम्बन्धों में विस्तार
भारत के यूरोपीय संघ के साथ संबंध मुख्य रूप से यूनाइटेड किंगडम (ब्रेक्जिट से पूर्व), फ्रांस और जर्मनी पर केंद्रित थे। तथापि, पिछले एक दशक में, भारत ने नॉर्डिक देशों, बाल्टिक देशों, मध्य और पूर्वी यूरोप और दक्षिणी यूरोप के साथ अपने संबंधों का भी विस्तार किया है। ये विविध यूरोपीय साझेदार रक्षा औद्योगिक सहयोग, सेमीकंडक्टर, डिजिटल नवाचार एवं नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में विशिष्ट लाभ प्रदान करते हैं, जो भारत के लिए अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध हुआ हैं।
भारत इन संबंधों को जो महत्व प्रदान कर रहा है, वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पिछले कुछ वर्षों में की गई कई ऐतिहासिक राजकीय यात्राओं और शिखर सम्मेलनों से स्पष्ट है। उदाहरण के लिए, मोदी की 2017 में स्पेन यात्रा और 2024 में पोलैंड और ऑस्ट्रिया की यात्राएँ क्रमशः 30 और 40 वर्षों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की प्रथम ऐसी औपचारिक यात्राएँ थीं। 2018 में, मोदी ने स्वीडन में आयोजित पहले भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में भाग लिया। हाल ही में, मोदी पिछले एक वर्ष में साइप्रस, इटली और स्लोवाकिया की यात्रा करने वाले दो दशकों से अधिक समय में पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। भारत ने हाल ही में लिथुआनिया, एस्टोनिया और लातविया में पहली बार अपने दूतावास की स्थपाना भी की है।
पेरिस से इत्तर रक्षा सहयोग में विविधता
शीत युद्ध की समाप्ति के उपरांत, भारत ने स्वदेशीकरण को विकसित करने हेतु एवं हथियार आयात आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाने जैसी नीतियों के माध्यम से रूसी हथियारों पर निर्भरता कम करने का प्रयत्न किया है।
फरवरी 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण ने एस-400 सहित हथियारों की आपूर्ति में देरी और बीजिंग पर मॉस्को की बढ़ती निर्भरता के कारण भारत के विविधीकरण के प्रयासों को बल दिया। वास्तव में, 2016-2020 के दौरान, भारत ने अपने 50 प्रतिशत हथियार रूस से लिए, परंतु 2021-2025 के दौरान, यह घटकर 40 प्रतिशत रह गया, जो विविधीकरण के प्रयासों में धीमी परंतु स्थिर प्रगति का कारक चिह्न बनकर उभरा है।
इस पहल के अंतर्गत, भारत ने फ्रांस के साथ अपनी रक्षा औद्योगिक साझेदारी को प्रबल किया है। फ्रांस 1950 के दशक से ही भारत को हथियार उपलब्ध कराता आ रहा है। आज, रूस के उपरांत, फ्रांस भारत का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता है, जो नई दिल्ली के कुल आयात में लगभग 29 प्रतिशत का योगदान देता है। भारत द्वारा फ्रांस के साथ हथियार सहयोग को प्रगाढ़ करने का एक मुख्य कारण यह है कि पेरिस, वाशिंगटन या मॉस्को की तुलना में, नई दिल्ली के साथ मिलकर हथियारों का उत्पादन करने के लिए कहीं अधिक इच्छुक रहा है।
हालाँकि, भारत रूसी हथियारों पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है, परंतु वह एक निर्भरता को दूसरी निर्भरता से बदलना नहीं चाहता। उदाहरण के लिए, नई दिल्ली और पेरिस के बीच 114 राफेल लड़ाकू विमानों की बिक्री को लेकर एक बड़ा विवाद है। फ्रांस, आरबीई2 एईएसए रडार, एमडीपीयू मिशन कंप्यूटर और एसपीईसीटीआरए इलेक्ट्रॉनिक-वॉरफेयर सूट का सोर्स कोड देने को तैयार नहीं है। तकनीकी स्थानांतरण न होने की स्थिति में, भारत फ्रांस की अनुमति के बिना इन विमानों के सॉफ्टवेयर को स्वतंत्र रूप से एकीकृत या कस्टमाइज़ नहीं कर पाएगा, जिससे लम्बी अवधि तक उसे फ्रांसीसी प्रणालियों पर निर्भर रहना पड़ेगा। इसे ध्यान में रखते हुए, भारत ने अन्य यूरोपीय देशों के साथ अपने रक्षा संबंधों का विस्तार करने की कोशिश की है।

यूक्रेन पर रूसी आक्रमण और उसके उपरांत यूरोप के रक्षा औद्योगिक पुनरुद्धार और निवेश के बाद, पेरिस से इत्तर भारत-यूरोप रक्षा सहयोग के नए पथ खुल गए हैं। उदाहरण के लिए, 2024 में, नई दिल्ली और वारसॉ ने अपने संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक विकसित किया और 2024-2028 के लिए अपनी नीतिगत लक्ष्यों में द्विपक्षीय रक्षा औद्योगिक सहयोग को गहरा करना सम्मिल्लित किया। हाल ही में, अगस्त 2026 में, पोलैंड के उप विदेश मंत्री व्लादिस्लाव बार्टोशेव्स्की ने कहा कि दोनों देश संयुक्त रूप से ड्रोन और टोही उपग्रहों का उत्पादन करने की चेष्टा कर रहे हैं और स्थानीय विनिर्माण को बढ़ावा देकर ‘मेक इन इंडिया’ पहल के साथ जुड़ने में रुचि रखते हैं।
भारत और इटली के बीच बढ़ते रक्षा औद्योगिक संबंध इसका एक और उदाहरण हैं। मई 2026 में, रोम और नई दिल्ली ने एक संयुक्त आशय घोषणा और रक्षा औद्योगिक रोडमैप की घोषणा की, जो हेलीकॉप्टर, समुद्री हथियार, नौसैनिक प्लेटफॉर्म और अन्य रक्षा उपकरणों के सह-उत्पादन और निर्माण को बढ़ावा देगा। इसी दिशा में, भारतीय उद्योग अदानी ने घोषणा की कि वह इतालवी उद्योग लियोनार्डो के साथ मिलकर हेलीकॉप्टरों का निर्माण करेगी। भारत इसी प्रकार से बेल्जियम, फिनलैंड और यूनान के साथ भी रक्षा संबंधों को प्रबल कर रहा है।
ये सभी साझेदारियाँ दर्शाती हैं कि नई दिल्ली रूसी हथियारों पर निर्भरता को फ्रांसीसी प्रणालियों पर निर्भरता से बदलने के बजाय, यूरोपीय रक्षा साझेदारों का एक व्यापक नेटवर्क विकसित कर रही है। यह विविधीकरण भारत को प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, सह-उत्पादन और स्थानीय विनिर्माण के अवसरों तक अधिक पहुँच प्रदान करता है, जो बदले में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने के व्यापक उद्देश्य को प्रबलता प्रदान करता है।
प्रौद्योगिकी एवं ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला का विविधीकरण
यूरोपीय संघ के भीतर अपनी साझेदारी विकसित करने में भारत की रुचि का एक अन्य कारण प्रौद्योगिकी और ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाना है।
यद्यपि भारत चीन को अपने प्रमुख भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों में से एक और अपने पड़ोस में एक सुरक्षा चुनौती मानता है, फिर भी चीनी प्रौद्योगिकी पर उसकी व्यापक निर्भरता ने बीजिंग का मुक़ाबला करने की नई दिल्ली की क्षमता को सीमित कर दिया है; उदाहरण के लिए, सेमीकंडक्टर के लिए चीन पर भारत की निर्भरता को ही लें, जहाँ भारत अपने पड़ोसी देश से लगभग 60 प्रतिशत घटक आयात करता है।
साथ ही, नई दिल्ली अमेरिकी प्रौद्योगिकी पर अपनी निर्भरता को लेकर चिंतित है। सितंबर 2025 में, भारत स्थित थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव की एक रिपोर्ट में संभावित “किल स्विच” के जोखिमों के बारे में चेतावनी दी गई थी, जिसका अर्थ है कि भारत अमेरिकी सॉफ्टवेयर से पूरी तरह से कट जाएगा। यह अमेरिका की विश्वसनीयता को लेकर भारत के भीतर बढ़ती चिंता को दर्शाता है, खासकर वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच ट्रंप प्रशासन द्वारा रूसी तेल खरीदने पर भारत पर 25 प्रतिशत का द्वितीयक शुल्क लगाने जैसी नीतियों को लेकर बढ़ते तनाव के बीच।
रूस, अमेरिका या चीन से पूरी तरह अलग हो जाना न तो व्यावहारिक है और न ही भारत का लक्ष्य है, क्योंकि आने वाले समय में भी ये देश भारत की रक्षा, सुरक्षा और तकनीकी आपूर्ति श्रृंखलाओं का अहम हिस्सा बने रहेंगे।
इस संदर्भ में, भारत ने अपनी महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला में विविधता लाने हेतु यूरोप को एक साझेदार के रूप में देखा है। मई 2026 में, भारत और नीदरलैंड ने सेमीकंडक्टर और उभरती हुई तकनीकों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए एक पहल की घोषणा की। उसी महीने, भारतीय उद्योग टाटा और डच उद्योग एएमएसएल ने भारत में सेमीकंडक्टर निर्माण को आगे बढ़ाने के लिए सहयोग गहरा करने की घोषणा की। इसी तरह, नई दिल्ली और तल्लीन ने डिजिटल अर्थव्यवस्था में सहयोग बढ़ाने की योजना की घोषणा की है, जिसका उद्देश्य एस्टोनिया के डिजिटल सार्वजनिक आधारभूत संरचना में मजबूती को भारत की विशाल प्रतिभा और बड़े पैमाने के साथ जोड़ना है।
इसके अतिरिकत, नई दिल्ली अपनी ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाना चाहती है, विशेषकर मध्य पूर्व में चल रहे संघर्षों और रूस-यूक्रेन युद्ध के मद्देनजर। गौरतलब है कि भारत विश्व में तेल का तीसरा सबसे बड़ा और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) का चौथा सबसे बड़ा आयातक है। भारत का 45 प्रतिशत तेल और 90 प्रतिशत एलएनजी होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते से आता है। अमेरिका-ईरान के बीच तनाव के बाद, भारत को ऊर्जा की बढ़ती कीमतों और खाना पकाने वाली गैस के सिलेंडरों की कमी का सामना करना पड़ा है। साथ ही, रूस से होने वाली आपूर्ति पर भी दबाव है, जिसका मुख्य कारण रूसी ऊर्जा सुविधाओं पर यूक्रेन के हमले हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि जुलाई 2026 में फाइनेंशियल टाइम्स ने कहा था कि रूस को भारत से ऊर्जा आयात करने की आवश्यकता पड़ी, क्योंकि यूक्रेन के हमलों ने रूस की अपनी घरेलू रिफाइनिंग क्षमता को लगभग 40 प्रतिशत तक कम कर दिया था। इससे यह स्पष्ट होता है कि लंबे समय तक मध्य पूर्व के तेल की जगह पूरी तरह से रूसी तेल पर निर्भर रहना भारत के लिए व्यावहारिक नहीं है।
इसी दिशा में, नई दिल्ली और कोपेनहेगन ने 2020 में औपचारिक रूप से एक हरित ऊर्जा साझेदारी की शुरुआत की। इसका उद्देश्य हरित ऊर्जा और सतत् शहरी विकास के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देना है, क्योंकि डेनमार्क को नवीकरणीय ऊर्जा के उत्पादन और खपत में महारत प्राप्त की है। हाल ही में, मई 2026 में, भारत एवं पाँच नॉर्डिक देशों ने ‘ग्रीन टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ स्थापित की। इसके जरिए नवीकरणीय ऊर्जा, सतत् विकास और हरित नवाचार के क्षेत्रों में इन पाँचों नॉर्डिक देशों की सामूहिक क्षमताओं का लाभ उठाया जा सकेगा। इसके अलावा, भारत ने लिस्बन, मैड्रिड और वियना के साथ भी नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में इसी प्रकार का सहयोग विकसित किया है।
भारत द्वारा यूरोप की सामूहिक क्षमताओं में सुधार
भारत-यूरोप साझेदारी काफ़ी समय से विकसित हो रही है। हालाँकि, पिछले दो वर्षों में इस साझेदारी को प्रगाढ़ करने में जो तीव्रता आई है, उसके पीछे भारत की यह चिंता अंतर्निहित है कि भारत रक्षा, ऊर्जा और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में रूस, अमेरिका और चीन पर बहुत अत्यधिक निर्भर है।
हालाँकि, यूरोप के साथ भारत के जुड़ाव का तात्पर्य किसी एक देश के स्थान पर दूसरे को लाना नहीं है। रूस, अमेरिका या चीन से पूरी तरह अलग हो जाना न तो व्यावहारिक है और न ही भारत का लक्ष्य है, क्योंकि आने वाले समय में भी ये देश भारत की रक्षा, सुरक्षा और तकनीकी आपूर्ति श्रृंखलाओं का अहम हिस्सा बने रहेंगे। इसके बजाय, भारत की रणनीति विविधीकरण की है। भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि रक्षा, प्रौद्योगिकी या ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं में कोई भी एक बाह्य देश अधिक प्रभावशाली ना बन सके।
इस संदर्भ में, नई दिल्ली के लिए यूरोप का महत्व इसके सभी 27 सदस्य देशों की सामूहिक क्षमताओं में निहित है। रक्षा, प्रौद्योगिकी और ऊर्जा के क्षेत्रों में इस समूह की विशेष क्षमताओं का लाभ उठाकर, भारत अपनी उन बाह्य निर्भरताओं को कम कर सकता है, जिन्हें केवल पेरिस या बर्लिन के साथ साझेदारी करके कम नहीं किया जा सकता। जैसे-जैसे भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बढ़ाने की दिशा में प्रशस्त होगा, यूरोप की सामूहिक ताकतों का उपयोग करना भारत के विविधीकरण रणनीति के लिए अत्यावश्यक होता जाएगा।
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