उत्तरी हिंद महासागर एक ऐसा कार्यक्षेत्र है जो विशाल विस्तार, असमान जोखिम, विरोधी के आशय को लेकर अनिश्चितता और उन्नत सैन्य तकनीकों के प्रसार के लिए जाना जाता है। इस माहौल में, भारत और पाकिस्तान की समुद्री सेनाओं का विकास मारक श्रृंखला को संचालित करने की उनकी चेष्टा को प्रदर्शित करता है। इसमें संवेदक, भेदक और कमान एवं नियंत्रण प्रणाली को ऐसे जाल तंत्र में जोड़ा जाता है जो दुश्मन के इस प्रक्रिया में बाधा डालने से पूर्व ही उसे पहचान सकें, निर्णय ले सकें एवं प्रहार कर सकें। नतीजतन, नौसैनिक प्रतिस्पर्धा अब मुख्य रूप से इस तथ्य से तय होती है कि कोई देश कितनी कुशलता से हालात की जानकारी प्राप्त करते हुए, इस जानकारी को कितनी तीव्रता से संसाधित करता है और लंबी दूरी तक समय-संवेदनशील प्रहार कर सकता है।
भारतीय और पाकिस्तानी नौसेनाओं की मारक श्रृंखला कितनी असरदार होगी, यह उनकी प्रहार करने की क्षमता पर निर्भर करता है। ये क्षमताएँ संचालन की पहुँच को बढ़ाती हैं, निर्णय लेने में लगने वाले समय को कम करती हैं और समुद्री युद्ध-क्षेत्र में दुश्मन की सेनाओं को चुनौती देने की ताक़त बढ़ाती हैं। आधुनिक स्ट्राइक क्षमताओं के विकास के साथ, दोनों नौसेनाएँ संवेदक जाल तंत्र, सम्प्रेषण बिंदुओं और कमान-एवं-नियंत्रण प्रणाली पर अपनी निर्भरता बढ़ा रही हैं। परंतु उनकी प्रभावशीलता केवल विनाशकारी शक्ति पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इस तथ्य पर निर्भर करती है कि उन्हें ऐसी मारक-श्रृंखला व्यवस्था में कैसे जोड़ा गया है जो तेज़, आपस में जुड़ी हुई एवं प्रबल हो।
नौसैनिक मारक-श्रृंखला एवं समुद्री युद्ध
मारक-श्रृंखला वह क्रम है जिसके माध्यम से किसी लक्ष्य का पता लगाया जाता है, उसकी पहचान की जाती है, उस पर निगाह रखी जाती है, उस पर निशाना साधा जाता है, एवं उस पर प्रहार किया जाता है और अंत में उसका आँकलन किया जाता है। मारक-श्रृंखला —जिसे आम तौर पर ‘ढूंढना, तय करना, निगाह रखना, निशाना साधना, प्रहार करना एवं आँकलन करना’ (एफ़2टी2ईए) प्रक्रिया के तौर पर वर्णित किया जाता है। यह प्रक्रिया संवेदक, निर्णायकों एवं हथियारों को एक सुव्यवस्थित संचालन प्रणाली में जोड़ती है। इसका मूल उद्देश्य शत्रु की तुलना में तीव्रता से जानकारी के लाभों को लड़ाई में असरदार कार्यवाही में परिवर्तित करना होता है। समुद्र के विशाल और परिवर्तित हो रहे माहौल में, जहाँ लक्ष्य परस्पर अपने स्थान से बदलते रहते हैं, वहाँ जानकारी और निर्णय लेने में बढ़त प्राप्त करने हेतु नौसैनिक मारक श्रृंखला अंतरिक्ष, वायु, सतह और जल के नीचे फैले वितरित संवेदक जाल तंत्र पर निर्भर करती हैं।
नौसैनिक मारक श्रृंखला के असरदार होने के लिए, स्ट्राइक क्षमताओं का बदलते समुद्री माहौल में टिके रहना, संवेदक, कमांडरों और स्ट्राइक प्लेटफॉर्म के बीच संपर्क बनाए रखना और कठिन हालात में भी कार्य करते रहना अनिवार्य है। ये आवश्यकताएँ स्ट्राइक क्षमताओं को हालात की समझ बनाने और दायित्व तय करके निवारण क्षमता का उत्थान करने में सहायक है।
कुल मिलाकर, दोनों नौसेनाओं ने अपनी-अपनी समुद्री रणनीतियों के अनुसार असरदार नौसैनिक मारक श्रृंखला निर्मित करने हेतु भिन्न-भिन्न तरीक़ों को अपनाया है। […] हालाँकि, दोनों प्रणालियों की सफलता वास्तविक समय में डेटा एकीकरण, इलेक्ट्रॉनिक-युद्ध के दौरान टिके रहने की क्षमता और नुक़सान झेलते हुए भी संचालन कार्य को जारी रखने की क़ाबिलियत पर निर्भर करेगी।
भारत और पाकिस्तान की नौसैनिक स्ट्राइक क्षमताएँ एवं मारक-श्रृंखला
नवीन भारतीय नौसेना सिद्धांत 2025 (आईएमडी-25) में हिंद प्रशांत क्षेत्र में समुद्र पर नियंत्रण और ताकत प्रदर्शित करने पर आधारित एक रणनीति प्रतिपादित की गई है – ‘यानी न युद्ध न शांति वाली नई स्थितियों’ (एनडबल्यूएनपी)। एनडबल्यूएनपी के अंतर्गत भारतीय समुद्री सेनाओं को शांति और युद्ध, दोनों ही स्थितियों में ग्रे ज़ोन और बहुक्षेत्र, जिसमें जल के नीचे के क्षेत्र में भी सक्रिय जवाबी कार्यवाही करने हेतु परस्पर पूर्ण रूप से तत्पर एवं सक्षम रहना होगा। यह भारतीय नौसेना की मारक श्रृंखला में जानकारी के माध्यम से बिना किसी रुकावट के तीव्रता, आश्चर्य एवं प्रभाव बनाए रखने हेतु आवश्यकता को उजागर करता है।
तुलनात्मक रूप से, पाकिस्तान की प्रथम समुद्री नीति, “समुद्र की स्वतंत्रता बनाए रखना” समुद्र अवरोधन एवं तटीय सुरक्षा पर ज़ोर देती है। समुद्री सेनाओं का परम उद्देश्य समुद्र की ओर से होने वाले प्रहार को रोकना और साथ ही तटीय समुदायों व आपदा राहत कार्यों में सहायता करना है। यह नीति पाकिस्तान की समुद्री सेनाओं की मौजूदगी को केवल अरब सागर तक सीमित नहीं रखती; बल्कि, यह हिंद महासागर क्षेत्र में भी शत्रु को रोकने के तरीके को लागू करती है। इससे तीव्रता, भिन्न-भिन्न स्थानों पर संचालन करने और पाकिस्तानी नौसेना की मारक श्रृंखला में शत्रु की संचालन प्रक्रिया को कठिन बनाने की क्षमता की आवश्यकता पर ज़ोर देता है।
भारत और पाकिस्तान की मारक श्रृंखला में प्लेटफॉर्म की विविधता, पैमाने और बैकअप क्षमता के मामले में अंतर है। भारत की मारक श्रृंखला एक व्यापक और बहु-कार्य क्षेत्र प्रणाली है (तालिका 1 देखें) जिसके दो मुख्य भाग हैं। प्रथम भाग इसके बड़े पैमाने पर विद्यमान अंतरिक्ष में स्थित संपत्ति हैं, जो हर प्रकार के मौसम में सम्प्रेषण, सिंथेटिक अपर्चर रडार (एसएआर) और उच्च संकल्प ऑप्टिकल इमेजिंग की सुविधा देते हैं, जिससे मारक श्रृंखला के सभी चरणों को प्रबलता मिलती है। दूसरा मुख्य भाग इसकी स्ट्राइक क्षमता है, जिनमें विशेष तौर पर ब्रह्मोस और एसएमएआरटी (स्मार्ट) प्रक्षेपास्त्र समिल्लित हैं। जब इन्हें समय पर संवेदक और सी2 डेटा से जानकारी प्राप्त होती है, तो सुपरसोनिक ब्रह्मोस प्रक्षेपास्त्र निशाना तय करने से लेकर प्रहार तक के समय को कम कर सकती है। वहीं, एसएमएआरटी एक प्रक्षेपास्त्र-सहायक नौघ्नी कैनिस्टराइज़्ड प्रणाली है; यह पनडुब्बी रोधी युद्ध (एएसडबल्यू) की श्रेणी को विकसित करता है क्योंकि यह आवधिक खोज से पूर्व हल्के वज़न की नौघ्नी को दूर स्थित स्प्लैश पॉइंट तक ले जाता है। ये सभी क्षमताएँ मिलकर एक परत-दर-परत संवेदक से भेदक जाल तंत्र का निर्माण करती हैं, जो भारत की समुद्री रणनीति के अनुरूप है।
पाकिस्तान की मारक श्रृंखला में भी एफ2टी2ईए के सभी चरण समिल्लित हैं (तालिका 2 देखें), परंतु यह अधिक सुव्यवस्थित है और इसमें बहुत अधिक अतिरिक्त बैकअप के बजाय एकीकरण को प्राथमिकता दी जाती है। पृथ्वी अवलोकन (ईओ) उपग्रह पाकिस्तान की निगरानी क्षमताओं को विकसित कर रहे हैं, परंतु भारत के बड़े उपग्रह जाल तंत्र की तुलना में, ये अभी कम समय तक और मिशन के हिसाब से कम सटीक नौसैनिक आवृत क्षेत्र प्रदान करते हैं; इनका ध्यान मुख्य रूप से तटीय जलक्षेत्र पर होता है। इसी प्रकार से, एडवेंट सीएमएस और असेल्सन ईएसएम सुइट्स का एकीकरण जाल तंत्र वाले संचालन को प्रबलता प्रदान करता है, खासकर ट्रैक और एंगेज चरणों में। इसके अतिरिक्त, पाकिस्तान के पास कई प्रकार के क्रूज़ प्रक्षेपास्त्र हैं, जिनमें हरबाह, तैमूर और बाबर-3 समिल्लित हैं। पाकिस्तान एसएमएएसएच नाम के पोत से लॉन्च होने वाले बैलिस्टिक प्रक्षेपास्त्र भी विकसित कर रहा है, जो दुश्मन की सुरक्षा को भेदने की क्षमता और मुश्किल हालात में भी सेना के बचे रहने की क्षमता को बेहतर बनाती है।
कुल मिलाकर, दोनों नौसेनाओं ने अपनी-अपनी समुद्री रणनीतियों के अनुसार असरदार नौसैनिक मारक श्रृंखला निर्मित करने हेतु भिन्न-भिन्न तरीक़ों को अपनाया है। भारत की बड़े पैमाने पर फैली, कई परतों वाली सेंसर और सम्प्रेषण प्रणाली परस्पर निगरानी, लंबी दूरी तक संचालन करने की क्षमता और बैकअप की सुविधा प्रदान करती है; जबकि पाकिस्तान एक ऐसे सुगम और कारगर प्रणाली पर कार्य करता है जो एकीकरण, गतिशीलता और कठिन हालात में भी प्रहार करने की क्षमता पर निर्भर है। हालाँकि, दोनों प्रणालियों की सफलता वास्तविक समय में डेटा एकीकरण, इलेक्ट्रॉनिक-युद्ध के दौरान टिके रहने की क्षमता और नुक़सान झेलते हुए भी संचालन कार्य को जारी रखने की क़ाबिलियत पर निर्भर करेगी।
भारतीय और पाकिस्तानी नौसैनिक मारक श्रृंखला का तुलनात्मक मूल्यांकन
भारतीय और पाकिस्तानी नौसैनिक मारक क्षमताएँ भिन्न भिन्न परिचालन दृष्टिकोणों और प्राथमिकताओं को दर्शाती हैं। भारत अपनी नई राष्ट्रीय समुद्री सीमा नीति (एनडबल्यूएनपी) शर्तों के अंतर्गत समुद्री नियंत्रण और शक्ति प्रदर्शन को प्राथमिकता देता है, जबकि पाकिस्तान समुद्री अवरोधन पर ध्यान केंद्रित करता है। प्लेटफ़ॉर्मों की संख्या की तुलना करने के बजाय, निम्नलिखित तुलना का उद्देश्य यह आँकलन करना है कि दोनों मारक श्रृंखलायें तीन प्रमुख आवश्यकताओं की कितनी अच्छी तरह पूर्ति कर रही हैं।
परस्पर प्रयास एवं स्थितिजन्य जागरूकता
असरदार नौसैनिक मारक श्रृंखला हेतु परस्पर निगरानी आवश्यक है, क्योंकि समुद्र में विद्यमान लक्ष्य चलते-फिरते रहते हैं और अक्सर उनका पता लगाना कठिन होता है। भारत के उपग्रह, बढ़ते पी-8आई बेड़े, तटीय रडार जाल तंत्र, पोत पर स्थित सेंसर और समुद्री जानकारी को एकत्रित करने वाली प्रणालियों के माध्यम से समुद्री क्षेत्र पर परस्पर नज़र रखने की क्षमता बनाता है। यहाँ, उपग्रह बड़े क्षेत्र में परस्पर नज़र रखते हैं, जबकि पी-8आई विमान सटीक सामरिक सेंसिंग और पनडुब्बी-रोधी युद्ध क्षमता प्रदान करते हैं। ये सभी क्षमताएँ मिलकर भारतीय नौसेना की एनडबल्यूएफ़पी के दर्शन को समर्थन प्रदान करती हैं और भारत की मारक श्रृंखला के ढूँढने, तय करने और निगाह रखने के चरणों को प्रबलता प्रदान करती हैं।
इसके विपरीत, पाकिस्तान की निगरानी प्रणाली मुख्य रूप से ज़ेड-9ईसी हार्बिन एटीआर-72 समुद्र ईगल और समुद्र सुल्तान एमपीए, तटीय निगरानी प्रणाली और सतह व पानी के नीचे कार्यरत संवेदक पर निर्भर करता है। ये सभी मिलकर पाकिस्तान के समुद्री सिद्धांत के हिसाब से हालात की स्थितिजन्य जानकारी प्रदान करते हैं। ये ‘ढूंढने, तय करने और निगाह रखने’ के चरणों को बेहतर बनाते हैं। तथापि, पाकिस्तान की विकसित हो रही ईओ उपग्रह क्षमता उसकी निगरानी का दायरा बढ़ा रही है, परंतु अभी यह परस्पर जानकारी नहीं दे पाती है। लंबी दूरी के समुद्री गश्ती विमान समुद्र सुल्तान के हालिया समिल्लित होने से उत्तरी हिंद महासागर क्षेत्र पर परस्पर नज़र रखने की क्षमता बेहतर होने और अरब सागर से आगे के क्षेत्रों पर भी नज़र रखने की अपेक्षा है।
परंतु, केवल परस्पर निगरानी से ही असरदार तरीके से लक्ष्य को साधना पक्का नहीं होता:, निर्णायकों एवं प्रहार करने वाले प्लेटफ़ॉर्म के बीच जानकारी का तीव्रता से आदान-प्रदान भी आवश्यक है।
कनेक्टिविटी और कमान एवं नियंत्रण
जानकारी एकत्रीकरण के उपरांत, नौसैनिक मारक श्रृंखला की प्रभावशीलता इस तथ्य पर निर्भर करती है की उसे संवेदक, निशाना एवं प्रहार प्लेटफॉर्म के बीच कितनी तेज़ी और सटीकता से भेजा, संधारित एवं वितरित किया जाता है।
एक ओर, भारतीय नौसैनिक मारक श्रृंखला के भीतर कनेक्टिविटी उन बिंदुओं पर निर्भर हैं जो उपग्रह, प्लेटफॉर्म एवं समुद्री फ़्यूज़न केंद्र एवं राष्ट्रीय कमान, नियंत्रण, सम्प्रेषण एवं बुद्धिमत्ता (एनसी3आई) को जोड़ते हैं, ताकि नौसैनिक संचालन इकाइयों के डेटा को वास्तविक समय सीमा के अंतर्गत भेजा जा सके। स्वदेशी रूप से विकसित, टैक्टिकल डेटा सम्प्रेषण स्वीट, लिंक-II, मारक श्रृंखला में सूचनाओं का सुरक्षित वास्तविक समय में आदान प्रदान सुनिश्चित करता है। इतनी प्रबल एवं व्यापक कनेक्टिविटी के बावजूद, भारतीय नौसैनिक मारक श्रृंखला के समक्ष अभी भी निगरानी डेटा को हथियार-ग्रेड लक्ष्यकरण डेटा में बदलने की आम चुनौती बनी हुई है। इसका असर मारक श्रृंखला के खोजने, तय करने और निगाह रखने के चरणों पर पड़ सकता है। दूसरी ओर, पाकिस्तान की नौसैनिक मारक श्रृंखला नौसैनिक सूचना विनिमय प्रणाली (एनआईएक्सएस) और डेटा लिंक्स पर निर्भर करती है, जो नौसैनिक विमानन, संवेदक एवं पोतों को जोड़ते हैं ताकि क्षितिज के पार निशाना साधने (ओटीएच) में सहायता प्राप्त हो सके और जानकारी साझा करना सरल हो।
इन दोनों मारक श्रृंखलाओं के बीच का अंतर तकनीक का नहीं, बल्कि संरचना का है। भारत का बड़ा उपग्रह जाल तंत्र नेटवर्क हर मौसम में परस्पर गुप्त जानकारी, निगरानी एवं टोही और सुरक्षित सैन्य संचार की सुविधा प्रदान करता है। वहीं, पाकिस्तान मुख्य रूप से लंबी दूरी के समुद्री गश्ती विमानों पर निर्भर है, जिन्हें एक छोटे परंतु बढ़ते हुए दोहरे प्रयोग वाले उपग्रह बेड़े का समर्थन प्राप्त है। इससे उन्हें बड़े क्षेत्र की निगरानी में सहायता प्राप्त होती है और वे उपग्रह की परस्पर मौजूदगी के बजाय वायु से निगरानी करने के लचीलेपन और तीव्रता के कारण दोबारा तैनाती की क्षमता को चुन सकते हैं।
प्रहार की क्षमता और तालमेल के स्तर के बावजूद, मारक श्रृंखला के दौरान जानकारी का आदान-प्रदान साइबर प्रहारों एवं इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के जोखिम की जद में रहता है। इसलिए, मारक श्रृंखला की सफलता सम्प्रेषण के जाल तंत्र की मज़बूती और अलग-अलग प्रकार के संवेदकों और प्लेटफॉर्म के सफल एकीकरण पर निर्भर करती है।

लचीलापन एवं टिके रहने की क्षमता
लचीलापन मारक श्रृंखला की संचालन प्रक्रिया के दौरान होने वाली क्षति, साइबर रुकावट अथवा दखल, और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के बावजूद कार्यरत रहने में सहायता करता है। इसमें दो पूरक विशेषताएँ समिल्लित हैं: बैकअप और टिके रहने की क्षमता। रिडंडेंसी का मतलब है संकट के समय मारक श्रृंखला को संचालित रखने हेतु कई सम्प्रेषण नोड्स और हथियार प्रणालियों, संवेदकों के फैले हुए जाल तंत्र एवं प्रणोदन रचना का प्रयोग करना; वहीं, टिके रहने की क्षमता का तात्पर्य है प्रहार के प्रति अपनी दुर्बलता एवं जोखिम को कम करना, और क्षति को सीमित करके उसे ठीक करना ताकि संकट के दौरान भी मारक श्रृंखला बनी रहे और कार्यरत रहे।
तालिका 1 में दर्शाई गई भारतीय नौसेना की मारक श्रृंखला, उपग्रहों, विभिन्न निगरानी प्लेटफार्मों, संचार प्रणालियों और समुद्री सी2 एवं फ्यूजन केंद्रों के व्यापक नेटवर्क के साथ-साथ कई संचार मार्गों से अपनी मज़बूती प्राप्त करती है। इससे किसी एक नोड पर निर्भरता कम होती है और अतिरेक उजागर होता है। इसके अतिरिक्त, जाल तंत्र-केंद्रित युद्ध को सक्षम करने वाली सहकारी सहभागिता क्षमता (सीईसी), जैम-प्रतिरोधी डेटा लिंक्स, बेहतर स्थितिजन्य जागरूकता, लंबी दूरी पर बेहतर अवरोधन और स्तरित सुरक्षा के माध्यम से इस संरचना को प्रबलता प्रदान करती है। एके-360 घेरकर मारने वाली हथियार प्रणाली (सीआईडबल्यूएस) से लेकर, जो बिंदु रक्षा और अवरोधन प्रदान करता है। इसके साथ, बराक-8 इंटरसेप्टर तक, जो विस्तारित टर्मिनल एंगेजमेंट प्रदान करता है, तथा अग्नि-नियंत्रण रडार से लेकर अजंता और एलोरा जैसे इलेक्ट्रॉनिक युद्ध स्वीट तक (जैसा कि तालिका 1 में प्रदर्शित किया गया है), नौसेना की मारक श्रृंखला एक वितरित, जैम-प्रतिरोधी टर्मिनल रक्षा के लिए संरचित है। तथापि, एक शत्रु संतृप्ति प्रहारों एवं टर्मिनल बचाव युद्धाभ्यास के माध्यम से बराक-8 और एके-630 सीआईडबल्यूएस को पछाड़ सकता है। पाकिस्तान के प्रक्षेपास्त्र भंडार के समक्ष यह सीमा उतनी गंभीर नहीं है, क्योंकि पाकिस्तान भारत की रक्षा व्यवस्था को दबाव में लाने के लिए व्यापक हमला कर सकता है, परंतु फिलहाल उसकी मारक क्षमता सीमित है। आधुनिक सतह युद्धपोतों की गुप्त संरचना और इलेक्ट्रॉनिक जवाबी उपाय उसके टिकाऊपन का विस्तार करते हैं। जाल तंत्र-केंद्रित युद्ध की ओर समग्र परिवर्तन, मारक श्रृंखला के टिके रहने को सुनिश्चित करने की दिशा में एक पदध्वनि के समान है।
तुलनात्मक रूप से, पाकिस्तानी मारक श्रृंखला एक ऐसे प्रतिमान से लचीलापन प्राप्त करती है जो कम संसाधनों के कुशल एकीकरण पर निर्भर है। यहाँ, एनआईएक्सएस, जो एक खुली और लचीली रचना पर आधारित है और किसी एक नोड पर निर्भर किए बिना वास्तविक समय में पोतों और संवेदकों के बीच विश्वसनीय रूप से सूचना के प्रवाह की अनुमति देती है, बैकअप और टिकाऊपन को प्रबल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। रणनीतिक स्तर पर, बाबर-3 एसएलसीएम टिकाऊपन योग्य द्वितीय-प्रहार क्षमता प्रदान करके लचीलेपन को विकसित कर रहा है, जबकि हैंगोर-श्रेणी की पनडुब्बी और इसके पोतों में स्वयं को विलुप्त रखने की कला और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध स्वीट का एकीकरण टिकाऊपन का विस्तार कर रहा है। बढ़ती हुई ईओ उपग्रह क्षमता भी बैकअप में सुधार कर रही है। हालाँकि, ये संसाधन वर्तमान में हवाई निरंतरता का पूरक हैं, न कि उसका प्रतिस्थापन।
लचीलेपन के दो भिन्न-भिन्न प्रतिमान हैं। भारतीय प्रतिमान एक व्यापक और स्तरित संवेदकों से जाल तंत्र के माध्यम से बैकअप पर निर्भर करता है जो परिचालन पहुँच और निरंतरता में वृद्धि करते है। परंतु, सी2 में जटिलता भी विकसित करते है। पाकिस्तान का प्रतिमान अधिक सुव्यवस्थित और एकीकृत है, जो अपनी समुद्री नियंत्रण रणनीति को समर्थन देने हेतु कुशल जाल तंत्र प्रक्रिया और टिकाऊ प्लेटफार्मों पर निर्भर करता है, परंतु इसकी छोटी निगरानी परत किसी महत्वपूर्ण संपत्ति के नष्ट होने से असुरक्षित हो जाती है। इसकी अंतिम रक्षा प्रणाली, जिसमें लघु-श्रेणी की सतह से वायु में मार करने वाली प्रक्षेपास्त्र (एसएएम), टाइप-730 और गोकडेनिज़ सीआईडब्ल्यूएस, और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध उपकरण समिल्लित हैं, सबसोनिक समुद्री-सतही प्रक्षेपास्त्रों के विरुद्ध बिंदु रक्षा प्रदान करते हैं, परंतु एक सघन प्रहार व अंतिम बचाव युद्धाभ्यास, जैसे कि भारत के ब्रह्मोस प्रक्षेपास्त्र के अंतिम बचाव युद्धाभ्यास से यह ध्वस्त हो सकते हैं।
दोनों [भारत और पाकिस्तान के] पथ क्षेत्रीय नौसैनिक प्रतिस्पर्धा के लक्षण हैं, जिसमें अलग-अलग प्लेटफ़ॉर्म और उनकी आधुनिकता के बजाय प्रबल एवं एकीकृत मारक श्रृंखला पर अधिक बल दिया जा रहा है।
निष्कर्ष
नौसेना की मारक श्रृंखला, परस्पर संवेदक विलय एवं भिन्न भिन्न स्थानों पर मौजूद, जैमिंग-रोधी टर्मिनल रक्षा पर निर्भर करती है। हालाँकि, शत्रु इसकी बनावट में विद्यमान दुर्बलताओं का लाभ उठाकर उस श्रृंखला को तोड़ सकता है। दुश्मन अग्नि-नियंत्रण रडार जैसे अहम हिस्सों को निशाना बना सकता है, या जैमिंग, स्पूफ़िंग और साइबर-प्रहारों से डेटा नोड्स को दुर्बल कर सकता है, या फिर संवेदक पर बहुत अधिक डेटा का बोझ डाल सकता है। यदि कनेक्टिविटी में कोई दिक्कत आती है, तो बहुस्तरीय संरचना भी एक ही स्थान पर खराबी आने से दुर्बल हो सकती है। इन दुर्बलताओं पर ध्यान देना इसलिए भी अनिवार्य है क्योंकि भारतीय और पाकिस्तानी नौसेनाओं ने आधुनिकीकरण के भिन्न-भिन्न पथों का चुनाव किया है।
आगे चलकर, भारत के लिए जाल तंत्र पर आधारित युद्ध और स्वदेशीकरण व तकनीकी अभ्युत्थान के माध्यम से मज़बूत जाल तंत्र इंटरऑपरेबिलिटी की ओर प्रशस्त होना चुनौतीपूर्ण होगा, क्योंकि उसे पुराने प्लेटफ़ॉर्म एवं शत्रु के उन्नत इलेक्ट्रॉनिक युद्ध कला प्रणाली का सामना करना होगा। दूसरी ओर, पाकिस्तान ग्वादर और अपने समुद्री संचार मार्गों की सुरक्षा हेतु चीन और तुर्की के साथ मिलकर अपनी नौसेना को आधुनिक बना रहा है, और विदेशी सहायता व स्वदेशीकरण के लंबे समय के लाभों के बीच संतुलन भी प्राप्त कर रहा है। दोनों ही पथ क्षेत्रीय नौसैनिक प्रतिस्पर्धा के लक्षण हैं, जिसमें अलग-अलग प्लेटफ़ॉर्म और उनकी आधुनिकता के बजाय प्रबल एवं एकीकृत मारक श्रृंखला पर अधिक बल दिया जा रहा है।
दोनों ही मारक श्रृंखलाओं की प्रभावशीलता परिचालन संबंधी बाधाओं, साइबर प्रहारों एवं इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के दौरान सूचना श्रेष्ठता बनाए रखने की उनकी क्षमता पर निर्भर करती है। दोनों देशों ने इस कनेक्टिविटी को प्रबल करने हेतु प्रणालियाँ विकसित की हैं; हालाँकि, दक्षिण एशिया में किसी भी संघर्ष में प्रक्षेपास्त्र प्रहार की सीमित समयसीमा एक चुनौती है जिसे स्वचालित नेटवर्किंग, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, छल एवं गहन रक्षा के माध्यम से हल किया जा सकता है। संभवतः यह केवल समय की बात है जब भारत और पाकिस्तान इन समाधानों को लागू करेंगे और चुनौतीपूर्ण खोज-से-लड़ने की समयसीमा को हल करते हुए मारक श्रृंखलाओं के टिकाऊपन और विश्वसनीयता में विकास करेंगे। इससे प्रतिरोध क्षमता मज़बूत`हो सकती है, परंतु साथ ही, यदि मानवीय हस्तक्षेप वाले सुरक्षा उपाय दुर्बल हों तो स्वचालन से ग़लत अनुमानों का जोखिम बढ़ सकता है और संकट के संकेतों को समझना जटिल हो सकता है। इस कारण भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक स्थिरता बनाए रखने हेतु स्वचालित जुड़ाव नियमों और विश्वास-निर्माण उपायों को संहिताबद्ध करने की दिशा में कार्यरत होना आवश्यक है।
This article is a translation. Click here to read the original in English.
***
Image 1: British High Commission, New Delhi via Flickr
Image 2: Mak Hon Keong via Wikimedia