मोदी

कूटनीति कोई कुल-जोड़ शून्य खेल (zero-sum game) नहीं है। इसमें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने को लिए व्यावहारिकता और आदर्शवाद के साथ साथ संयम और जोखिम उठाने के बीच भी संतुलन बनाना पढ़ता है। १९४७ में भारत की स्वतंत्रता के बाद से भारत के विदेश नीति निर्माताओं ने रणनीतिक संयम और परिकलित जोखिम से दूर रहने का दर्शन अपनाया है। लेकिन यह दृष्टिकोण भारत की सीमाओं को सुरक्षित रखने में पूरी तरह से सफल साबित नहीं हुआ है। डोकलाम पठार पर भारत और चीन के बीच हाल ही में सुलझा गतिरोध भारत के लिए एक अधिक यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाने का अवसर है, खासकर ऐसे समय में जब अमेरिका अपनी एशिया रणनीति पर फिर से गौर कर रहा है, भारत के लंबे समय का रणनीतिक भागीदार रूस पाकिस्तान के साथ मिल रहा है, और क्षेत्र में चीन का प्रभुत्व दिख रहा है।

चीन और भारत के बीच हालिया विवाद तब शुरू हुआ जब भूटान ने बताया कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का निर्माण यूनिट एक ऐसी चीनी सड़क का विस्तार कर रहा है जो डोकलाम से गुज़रेगी, जहाँ भूटान, चीन और भारत की सीमाएं मिलती हैं। १८ जून को नई दिल्ली ने इस निर्माण को रोकने के लिए सैनिक और उपकरण भेज कर उस क्षेत्र में चीनी घुसपैठ का जवाब दिया जिसको भारत भूटान का क्षेत्र मानता है। भारतीय नीति निर्माताओं ने इस सड़क विस्तार को भारतीय सुरक्षा हितों के लिए खतरे के रूप में देखा, क्योंकि यह चीन को सिलीगुड़ी कॉरिडोर के करीब लता है जो भारत को अपने आठ पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है। चीनी और भारतीय सैनिक डोकलाम में एक सख्त गतिरोध में घिरे थे जहाँ  दो हफ्तों पहले तक ऐसा लग रहा था कि कोई पक्ष पीछे नहीं हटेगा।

चीन ने अपनी नाराज़गी प्रकट करने में कोई  संकोच नहीं किया, और चीनी मिलिट्री ने तिब्बत में सैन्य प्रदर्शन किया और इसी के साथ साथ चीनी सरकारी मीडिया भारतीय सैनिकों की एकतरफा वापसी  की मांग करने में काफी मुखर थी। इसकी तुलना में भारत की प्रतिक्रिया अधिक संयत थी , राजनेता और मीडिया आमतौर पर गैर जिम्मेदाराना बयानबाजी से दूर रहे और उनहोंने स्पष्ट किया कि भारत संघर्ष के मुकाबले कूटनीति का समर्थन करता है। हालांकि, अपने सैनिक वापस लेने से इनकार करना इस बात का संकेत था कि भारत रणनीतिक संयम से दूर जाने लगा है।

सैन्य शक्ति और आर्थिक विकास के संदर्भ  में भारत और चीन दोनों के बीच बड़ी दरार के कारण बीजिंग अन्य विवादास्पद क्षेत्रों में भारत की सामरिक और सुरक्षा प्राथमिकताओं को नज़रअंदाज़ करने की हिम्मत जुटा पाता है।  कुछ हालिया उदाहरणों में परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत की सदस्यता के लिए चीन का विरोध, जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने से इनकार और कश्मीर के विवादित क्षेत्र से चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (सीपीईसी) का प्रस्तावित निर्माण शामिल हैं।

इस प्रकार बीजिंग से निपटने के लिए नई दिल्ली को सहकारी और प्रतिस्पर्धी रणनीतियों के मिश्रण का प्रयोग करना होगा। सबसे पहले, चीन से लगी असीमांकित सीमा पर सामरिक तनाव को देखते हुए भारत को वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर अपने बुनियादी ढांचे को मजबूत करना चाहिए। चीन के सीमावर्ती सड़कों और रेलवे के व्यापक नेटवर्क की तुलना में, भारत ने पिछले १५ सालों में एलएसी पर ७३ सामरिक सड़कों में से केवल २७ का निर्माण पूरा किया है।

डोकलाम

दूसरा, भारत को अमेरिका, चीन और ऑस्ट्रेलिया के साथ अपने सुरक्षा और रक्षा सहयोग को मजबूत करना चाहिए। इस संबंध में, चीनी सुरक्षा चिंताओं को ध्यान में रखते हुए, भारत को अमेरिका-भारत-जापान-मलबार नौसैनिक अभ्यासों में ऑस्ट्रेलिया की भागीदारी पर अपने विरोध पर फिर से विचार करना चाहिए। भारत को अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं पर अधिक और चीन को संतुष्ट करने पर कम ध्यान देना चाहिए। इसके अलावा, इस तरह के अभ्यासों से भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी नौसेना क्षमताओं को मजबूत करने में मदद मिलेगी, जहां चीन ने हाल ही में म्यांमार के क्यौक पयु  और श्रीलंका के हंबनटोटा में इसी तरह की गतिविधियों के माध्यम से अपनी जगह बनाई है । इसके साथ साथ चीन ने जिबूती में भी अपनी जगह बना ली है जहां उसने अपना पहला विदेशी सैन्य बेस स्थापित किया है।

अंत में, इस आक्रामक पहल को संतुलित करने लिए भारत को चीन के साथ पारस्परिक रूप से लाभकारी आर्थिक सहयोग करना चाहिए। उदाहरण के लिए बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार (बीसीआईएम) गलियारा , जो सड़क, रेल और वायुमार्ग के माध्यम से दक्षिण पूर्व एशिया के साथ भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को जोड़ेगा, आर्थिक सहयोग का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र हो सकता है। जहाँ चीन बीसीआईएम को अपने वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) से जोड़ना चाहेगा, भारत भी “एक्ट ईस्ट” नीति को आगे बढ़ाने के लिए बीसीआईएम का उपयोग कर सकता है, जिसका उद्देश्य भारत और एशिया प्रशांत क्षेत्र के बीच अधिक से अधिक आर्थिक और सामरिक सहयोग है। सामरिक दृष्टिकोण से, इससे दक्षिणपूर्व एशियाई देशों के बीच भारत के लिए सद्भावना पैदा करने में मदद मिलेगी और चीन की आग्रहिता  का जवाब देने के लिए इसकी आवश्यकता भी है।

डोकलाम विवाद के थमने के साथ ही, भारत और चीन को एक जटिल शक्ति समीकरण का सामना करना होगा। चीन के कुल-जोड़ शून्य खेल का मुकाबले करने के लिए भारत को अपनी विदेश नीति में सहकारी और प्रतिस्पर्धी तत्वों का उपयोग करना चाहिए। भारत का यह अधिक यथार्थवादी दृष्टिकोण उसे रणनीतिक और आर्थिक चुनौतियों से निपटने और भू-राजनीतिक परिस्थितियों को बदलने में बल प्रदान करेगा।

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Image 1: The Kremlin

Image 2: Pankaj Nangia/India Today Group via Getty Images

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