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सितंबर 2026 में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने हेतु राष्ट्रपति शी जिनपिंग की नई दिल्ली यात्रा, सात वर्षों में उनकी पहली भारत यात्रा थी। यह यात्रा ऐसे समय में हुई जब भारत-चीन संबंधों में सुधार की अटकलें तीव्रता से गति पकड़ रही है। इस आंकलन के अनुसार, अक्टूबर 2024 में लद्दाख के दूरदराज़ के क्षेत्रों में गश्त के अधिकारों को लेकर दोनों देशों के बीच हुए समझौते के उपरांत, उनकी विवादित सीमा पर चार वर्षों से चल रहे गतिरोध का समापन हो गया है। तब से, ऐसी सुर्ख़ियाँ परस्पर आ रही हैं कि भारत चीनी निवेश, संयुक्त उद्यमों तथा निविदाओं हेतु अपने आर्थिक द्वार खोलने पर विचाराधीन है। संबंधों में आए इस सुधार के पीछे, कुछ हद तक, ट्रंप के राष्ट्रपति बनने और बीजिंग तथा नई दिल्ली की रणनीतिक और आर्थिक स्थिरता की आवश्यकताओं को भी एक कारण माना जा रहा है।

हालाँकि, सम्बन्धों में सुधार के कुछ संकेतों के बावजूद, सीमा विवाद और आर्थिक संबंधों, दोनों ही मोर्चों पर बुनियादी मतभेद कम होने के बजाय बढ़ रहे हैं। हालिया, अमेरिका-चीन संबंधों में आए परिवर्तनों ने भी नई दिल्ली में बेचैनी को बढ़ाया है। इसलिए, शी जिनपिंग की यह यात्रा अपेक्षा से कहीं कम महत्वपूर्ण रही है। सम्बन्धों में सुधार की अपेक्षाओं और भारत-चीन संबंधों को तय करने वाली बुनियादी चुनौतियों के बीच एक स्पष्ट अंतर है, जिसका भविष्य में नई दिल्ली की चीन नीति पर गहरा असर पड़ सकता है।

बढ़ता हुआ शक्ति असंतुलन एवं प्रभावित-दायरा

आज के संदर्भ में, भारत-चीन संबंधों का अधिकांश विश्लेषण 2010 के दशक में तय किए गए एक ढांचे पर आधारित है। चूँकि 2019-20 के बाद से दोनों देशों के संबंधों में बदलाव आए हैं, इसलिए संभावित है कि इस प्रकार के विश्लेषण के ग़लत मायने निकाले जा सकते हैं।

सैन्य संतुलन और युग-चेतना

सापेक्षित शक्ति संदर्भ में अधिक अंतर होने के बावजूद, 2010 के दशक में चीन और भारत के बीच संबंध आज की तुलना में कहीं अधिक बराबरी वाले थे। भारत ने अपना मुख्य ध्यान पाकिस्तान से हटाकर, जो अब तक उसका प्राथमिक सुरक्षा ख़तरा माना जाता था, चीन के विरुद्ध अपनी प्रतिरोध क्षमता को प्रबलता प्रदान करने हेतु संसाधन जोड़ने आरम्भ कर दिए थे। इस परिवर्तन के अंतर्गत हथियारों का क्रय, बुनियादी ढांचे का विकास (एयर बेस और सड़कें), सीमा के समीप सैन्य तैनाती, और अपनी रणनीतिक सोच में एक क्रमिक परिवर्तन समिल्लित था. जिसमें लक्ष्यों की प्राप्ति में विफलता से प्रतिरोध की नीति से आगे बढ़कर दंड से प्रतिरोध क़ायम करने की नीति की ओर बढ़ा है। 2017 में डोकलाम पठार पर जो चीन और भूटान के बीच विवादित क्षेत्र है, भारत का दृढ़ हस्तक्षेप इसी संदर्भ में बिल्कुल सटीक बैठता है। इसके माध्यम से भारत ने यह संकेत दिया कि उसकी विकसित हो रही सैन्य शक्ति अब उसे इस स्थिति में ला सकती है कि वह अपने से कहीं बड़े पड़ोसी को चौंका सके।

उस समय भारत के रणनीतिक कुलीन विद्यमान संतुलन को लेकर अत्यधिक रूप से आशान्वित थे, परंतु साथ ही वे सतर्क भी थे। उन्होंने चीन पर दबाव बनाने के लिए समुद्री विकल्पों पर विचार किया, जिसका प्रचलन आमतौर पर ‘मलक्का विकल्प’ के रूप किया गया है। सैन्य अधिकारियों ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा कि वे दो मोर्चों पर युद्ध के लिए तत्पर हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र तथा ‘क्वाड’ के माध्यम से अमेरिका और समान विचारधारा वाले देशों के साथ भारत की विकसित हो रही रणनीतिक साझेदारी को भी एक बड़ी ताक़त के रूप में प्रदर्शित किया गया, विशेषकर तब जब इन देशों के साथ बीजिंग के संबंध तीव्रता से बिगड़ रहे थे।

तथापि, 2020 की सीमा झड़प, और उसके उपरांत चार वर्षों तक चले गतिरोध एवं इसी दौरान हुई अन्य घटनाओं ने इस स्थिति को बुरी तरह से बिगाड़ दिया है। इस संकट ने भारत को सीमा पर रक्षात्मक रुख अपनाने हेतु विवश कर दिया, एवं इसके चलते भारत को उन दूरदर्शी और प्रतिस्पर्धी प्रतिरोध उपायों को काफ़ी हद तक त्यागना पड़ा, जिन्हें पिछले कुछ वर्षों से भारत धीरे-धीरे विकसित कर रहा था। ऐसा प्रतीत होता है कि भारत अभी भी एक ऐसी ठोस प्रतिरोध रणनीति की खोज कर रहा है, जो भारत की भौगोलिक अखंडता की रक्षा भी कर सकेगा एवं इसके साथ ही किसी भी गंभीर सुरक्षा द्वंद के जन्म को भी रोकेगा।

सैन्य संतुलन अब असंतुलित हो गया है। भारत के रक्षा विक्रय और रक्षा औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र की कमियों के कारण, उसकी सैन्य शक्ति को विकसित करने की प्रक्रिया में विलम्ब आ गया है। दूसरी ओर, चीन अपने पाँचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के बेड़े का तीव्रता से विस्तार कर रहा है, जहाँ इनका उत्पादन वार्षिक रूप से 120 विमानों तक पहुँच गया है; जबकि इसके विपरीत, भारत के लड़ाकू विमान पुराने हो रहे हैं और उनके बेड़े का विस्तार करना भी एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है।

ऐसा प्रतीत होता है कि भारत अभी भी एक ऐसी ठोस प्रतिरोध रणनीति की खोज कर रहा है, जो भारत की भौगोलिक अखंडता की रक्षा भी कर सकेगा एवं इसके साथ ही किसी भी गंभीर सुरक्षा द्वंद के जन्म को भी रोकेगा।

आर्थिक दमन

2020 के सीमा संघर्ष के पश्चात्, भारत ने सैन्य दबाव जैसी जोखिम भरी रणनीति अपनाने के बजाय आर्थिक रूप से उत्तर देने का चुनाव किया। भारत की बढ़ती राष्ट्रवादी नीति के चलते एक आम सहमति साझा हो रही थी कि चीन की आर्थिक नीतियाँ शोषणकारी हैं और इनका भारत तथा समान विचारधारा वाले अन्य देशों पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। उस समय संबंधित पक्षों का मानना ​​था कि भारतीय विनिर्माण और उद्योग अपने दम पर विकसित हो सकते हैं और समय के साथ चीनी सामग्री पर भारत अपनी निर्भरता कम कर सकते हैं। ‘मेक इन इंडिया’ और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (पीएलआई) योजनाओं जैसे कई आर्थिक क़दमों से यह अपेक्षा थी कि ये घरेलू और विदेशी उद्योगों को भारत में निवेश करने हेतु आकर्षित करेंगे—विशेषकर उन उद्योगों को, जो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के व्यापार युद्ध के समय चीन से बाहर निकले गए थे।

परंतु, स्थिति उलट गई है। भारत की विनिर्माण वृद्धि में सापेक्ष रूप से गिरावट आई है, और विभिन्न प्रगतिशील क्षेत्र, वास्तविक विनिर्माण के बजाय मुख्य रूप से पुर्जों को जोड़ने पर आधारित रहे हैं। इन प्रवृत्तियों ने चीनी पूँजी, तकनीक, विशेषज्ञता एवं निर्यात पर भारत की निर्भरता को बढ़ा दिया है। इसका तात्पर्य यह है कि जब अप्रैल 2026 में चीन ने निर्यात नियंत्रणों का एक जटिल जाल लागू किया तो भारत पर इसका असर बहुत अधिक पड़ा। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सलाहकार तरुण कपूर ने ऑटोमोबाइल विनिर्माण संघ के एक कार्यक्रम में कहा, “कोई देश हमें बंधक बना सकता है।” प्रमुख दुर्लभ मृदा घटकों का समय पर आयात न होने की स्थिति में, प्रमुख ऑटोमोबाइल उद्योगों ने चेतावनी दी कि कुछ ही हफ्तों या महीनों में उत्पादन पूरी तरह ठप हो सकता है, और कुछ उद्योगों को अपना उत्पादन दूसरे देशों में स्थानांतरित भी करना पड़ सकता है।

हालाँकि विधि एवं बनावट के संदर्भ में निर्यात नियंत्रण और अन्य प्रतिबंधात्मक उपाय विशेष रूप से भारत को लक्षित नहीं हैं, परंतु विद्यमान रिपोर्टों से इंगित होता है कि संबंधों में तनाव का नकारात्मक असर भारतीयों के लिए वित्तीय वीज़ा जारी करने के साथ-साथ महत्वपूर्ण खनिजों, उर्वरकों और टनल-बोरिंग मशीनों के निर्यात पर भी पड़ा है। इसलिए, नई दिल्ली में यह आम राय है कि चीन का सहयोग और आपूर्ति की विश्वसनीयता काफ़ी हद तक राजनीतिक और रणनीतिक संबंधों पर निर्भर करती है। कम से कम 2023 से, चीन के विश्लेषकों ने सुझाव दिया है कि बीजिंग को भारत के विरुद्ध आर्थिक क्षेत्र में अधिक जवाबी क़दम उठाने चाहिए, जिसमें तकनीक के हस्तांतरण पर निषेध और निर्यात नियंत्रण लागू करना समिल्लित है। जाने-माने विश्लेषक हू शिशेंग का सुझाव है कि चीन को “औद्योगिक श्रृंखलाओं के हस्तांतरण (विशेषकर भारत की ओर) से जुड़ी अपनी नीति में सुधार करना चाहिए, ताकि चीन के विकास की क़ीमत पर भारत के विकास में योगदान देने से बचा जा सके।”

हू शिशेंग के अनुसार, भले ही बीजिंग आधिकारिक तौर पर भारत को दोनों पक्षों के लिए लाभदायक सोच की ओर प्रेरित करे, परंतु भारत के भीतर यह चिंता बढ़ती जा रही है कि मुक़्त व्यापार के माध्यम से भारत, चीन का एक बहुत बड़ा विकल्प बनकर उभर सकता है। यह चिंता विशेष रूप से भारतीय अर्थव्यवस्था के आकार और इसके उद्योगों की विविधता को देखते हुए ओर भी गहरी हो गई है। कपूर के मुताबिक, इस बढ़ती चिंता ने एक ऐसा “मुद्दा” खड़ा कर दिया है, जिसके चलते भारत को चीन के अनुभवों से सीखते हुए बहुत तीव्रता से आगे बढ़ने की आवश्यकता है।

आर्थिक उदारीकरण की सम्भावनाएँ एवं अंतर्निहित ख़ामियाँ 

इस संदर्भ में, ब्रिक्स शिखर सम्मेलन हेतु शी के दौरे से पूर्व बीजिंग ने भारत को यह संदेश दिया था कि वह चीनी व्यवसायों के प्रति उदारीकरण अपनाए। यह बात तीन आपस में जुड़े बिंदुओं के माध्यम से रखी गई थी: भारत के घरेलू विनिर्माण की विफलताएँ; अच्छे संबंधों के लाभ, जैसे कि संवेदनशील तकनीकों, महत्वपूर्ण खनिजों और निर्यात की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करना; एवं चीन के साथ अधिक घनिष्ठता और खुले आर्थिक सहयोग के माध्यम से भारत के अपने विकास और प्रगति की संभावना। परंतु भौगोलिक संप्रभुता और आर्थिक अविश्वास से जुड़े कई कारणों की वजह से, चीन के दबाव व मनाने  के प्रयत्नों के बावजूद, ऐसा प्रतीत होता है कि शी-मोदी शिखर सम्मेलन से अर्थव्यवस्था और सीमा, दोनों ही मुद्दों पर भारत के रुख में कोई अधिक बदलाव नहीं आया है।

बीजिंग के पास मौजूद मज़बूत आर्थिक दबदबे और सीमा पर सैन्य असंतुलन को देखते हुए, उसे शायद यह उम्मीद रही होगी कि सीमा विवाद पर भारत का रुख थोड़ा नरम होगा। इसका मतलब यह है कि सीमा पर होने वाले टकरावों को अधिक सावधानी से संभाला जाए और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) को गश्त करने के अधिकारों के मामले में अधिक छूट दी जाए। रणनीतिक स्तर पर, बीजिंग चाहता है कि भारत सीमा विवाद को अपने आर्थिक विकास से अलग कर दे। इससे चीनी व्यवसायों को यह भरोसा मिलेगा कि सीमा पर होने वाली “घटनाओं” की वजह से उनके आर्थिक निवेश पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा। दूसरी ओर, नई दिल्ली का मानना ​​है कि ऐसा करने से सीमा पर पीएलए  की आक्रामकता पर बची-खुची रोक भी खत्म हो जाएगी। सैद्धांतिक रूप, भारत को सीमा के उल्लंघन का जवाब देने के लिए कुछ विकल्पों की जरूरत है, और पूरे संबंधों के बिगड़ने के डर से उभरने के लिए, एक तरह का साधन प्रदान करता है।

उस समय और उसके उपरांत आई रिपोर्टों के विपरीत, भारत और चीन ने पश्चिमी क्षेत्र में गश्त से जुड़े विवादों को अभी तक पूर्ण रूप से सुलझाया नहीं है। शी जिनपिंग की हालिया यात्रा से पूर्व, अरुणाचल प्रदेश के तक्सिंग क्षेत्र में भारतीय और चीनी गश्ती दलों के बीच गतिरोध उत्पन्न हो गया, जिसे शिखर सम्मेलन से पूर्व सुलझाया नहीं जा सका। वहीं, पूर्वी क्षेत्र में ‘ग्रे ज़ोन’ वाले टकराव और एक-दूसरे के संप्रभुता दावों को लेकर स्थिति और सख़्त हो गई है। यह सब तब हो रहा है जब दोनों पक्ष सीमा पर सुरक्षा प्रबंध बढ़ा रहे हैं; चीन तो सीमा के पास ऐसे गाँव तथा रसद सुविधाएँ भी निर्मित कर रहा है जिनका प्रयोग दोहरे उद्देश्यों (नागरिक एवं सैन्य) हेतु किया जा सकता है, जिससे वहाँ पूरे वर्ष सैनिकों की तैनाती संभव हो सके। सीमा को लेकर विवाद पहले की तरह ही बना हुआ है।

आर्थिक संबंधों में भी विकास के कोई संकेत नहीं दिखे हैं। बल्कि, भारत को अब यह ज्ञात हो गया है कि वह आर्थिक रूप से चीन पर कितना निर्भर है। दूसरी ओर, बीजिंग भारत की इसी गहरी निर्भरता का लाभ उठा रहा है, और साथ ही इस बात पर अपनी चिंता भी प्रकट कर रहा है कि भारत चीनी निवेश, जानकारी व तकनीक से लाभ उठा रहा है। भारत ने भी 2020 के आरम्भ से चीनी व्यवसायों पर लगाई गई पाबंदियों को पूरी तरह से नहीं हटाया है। भारत का प्रेस नोट 3, जो चीन से आने वाले निवेश को रोकने हेतु एक बड़ा कदम था, अभी भी लागू है। हाल ही में कुछ क्षेत्रों को आंशिक रूप से खोलने के जो संकेत मिले हैं, वे बहुत ही विशेष एवं सीमित दायरे वाले हैं, या फिर ऐसे क़दम हैं जिनसे केवल भारत के हितों को लाभ की प्राप्ति होगी। इसी कारण से ‘चैंबर ऑफ चाइनीज एंटरप्राइजेज’ ने इसे व्यापक उदारीकरण के बजाय इसे आंशिक अनुकूलन के रूप में परिभाषित किया है। 

भारत-चीन संबंधों में आई नरमी की शर्तें प्रधानमंत्री मोदी की शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय बैठक के दौरान की गई टिप्पणियों से स्पष्ट होती हैं। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि सीमा पर शांति व स्थिरता, दोनों देशों के बीच समग्र संबंधों के विकास का आधार बनी रहनी चाहिए। इस यात्रा से पूर्व, टक्सिंग घटना को लेकर भारत ने काफ़ी सख़्त रुख़ अपनाया गया था। भारत ने सीमा से जुड़ी इस घटना को ‘सनसनीख़ेज़ न बनाने’ की चीन की इच्छा को मानने से इनकार कर दिया—जो कि अक्टूबर 2024 के उपरांत से सीमावर्ती घटनाओं पर भारत की अब तक की प्रतिक्रियाओं के तरीके से बिल्कुल अलग था। इसके साथ ही, मोदी ने तकनीक और महत्वपूर्ण खनिजों के माध्यम से दबाव डालने पर भी प्रश्न चिन्ह लगा दिए। वहीं, शी जिनपिंग की यात्रा से कुछ दिन पूर्व, भारत की एक नियामक संस्था ने ‘कथित अनियमितताओं’ के लिए शाओमी के विरुद्ध एक नई जाँच प्रक्रिया प्रारम्भ करने की घोषणा की।

चीन को लेकर भारत की नई सोच यह है कि व्यावहारिक रूप से, वह आर्थिक मोर्चे पर बीजिंग को पूर्णतः अलग नहीं कर सकता। इसका तात्पर्य यह है कि भारत के लिए चीन से पूरी तरह से अलग होने या जोखिम कम करने की दिशा में आगे बढ़ने की गुंजाइश बहुत कम है। साथ ही, चीन का बढ़ता आर्थिक प्रभाव इस तथ्य की ओर भी संकेत करता है कि गहरे आर्थिक संबंध आने वाले वर्षों में भारत की निर्णायक क्षमता को दुर्बल कर सकते हैं—चाहे वह सीमा से जुड़ा मामला हो या आर्थिक संबंधों का। इसलिए, भले ही भारत और चीन दोनों के लिए सकारात्मक माहौल बनाने की आवश्यकता हो, परंतु हाल ही में शी और मोदी की वार्ता ने यह प्रदर्शित किया है कि दोनों देशों के बीच के संबंधों में बुनियादी मतभेद कितने गहरे हो गए हैं। भले ही नई दिल्ली चीन के साथ आर्थिक संबंधों को प्रबल करने की ओर अग्रसर हो और लद्दाख संकट की कड़वाहट को पीछे छोड़ना चाहे, किंतु चीन की ओर से आर्थिक संबंधों का ‘शस्त्रीकरण’ और उसका अपनी औद्योगिक आत्मनिर्भरता पर जोर देने की नीति से निकट भविष्य में दोनों पक्षों के लिए लाभदायक आर्थिक संबंधों की संभावना को कम कर सकता है।

भारत क्या कर सकता है?

चीन को लेकर भारत की मौजूदा रणनीति 2000 के दशक के आरम्भ में निर्मित हुई थी। उस समय विश्व ‘एकध्रुवीय’ था, अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध विकसित हो रहे थे, चीन के साथ सीमा काफ़ी हद तक स्थिर थी और चीन संयमित रूप से आगे बढ़ रहा था। यह अपेक्षा थी कि समय के साथ भारत अपने उत्तरी पड़ोसी के साथ आर्थिक और शक्ति के अंतर को कम करने में रहेगा।

2020 के उपरांत, यह पूरा माहौल कई मोर्चों पर बदल गया है चाहे वह भू-राजनीति हो, पड़ोस में मौजूद चुनौतियाँ हों, अथवा चीन के साथ सैन्य और आर्थिक अंतर का मामला हो। परिणामस्वरूप, चीन से जुड़ी भारत की चुनौती अभूतपूर्व तरीके से गहरी और व्यापक होती जा रही है। फिर भी, चुनौतियों से निपटने और खुद को ढालने को लेकर भारत की सोच अभी भी उसी पुराने दौर से जुड़ी हुई है, जिसके कारण एक प्रकार का वैचारिक विरोधाभास पैदा हो गया है।

नई दिल्ली के लिए यह संभावना कम है कि भारत निकट भविष्य में व्यापार और सीमा से जुड़े मुद्दों पर चीन के दबाव के विरुद्ध कोई आक्रामक या प्रतिस्पर्धी रुख़ अपनाएगा, क्योंकि ऐसा करने से दोनों मोर्चों पर तनाव में वृद्धि आ सकती है। अपनी व्यापक राष्ट्रीय शक्ति को प्रबल करते हुए, भारत को किसी अतिवादी रणनीति के बजाय एक अधिक टिकाऊ रणनीति के बारे में सोचना चाहिए। उदाहरण के लिए, सीमा पर चीन की बराबरी करने की कोशिश के बजाय, भारत को चीन के लक्ष्यों को प्राप्त करने से रोकने की रणनीति का सहारा लेना चाहिए। साथ ही, आर्थिक दबाव से निपटने हेतु शत्रुता मोल लेने के बजाय, नेतृत्व स्तर पर राजनीतिक सुलह के प्रयास करने चाहिए।

इस बीच, चीन के साथ विद्यमान संरचनात्मक असमानताओं को दूर करने के लिए देश के भीतर गहरे आर्थिक और प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता होगी। इसके अतिरिक्त, पड़ोसी देशों (चाहे वे बड़ी शक्तियाँ हों या मध्यम शक्तियाँ ) उनके साथ संबंधों को बेहतर बनाना होगा। चीन के साथ सम्बन्धों को बहुत सावधानी से संभालना होगा, और साथ ही आर्थिक दुर्बलताओं तथा सीमा पर ग्रे-ज़ोन दबाव जैसी अल्पकालिक चुनौतियों से निपटने के लिए क़दम उठाने होंगे। शायद हाल के वर्षों में भारत ने जो सबसे बड़ा सबक सीखा है, वह यह है कि उसने अपनी दुर्बलताओं को दूर किए बिना ही चीन के विरुद्ध प्रतिस्पर्धी और संतुलन बनाने वाली रणनीति अपना ली थीं। भारत की वैश्विक स्थिति तब प्रबल हुई थी जब उसे चीन को चुनौती देने वाली एक बड़ी महाशक्ति के रूप में देखा जाने लगा था। लेकिन ऐसी स्थिति तभी तक क़ायम रह सकती है जब तक कि भारत को चीन के एक वास्तविक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जाए; यदि अब ऐसा नहीं माना जाता, तो इस स्थिति से मिलने वाले लाभ भी खोखले हो जाते हैं। भविष्य में चीन के प्रति भारत का दृष्टिकोण अधिक संयमित और सीधा टकराव टालने वाला होना चाहिए। इसमें देश के भीतर नई नीतिगत पहल करने के साथ-साथ, समान विचारधारा वाले साझेदार देशों के साथ व्यापार, रक्षा और रणनीतिक संबंधों को ओर प्रगाढ़ करने पर बल दिया जाना चाहिए।

This article is a translation. Click here to read the original in English.

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Image 1: Indian Ministry of External Affairs via Flickr

Image 2: Indian Ministry of External Affairs via Flickr

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