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दशकों से, भारत में परमाणु ऊर्जा एक राज्य-नियंत्रित क्षेत्र रहा है, जिसका नियामक ढांचा राष्ट्रीय सुरक्षा अनिवार्यताओं, सुरक्षा चिंताओं और देयता जोखिमों द्वारा उचित ठहराया गया है| आज, भारत द्वारा नागरिक परमाणु ऊर्जा में निजी क्षेत्र की भागीदारी की अनुमति देने के निर्णय के साथ उस शासन प्रणाली के उस नमूने को पुनर्परिभाषित किया जा रहा है। ऐसा इसलिए नहीं कि परमाणु जोखिम समाप्त हो गए हैं, बल्कि इसलिए कि भारत की ऊर्जा माँग का स्वरूप मौलिक रूप से बदल गया है। औद्योगिक विद्युतीकरण, डिजिटल अवसंरचना और जलवायु प्रतिबद्धताओं में तीव्रता से विस्तार के कारण परमाणु ऊर्जा नवीकरणीय ऊर्जा के रणनीतिक पूरक के रूप में पुनः उभर रही है। हालांकि, इस सुधार की सफलता निजी भागीदारी में लंबी अवधि से चली आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए नियामक पुनर्गठन पर निर्भर करती है।

भारत के ऊर्जा आंकलन में परमाणु ऊर्जा की आवर्ती 

भारत में विद्युत की माँग किसी भी दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था की तुलना में 2030 के दशक तक तेज़ी से बढ़ने के अनुमान अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के 2024 के दृष्टिकोण से हैं| इसका मुख्य कारण औद्योगिक विस्तार और सेवा क्षेत्र में विकास है। आईईए इस बात पर ज़ोर देता है कि माँग में बढ़ोतरी को मुख्य रूप से विद्युतीकरण औद्योगिक प्रक्रिया, हरित हाइड्रोजन उत्पादन, विद्युतीय गतिशीलता और ऊर्जा-गहन डेटा केंद्र के तेज़ी से विस्तार से आकार मिलेगा। इन डिमांड सोर्स को उच्च विश्वसनीयता और विद्युत गुणवत्ता की आवश्यकता होती है। इसलिए, भारत जैसे-जैसे आने वाले दशकों में परिवर्तनीय नवीकरणीय उत्पादन वाले विद्युत प्रणाली की ओर अग्रसर होगा, ग्रिड स्थिरता पर सरंचनात्मक दबाव पड़ेगा| 

इसके साथ ही, 2021 में सीओपी 26 जलवायु शिखर सम्मेलन में, भारत ने 2070 तक नेट ज़ीरो उत्सर्जन प्राप्त करने और 2030 तक 500 गीगावाट ग़ैर-जीवाश्म क्षमता स्थापित करने का वादा किया। हालांकि, ये लक्ष्य भारत की जलवायु संरक्षण हेतु महत्वाकांक्षाओं को प्रदर्शित करते हैं, किन्तु वायु और सौर जैसे नवीकरणीय ऊर्जा के परिवर्तनीय स्रोत पर अधिक निर्भरता से रुक-रुक कर विद्युत प्राप्त करने, मौसमी बेमेल और प्रणाली संतुलन से जुड़ी चुनौतियों को दर्शाते हैं| 

परमाणु ऊर्जा, सीधे तौर पर इन बाधाओं को दूर करती है, क्योंकि यह उच्च उत्पादन घनत्व और प्रति इकाई विद्युत उत्पादन के लिए अपेक्षाकृत कम भूमि की आवश्यकता के साथ लगभग निरंतर, कम कार्बन विद्युत् पैदा करता है। आईईए परमाणु ऊर्जा को उन ऊर्जा प्रणालियों में स्वच्छ और सुलभ विद्युत के एक महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में पहचानता है जो ग्रिड स्थिरता बनाए रखते हुए गहन डीकार्बोनाइजेशन की दिशा में प्रगति है। नवीकरणीय-आधारित प्रणाली, ऊर्जा प्रणाली को संतुलित करने और भरोसेमंद बनाने के लिए जीवाश्म ईंधन पर आधारित क्षमता पर निर्भरता कम कर सकती है, खासकर कोयले से चलने वाले शक्ति संयंत्र पर, जिनकी ज़रूरत नमनीयता और संरक्षण प्रदान करने हेतु होती है। साथ ही, वे स्थिरता बनाए रखने हेतु आवश्यक ऊर्जा भंडारण के पैमाने को भी सीमित करती है। 

प्रणाली की विश्वसनीयता के लिए इसके रणनीतिक महत्व के बावजूद, परमाणु शक्ति, भारत में विद्युत उत्पादन में केवल एक छोटा सा हिस्सा ही है। नीति आयोग के भारत जलवायु और ऊर्जा डैशबोर्ड (आईसीईडी) द्वारा संकलित आधिकारिक उत्पादन डेटा के अनुसार, जो केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के आंकड़ों पर आधारित है, वित्तीय वर्ष 2024-25 में कोयला विद्युत उत्पादन का मुख्य स्रोत बना रहा, जबकि परमाणु शक्ति एक प्रमुख क्षमता घटक होने के बावजूद एक मामूली लेकिन स्थिर योगदान दिया। रणनीतिक महत्व और वास्तविक उपयोग के बीच यह अंतर बताता है कि परमाणु शक्ति भारत की ऊर्जा नीति बहस में पुनः क्यों उभरा।

नई तकनीक: छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर

तकनीकी विकास सुधारों की आवश्यकता पर बल देते हैं| विश्व भर में, बड़े पारंपरिक रिएक्टरों को लागत में वृद्धि और निर्माण में देरी का सामना करना पड़ा है। इसके विपरीत, छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (एसएमआरएस) मॉड्यूलर निर्माण, कम प्रारंभिक पूंजी आवश्यकता और उन्नत अप्रत्यक्ष सुरक्षा प्रणालियाँ प्रदान करते हैं।

विश्व परमाणु संघ के अनुसार, एसएमआरएस निर्माण जोखिम को कम कर सकते हैं और तैनाती में लचीलापन बढ़ा सकते हैं। भारत के लिए, एसएमआरएस औद्योगिक गलियारों, हाइड्रोजन केंद्रों और बड़े डेटा केंद्रों को स्वच्छ, निरंतर विद्युत् की आपूर्ति की संभावना पैदा करते हैं, जिन्हें निर्बाध विद्युत की आवश्यकता होती है| अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने भी औद्योगिक और गैर-पारंपरिक अनुप्रयोगों के लिए एसएमआरएस’ की उपयुक्तता पर ज़ोर दिया है। 

हालाँकि, भारत का विद्यमान नियामक ढांचा, बड़े, केंद्रीकृत रिएक्टरों के लिए निर्मित किया गया था। लिंसेसिंग, साइटिंग और  देयता के प्रावधान अभी तक मॉड्यूलर या वितरित परमाणु विकास के हिसाब से परिवर्तिति नहीं किए गए हैं। वैश्विक स्तर पर, अधिकांश उन्नत वाणिज्यिक एसएमआरएस अभी भी रचना और विकास के चरणों में है, जिन्हें भविष्य में तैनाती को सक्षम बनाने हेतु नियामक आधारभूत संरचना की आवश्यकता है; अधिक स्पष्टता और संस्थागत तत्परता के बिना, एसएमआरएस के परिचालन में आने के बजाय केवल एक आकांक्षा बनकर रह जाने का जोखिम भी है।

शांति विधेयक और निजी भागीदारी का प्रभाव

इन प्रौद्योगिक विकास और विविध ऊर्जा मिश्रण की के प्रयासों के साथ, भारत सरकार ने परमाणु ऊर्जा के सतत दोहन और विकास (शांति) विधेयक, 2025 पेश किया, ताकि मज़बूत सुरक्षा, संरक्षा और नियामक नियंत्रण बनाए रखते हुए परमाणु ढांचे का आधुनिकीकरण किया जा सके| प्रस्तावित मौजूदा कानूनों को एक साथ लाता है और परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड को वैधानिक दर्जा देकर नियामक ढांचे को उन्नत करता है, जो पहले कार्यकारी आदेशों के माध्यम से अस्तित्व में था| यह रिएक्टर के आकार से जुड़ी ग्रेडेड कैप के ज़रिए, संचालक के दायित्त्व को तर्कसंगत बनाकर, एसएमआरएस सहित नई रिएक्टर प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने की आवश्यकता को भी साफ़ तौर पर मान्यता देता है। साथ ही, संचालक के दायित्वों, प्रस्तावित परमाणु दायित्व निधि और अनुपूरक क्षतिपूर्ति पर विद्यमान प्रावधानों के तहत अंतरराष्ट्रीय क्षतिपूर्ति वाले बहुस्तरीय तंत्र के माध्यम से, पीड़ितों को पूरा मुआवज़ा भी सुनिश्चित करता है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि संबंधित मंत्री ने साफ़ किया कि प्राइवेट/निजी हिस्सेदारी होने के बावजूद, संवेदनशील सामग्री, प्रयोग किए गए ईंधन का प्रबंधन और सुरक्षा की देखरेख पूर्णतः सरकार के नियंत्रण में रहेगी।

निजी भागीदारी की अनुमति देने का तात्पर्य यह नहीं है कि परमाणु ऊर्जा का पूरी तरह से निजीकरण हो जाएगा। इसके बजाय, यह परस्पर सार्वजनिक क्षेत्र की देखरेख में निजी पूंजी, अभियांत्रिकी विशेषज्ञता और संयुक्त उद्यम में हिस्सेदारी के लिए जगह बनाता है। असल में, दुनिया भर में परमाणु ऊर्जा शायद ही कभी पूर्णतः सरकारी कंपनी के रूप में  कार्य करती है। अधिकांश परमाणु ऊर्जा आधारित वाले देशों में रिएक्टर निर्माण करने के लिए, ईंधन सेवा और वित्तपोषण में मिश्रित सार्वजनिक-निजी प्रतिमान हावी हैं। इस तरह, नई विधि भारत को वैश्विक परमाणु प्रतिमानों के निकट लाती है।

परमाणु परियोजनाएं निजी निवेशकों के लिए स्वाभाविक चुनौतियाँ पेश करती हैं: प्रारंभिक पूंजी लागत बहुत अधिक होना, कई दशकों का लंबा समय, और प्राविधिक जटिलता, नियामक अनिश्चितता और कचरे की देनदारियों से जुड़े जोखिम निजी भागीदारी को हतोत्साहित करते हैं। दुनिया भर में, सरकारें दीर्घकालिक प्रतिबद्धता, ऋण गारंटी (जैसे संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में वोगटल संयंत्र के लिए), विद्युत क्रय समझौता (जैसे तुर्की में अक्कूयू संयंत्र हेतु), और रक्षा के लिए अनुबंध (जैसे यूनाइटेड किंगडम में हिंकले पॉइंट सी संयंत्र के लिए) के ज़रिए इन रुकावटों को दूर करती हैं। भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के तुलन पत्र पहले से ही नवीकरणीय ऊर्जा, संचरण विस्तार (2035 तक $142.78 बिलियन) और वितरण सुधार ($14.28 बिलियन) में एक साथ निवेश के कारण दबाव में हैं। ऐसे में शांति विधेयक के सुधार प्रचलित तंत्र को सरल बनाने और सुरक्षा की निगरानी से समझौता किए बिना निजी पूंजी तक पहुँच निश्चित करने के लिए आवश्यक हैं। 

“जैसे-जैसे विद्युत की माँग बढ़ रही है और डीकार्बनाइजेशन गहरा हो रहा है, भारत को नवीकरणीय ऊर्जा के साथ-साथ साफ़, भरोसेमंद बेसलोड ऊर्जा की ज़रूरत है। परमाणु ऊर्जा यह दे सकती है, लेकिन बड़े पैमाने पर इसे हासिल करने के लिए निजी भागीदारी ज़रूरी है।”

बाध्यकारी बाधा के रूप में विनियमन

कठिन आर्थिक परिस्थिति के बावजूद, भारत के परमाणु क्षेत्र में निजी क्षेत्र की दिलचस्पी दिखती है; इसलिए, परमाणु विस्तार के सामने मुख्य चुनौती विनियामक है। भारत का स्वतंत्र ईंधन चक्र बड़े पैमाने पर उत्पादन के लाभों को सीमित करता है, जिससे प्रारंभिक लागत बहुत ज़्यादा आती है (दबावयुक्त भारी जल रिएक्टर हेतु लगभग $1 – 1.4 मिलियन प्रति मेगावाट) जिसका प्रशुल्क दर सौर और हवा (ऊर्जा) की तुलना में (लगभग $220 – 330 हज़ार प्रति मेगावाट) अधिक होता है। कुल मिलाकर, परमाणु ऊर्जा की व्यवहार्यता विनियामक सुधार पर टिकी हुई है, जो शांति विधेयक द्वारा लाइसेंसिंग एवं देयता सीमा को मानक प्रदान कर रहे है, जिससे निजी पूंजी पाने एवं क़ीमत कम करने में मदद मिलेगी। 

कांग्रेस सांसद शशि थरूर जैसे विपक्षी नेताओं ने शांति विधेयक की आलोचना करते हुए इसे मामूली जोखिम छूट के ज़रिए ढीली निगरानी के लिए एक “खतरनाक […] बैकडोर” बताया है, जबकि मनीष तिवारी ने चेतावनी दी कि आपूर्तिकर्ताओं की ज़िम्मेदारी हटाने से विदेशी आपूर्ति पर निर्भर क्षेत्र में पीड़ितों को नुकसान होगा और दूसरों ने भोपाल जैसी आपदाओं के लिए तय मुआवज़े की सीमा को अपर्याप्त माना है। ये तीखी आलोचनाएँ लाइसेंसिंग, ज़िम्मेदारी और मुआवज़े के बारे में असली चिंताओं को उजागर करती हैं; हालाँकि, निजी भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए इन्हीं विशेष क्षेत्रों में नियामक सुधार की आवश्यकता है। 

सर्वप्रथम, परमाणु लाइसेंसिंग की प्रक्रिया अभी भी अनुक्रम एवं अपारदर्शी है। निजी निवेश के लिए अनुमानित समयबद्धता अत्यावश्यक है, खासकर ऐसे क्षेत्र में जहां कई दशकों तक चलने वाली निर्माण अवधि और अधिक प्रारंभिक पूंजी पारंपरिक मूलढ़ांचा परियोजनाओं की तुलना में वित्तीय जोखिमों को बढ़ा देती हैं। 

द्वितीय, परमाणु देयता ने ऐतिहासिक रूप से [निजी] भागीदारी को रोका है। भारत का पिछला देयता ढांचा अंतरराष्ट्रीय प्रतिमानों से भिन्न था, जिससे बीमा की उपलब्धता और जोखिम मूल्य निर्धारण में कठिनाई पैदा हुई। सरकार का तर्क है कि शांति विधेयक आपूर्तिकर्ता की देयता को कम कर, इन समस्याओं का समाधान कर सकता है, जबकि, विधेयक लापरवाही और दंडात्मक प्रावधानों को बनाए रखता है, जिससे भारत की प्रणाली वैश्विक प्रतिमानों के ज़्यादा निकट आती है|

तृतीय, संस्थागत भूमिका में स्पष्टता आवश्यक है। जैसे-जैसे निजी कंपनियाँ इस क्षेत्र में प्रवेश कर रही हैं, वैसे-वैसे संचालक, नियामक और प्रोत्साहक की भूमिका साफ़ रखना जरूरी है। नियामक स्वतंत्रता नागरिक परमाणु उद्योग में सुरक्षा की विश्वसनीयता और निवेशकों के भरोसे का आधार है।

अंत में, नियामक तत्परता को दीर्घकालिक प्रणाली योजना तक बढ़ाना होगा। परमाणु ऊर्जा की अहमियत सिर्फ़ ऊर्जा  पैदा करने में नहीं है, बल्कि पक्की, प्रेषण योग्य क्षमता विकसित करने में भी है, जो अधिक नवीकरणीय ऊर्जा के प्रयोग के बीच भरोसे को बनाए रखती है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की “2029-30 के लिए ऑप्टिमल जेनरेशन कैपेसिटी मिक्स पर रिपोर्ट” हर घंटे के प्रेषण और पर्याप्तता प्रतिरूपण के माध्यम से प्रदर्शित करता है कि, भले ही गैर-जीवाश्म स्रोत संस्थापित क्षमता का लगभग 64 प्रतिशत हों,  प्रणाली की विश्वसनीयता भंडारण के साथ-साथ पक्की क्षमता की उपलब्धता पर निर्भर करती है। यह इस बात पर ज़ोर देता है कि परमाणु ऊर्जा को सिर्फ़ एक ऊर्जा का स्रोत मानने के बजाय, भरोसे को समर्थन करने वाले संसाधन के तौर पर दीर्घकालिक उत्पादन योजना ढांचे में सम्मिलित किया जाए।

सामरिक दांव

परमाणु सुधार का असर विद्युत की आपूर्ति से कहीं अधिक है। भरोसेमंद, साफ़ बेसलोड विद्युत औद्योगिक प्रतिस्पर्धा को समर्थन करती है, जीवाश्म ईंधन आयात पर निर्भरता कम करती है, और डिजिटल बुनियादी ढांचा के निर्माण को मज़बूत करती है। परमाणु ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला में घरेलू विनिर्माण और कुशल रोज़गार के अवसर भी पैदा करती है। सरकार ने परमाणु ऊर्जा के गैर-शक्ति प्रयोग पर भी ज़ोर दिया है, जिसमें कर्क रोग देखभाल, कृषि और औद्योगिक प्रयोग शामिल हैं, जिन्हें नए कानूनी रूपरेखा के तहत मान्यता दी गई है।

भू-राजनीतिक नज़रिए से, आईएनएफसीआईआरसी/66 सुरक्षा प्रणाली के तहत भारत की बढ़ी हुई नागरिक परमाणु गतिविधि एक ज़िम्मेदार परमाणु शक्ति के तौर पर भारत की स्थिति को मज़बूत करती है और अंतर्राष्ट्रीय आपूर्ति नेटवर्क और आपूर्तिकर्ता साझेदारी के ज़रिए अमेरिका, फ्रांस और रूस जैसे देशों के साथ सहयोग को गहराई भी प्रदान करती है|

इस समय, जोखिम ज़्यादा है; कोई सुरक्षा दुर्घटना और विनियामक असफलता जन विश्वास को कमजोर करेंगे एवं ऊर्जा के प्रसार को कम कर सकते है। इसलिए, परमाणु विस्तार के लिए संस्थागत अनुशासन, पारदर्शिता एवं जन जबाबदेही जरूरी है।

आवश्यक परन्तु अधूरा सुधार

भारत के परमाणु क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोलना एक व्यावहारिक ऊर्जा सुरक्षा रणनीति को दिखाता है। जैसे-जैसे विद्युत की माँग बढ़ रही है और डीकार्बनाइजेशन गहरा हो रहा है, भारत को नवीकरणीय ऊर्जा के साथ-साथ साफ़, भरोसेमंद बेसलोड ऊर्जा की ज़रूरत है। परमाणु ऊर्जा यह दे सकती है, लेकिन बड़े पैमाने पर इसे हासिल करने के लिए निजी भागीदारी ज़रूरी है।

सिर्फ़ नीति का इरादा ही नतीजे नहीं देगा। इस सुधार की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत अपने नियामक ढांचे को आधुनिक बना पाता है, संस्थागत भूमिकाओं को साफ़ कर पाता है, और परमाणु ऊर्जा को अपने बढ़ते विद्युत बाज़ारों में एकीकृत कर पाता है या नहीं। परमाणु ऊर्जा का नीति में वापस आना, नवीकरणीय ऊर्जा से पीछे हटने का संकेत नहीं है; यह एक बड़े, तेज़ी से बढ़ते ऊर्जा प्रणाली को प्रबंधित करने की जटिलता को स्वीकार करता है। अगर इसे अच्छे से संभाला गया, तो शांति विधेयक भारत के भरोसेमंद, कार्बन-मुक्त ऊर्जा की ओर महत्वाकांक्षी बदलाव को मज़बूत कर सकता है। हालांकि, अगर इसे ठीक से नहीं संभाला गया, तो यह उस क्षेत्र में एक और अटके हुए वादे में बदलने का जोखिम है, जहां हर देरी की क़ीमत भारी पड़ेगी है।

Views expressed are the author’s own and do not necessarily reflect the positions of: South Asian Voices, the Stimson Center, or our supporters; the Power Foundation of India, the Ministry of Power, or the Government of India.

This article is a translation. Click here to read the original in English.

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Image 1: Stamp of India’s Atomic Reactor Trombay via WikiMedia

Image 2: Narora Power Plant via WikiMedia

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