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30 अप्रैल को, पाकिस्तान ने चीन की आधिकारिक यात्रा के दौरान आठ हैंगोर-श्रेणी की पनडुब्बियों में से प्रथम पनडुब्बी को पाकिस्तानी नौसेना में समिल्लित किया। पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी ने इस अवसर को नौसेना के लिए एक “ऐतिहासिक मील का पत्थर” घोषित किया। चीन और पाकिस्तान द्वारा संयुक्त रूप से निर्मित इस पनडुब्बी को पाकिस्तान ने मई 2025 में नई दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच हुए संकट की पहली वर्षगाँठ से ठीक पहले अपनी नौसेना में शामिल किया। इस टकराव में जवाबी प्रक्षेपास्त्र प्रहार समिल्लित थे और इसने दक्षिण एशिया के संघर्षों में बीजिंग की बढ़ती भूमिका को उजागर किया था। हैंगोर पनडुब्बी केवल एक क्षमता उन्नयन से कहीं अधिक है, यह पाकिस्तान के नौसैनिक आधुनिकीकरण एवं बीजिंग के साथ बढ़ते रक्षा सहयोग का एक महत्वपूर्ण स्वरूप है।

पाकिस्तान द्वारा हैंगोर पनडुब्बी का अधिग्रहण दक्षिण एशिया में प्रतिरोध हेतु तीन प्रभावशाली परिवर्तनों का संकेत देता है: चीन-पाकिस्तान सहयोग का गहराना, इस्लामाबाद द्वारा अपनी द्वितीय-प्रहार क्षमता को प्रबल करने हेतु पनडुब्बी से दाग़ी जाने वाली परमाणु क्रूज़ प्रक्षेपास्त्र की ओर बढ़ना, और समुद्री क्षेत्र में भारत-पाकिस्तान प्रतिस्पर्धा का तीव्र होना। ये सभी परिवर्तन अनजाने में तनाव में वृद्धि का ख़तरा पैदा कर सकते हैं, समुद्री विश्वास-निर्माण उपायों (सीबीएम) के अभाव में स्थिरता को संकटग्रस्त कर सकते हैं, और पनडुब्बी तैनाती के विकास के साथ पारंपरिक-परमाणु अस्पष्टता उत्पन्न कर सकते हैं। इन जोखिमों से निपटने हेतु भारत और पाकिस्तान को समुद्र में तनाव वृद्धि के प्रबंधन के लिए रूपरेखा विकसित करनी होगी – द्विपक्षीय वार्ता के टूटने से यह चुनौती और भी अधिक कठिन हो गई है।

पाकिस्तान के द्वारा हैंगोर पनडुब्बी को नियुक्त: अब क्यों?

हैंगोर पनडुब्बी, चीन की 039ए प्रकार युआन-वर्ग पनडुब्बी का ही एक डीज़ल-इलेक्ट्रिक प्रकार है, जिसे पाकिस्तान ने 2015 में ख़रीदने की घोषणा की थी। पनडुब्बी के इंजन पर निर्यात अनुज्ञप्ति से जुड़ी पाबंदियों और पूर्ण रूप से नवीन पनडुब्बी रचना के एकीकरण में आई मुश्किलों के कारण, इसे चालू करने में लगभग एक दशक का समय लग गया। हैंगोर में उत्तम सेंसर, नौघ्नी और पोत विरोधी क्रूज़ प्रक्षेपास्त्र तैनात हैं, जो सतह पर चलने वाले युद्धपोतों, पनडुब्बियों और ज़मीन पर विद्यमान ठिकानों पर प्रहार करने में सक्षम हैं। इस पनडुब्बी में वायु स्वतंत्र प्रणोदन (एआईपी) प्रणाली अंतर्निहित है, जिससे यह लम्बी अवधि तक जल के नीचे रह सकती है। इससे पाकिस्तान की पनडुब्बी बेड़े की क्षमता बढ़ती है, क्योंकि यह परस्पर जल के नीचे मौजूद रह सकती है और ‘अगम्यता/विरोधी क्षेत्र अस्वीकृति (ए2/एडी) जैसी क्षमताएँ प्राप्त कर करती है। पाकिस्तान के नौसेना प्रमुख ने बताया कि हैंगोर पनडुब्बियाँ “प्रहार को रोकने और अरब समुद्र तथा व्यापक हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री संचार के अहम रास्तों (एसएलओसी) की सुरक्षा सुनिश्चित करने” में महती भूमिका निभा सकती हैं।

पारंपरिक क्षमताओं से आगे बढ़कर, ‘फेडरेशन ऑफ़ अमेरिकन साइंटिस्ट्स’ के हालिया विश्लेषण से ज्ञात हुआ है कि पाकिस्तान हैंगोर पनडुब्बी में दोहरी क्षमता वाली ‘बाबर-3’ सी-लॉन्च्ड क्रूज़ प्रक्षेपास्त्र (एसएलसीएम) को शामिल करने की चेष्टा कर सकता है। पाकिस्तानी अधिकारियों का कहना है कि ‘बाबर-3’ पाकिस्तान को “भरोसेमंद द्वितीय प्रहार क्षमता” प्रदान कर सकती है, जिससे ‘हंगोर’ को परमाणु मिशन की क्षमता प्राप्त होगी। एसएलसीएम के अतिरिक्त, पाकिस्तान सतह पर चलने वाले पोतों के लिए भी ‘बाबर’ का एक विशिष्ट प्रकार निर्मित कर रहा है। पाकिस्तान के विद्यमान बेड़े में फ्रांस में निर्मित ‘अगोस्टा-वर्ग’ पनडुब्बियाँ समिल्लित हैं, जिनका स्थान हैंगोर लेगा। नवीन पनडुब्बी और ‘बाबर’ के प्रकार मिलकर पाकिस्तान की प्रहार करने की क्षमता को विकसित करेंगे और एक विद्यमान ए2/एडी रणनीति की ओर परिवर्तन का संकेत देंगे। वायु स्वतंत्र प्रणोदन-युक्त क्षमता लम्बी अवधि तक मौजूदगी बनाए रखने में सहायक है, जबकि पोत-विरोधी क्रूज़ प्रक्षेपास्त्र और नौघ्नी दूर से प्रहार करने की क्षमता प्रदान करते हैं और भारत की पनडुब्बी-रोधी युद्ध के प्रयासों को कठिन बनाते हैं।

पाकिस्तान द्वारा हैंगोर पनडुब्बी का अधिग्रहण दक्षिण एशिया में प्रतिरोध हेतु तीन प्रभावशाली परिवर्तनों का संकेत देता है: चीन-पाकिस्तान सहयोग का गहराना, इस्लामाबाद द्वारा अपनी द्वितीय-प्रहार क्षमता को प्रबल करने हेतु पनडुब्बी से दाग़ी जाने वाली परमाणु क्रूज़ प्रक्षेपास्त्र की ओर बढ़ना, और समुद्री क्षेत्र में भारत-पाकिस्तान प्रतिस्पर्धा का तीव्र होना।

इस विस्तार के बावजूद, पाकिस्तान के पास अभी अपनी परमाणु-संचालित बैलिस्टिक प्रक्षेपास्त्र पनडुब्बी (एसएसबीएन) विकसित करने के साधन नहीं हैं। ऐसे कार्यक्रम के विकास एवं रखरखाव हेतु परस्पर अनुदान की आवश्यकता होती है—ऐसे निवेश जो थल एवं वायु क्षेत्रों को प्राथमिकता देने वाले रक्षा बजट के साथ मुक़ाबला करते हैं। बजट की प्राथमिकताओं के अतिरिक्त, पाकिस्तान के पास एसएसबीएम रिएक्टर निर्मित करने हेतु आवश्यक घरेलू तकनीकी कार्यक्षेत्र का भी अभाव है। हैंगोर जैसी डीज़ल-इलेक्ट्रिक प्रहार पनडुब्बी सस्ती होती है, इसमें क्रूज़ प्रक्षेपास्त्र ले जाई जा सकती है, और इसमें एसएसबीएम के समान परमाणु रिएक्टर की आवश्यकता नहीं होती। यह पनडुब्बी पाकिस्तान को ‘समुद्र-प्रत्याख्यान’ (समुद्र में दुश्मन की पहुँच रोकने की) रणनीति अपनाने में सहायता करती है, जिससे वह गहरे समुद्र में होने वाले उस वैश्विक परिचालन के बजाय—जिनमें आमतौर पर एसएसबीएन का प्रयोग होता है—किसी ख़ास क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करने में सहायता करता है। इस्लामाबाद का ध्यान अपनी सीमाओं की सुरक्षा करने और वायु से होने वाले आधुनिक ख़तरों का मुक़ाबला करने पर केंद्रित है, परंतु उसका पारंपरिक बेड़ा पुराना हो गया है; उदाहरण हेतु, 1970 के दशक में अधिग्रहण की गई अगोस्टा पनडुब्बियों को बदलने की आवश्यकता है। इसी को देखते हुए, पाकिस्तान के नौसेना प्रमुख ने हैंगोर को समिल्लित करने को “समुद्री सुरक्षा को मज़बूत करने और अत्याधुनिक तकनीक के साथ अपने बेड़े को आधुनिक बनाने की दिशा में एक अहम कदम” बताया

आधुनिकीकरण के अतिरिक्त, पाकिस्तानी सेना समुद्र-आधारित अपनी निवारक क्षमता को “भारत के परमाणु त्रय एवं ‘हिंद महासागर क्षेत्र के परमाणुकरण’ का मुक़ाबला करने” की होड़ के तौर पर प्रस्तुत करती है। असल में, भारत भी अपनी समुद्र-आधारित निवारक क्षमता को आधुनिक बना रहा है ताकि वह दो प्रतिस्पर्धी ख़तरों —हिंद महासागर में चीन की बढ़ती नौसैनिक मौजूदगी और पाकिस्तान की बढ़ती समुद्री क्षमताओं—के विरुद्ध अपनी ‘द्वितीय प्रहार’ क्षमता (दुश्मन के प्रहार को झेलने के बाद भी जवाबी प्रहार करने की क्षमता) को विकसित कर सके। अप्रैल 2026 में, भारत ने अपना तीसरा एसएसबीएन, आईएनएस अरिधमन नौसेना  में समिल्लित किया, जो के-4 और के-15 पनडुब्बी-लॉन्च्ड बैलिस्टिक प्रक्षेपास्त्रों ​​को ले जा सकता है। 750 किमी की रेंज (पहुँच) वाले के-15 प्रक्षेपास्त्र भारत को पाकिस्तान के विरुद्ध कम दूरी तक प्रहार करने का विकल्प प्रस्तुत करती हैं, जबकि 3,500 किमी की रेंज वाला के-4 प्रक्षेपास्त्र भारत को अधिक दूरी से प्रहार करने की क्षमता प्रदान करता है। पाकिस्तान द्वारा हैंगोर पनडुब्बियों को अपनी नौसेना में नियुक्त करना उसके आधुनिकीकरण की आवश्यकताओं को प्रमाणित करता है, साथ ही दक्षिण एशिया में समुद्री हथियारों की बढ़ती होड़ की ओर भी संकेत देता है।

दक्षिण एशिया में एक रणनीतिक निर्णायक मोड़

पाकिस्तान का ‘हंगोर’ पनडुब्बी प्राप्त करना दक्षिण एशिया में प्रतिरोध पर असर डालने वाले तीन घटनाक्रमों का संकेत है। प्रथम, यह सौदा चीन और पाकिस्तान के बीच बढ़ते सहयोग को रेखांकित करता है। बीजिंग और इस्लामाबाद पहले से ही एक-दूसरे को ‘हर हालात के साथी’ मानते हैं और उनके बीच एक “उच्च स्तरीय गठबंधन” है, जिसमें हथियारों की बिक्री, रक्षा क्षेत्र में मिलकर उत्पादन करना और दोनों देशों की सेनाओं की संयुक्त तैयारियों का विस्तार शामिल है। मई 2025 का संकट इस बात का सबसे हालिया साक्ष्य प्रदान करता है कि उनके संबंध कितने प्रगाढ़ है। इस संकट में पाकिस्तान ने चीनी जे-10 सी लड़ाकू विमान और पीएल-15 प्रक्षेपास्त्रों का प्रयोग किया एवं बीजिंग ने प्रक्षेपास्त्र प्रहारों के समय इस्लामाबाद को मौके पर भी तकनीकी सहायता प्रदान की।

पाकिस्तान की नौसेना के आधुनिकीकरण में चीन का निवेश हिंद महासागर में बीजिंग के बड़े लक्ष्यों को भी आगे बढ़ाता है और उसकी क्षेत्रीय रणनीति का एक अहम भाग है। चीन इन क्षमताओं का प्रयोग हिंद महासागर में अपना प्रभाव बढ़ाने, भारत को क्षेत्रीय स्तर पर रोकने और अपनी सतत् नाविक मौजूदगी बनाए रखने के लिए कर सकता है। यह निवेश इस तथ्य का संकेत भी हो सकता है कि भारत-पाकिस्तान संकटों के प्रति चीन का दृष्टिकोण परिवर्तित हो रहा है। तथापि चीन पारंपरि रूप से मध्यस्थता की इच्छुकता वाला कूटनीतिक रुख अपनाता रहा है, परंतु भविष्य में नई दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच संकट बढ़ने पर बीजिंग कूटनीति से आगे बढ़कर सैन्य सहायता देने जैसी भूमिका भी निभा सकता है।

द्वितीय, हैंगोर की नियुक्ति से पाकिस्तान की ‘द्वितीय प्रहार’ क्षमता बढ़ने के संकेत है। पाकिस्तान मुख्य रूप से ज़मीन पर आधारित प्रतिरोध-नीति से हटकर अधिक विविध रणनीति अपना रहा है, जिससे उसकी भरोसेमंद ‘द्वितीय प्रहार क्षमता’ बेहतर हो रही है और थल सेनाओं पर दबाव कम होगा। इस विविध रणनीति का उद्देश्य नई दिल्ली के विरुद्ध अपनी प्रतिरोध-क्षमता को मज़बूत करना है, क्योंकि भारत भी अधिक प्रक्षेपास्त्र पेलोड ले जाने वाले एसएसबीएन (बैलिस्टिक प्रक्षेपास्त्र ले जाने वाली परमाणु पनडुब्बियों) के बढ़ते बेड़े के साथ अपनी ‘द्वितीय प्रहार क्षमता’ को आधुनिक बना रहा है। भारत की योजना 2027 में चौथा एसएसबीएन और 2030 के दशक में दो परमाणु हमलावर पनडुब्बियाँ (एसएसएन) नियुक्त करने की है। दोनों देश समुद्र में परमाणु प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे ऐसे परमाणु जोखिम पैदा हो रहे हैं जिन्हें संभालने का अनुभव किसी के पास नहीं है।

तीसरा, क्षमताओं में आए इन परिवर्तनों से भारत-पाकिस्तान के बीच टकराव का दायरा बढ़ गया है। तथापि भारत और पाकिस्तान के बीच समुद्री क्षेत्र में मुक़ाबला रहा है—जिसमें 1971 की लड़ाई के दौरान नौसैनिक संघर्ष भी शामिल है, —परंतु उनके समुद्री मुक़ाबले में पनडुब्बियों की बढ़ती भूमिका नए जोखिम पैदा करती है।, जिनका सामना पहले किसी भी पक्ष ने नहीं किया है। जैसे-जैसे दोनों देश आपसी भरोसा बढ़ाने वाले उचित उपायों के बिना अपनी समुद्री क्षमताओं को प्रबल कर रहे हैं, उनके बीच संभावित टकराव का दायरा बढ़ता जा रहा है। पनडुब्बियों का पता लगाना कठिन होता है, और समुद्री तनाव वृद्धि के चरणों के बारे में स्पष्टता न होने से स्थिति को समझने में कठिनाई होती है। मई 2025 के संकट ने दर्शाया कि भारत-पाकिस्तान के बीच टकराव कितनी तीव्रता से बढ़ सकता है, यहाँ तक ​​कि ज़मीनी क्षेत्र में भी, जहाँ दोनों देशों को संघर्षों का लंबा अनुभव है। समुद्री क्षेत्र तक मुक़ाबले का विस्तार तनाव बढ़ने की प्रक्रिया को और जटिल बना देता है, जिससे स्थिति का पता लगाने, उसकी पुष्टि करने या तनाव कम करने के लिए बहुत कम समय मिलता है।

परमाणु जोखिम प्रबंधन 

पाकिस्तान की समुद्री-आधारित प्रतिरोधक क्षमता एक ऐसे रणनीतिक वातावरण में प्रवेश कर रही है जहाँ भौगोलिक निकटता और समुद्री नियंत्रण उपायों की अनुपस्थिति पहले से ही निर्णय लेने के समय को सीमित कर देती है। जिससे संकटकालीन स्थिरता कमजोर हो जाती है। सुनिश्चित जवाबी कार्यवाही—पहले हमले को झेलने के उपरांत असहनीय क्षति पहुँचाने की क्षमता—अग्रिम हमले के लिए प्रोत्साहन को कम करके प्रतिरोधक क्षमता की गतिशीलता को स्थिर करने पर लक्षित है। परंतु इसका स्थिरता पर प्रभाव इस तथ्य पर निर्भर करता है कि राज्यों को हमले की पुष्टि करने और सोच-समझकर उत्तर देने का समय मिले। प्रक्षेपास्त्रों की कम उड़ान अवधि निर्णय लेने के इस समय को कम कर देती है, जिससे अग्रिम हमले का जोखिम बढ़ जाता है। पनडुब्बियाँ कमान और नियंत्रण को और भी जटिल बना देती हैं: तटवर्ती कमान के साथ सीमित सत्यापन से लॉन्च प्राधिकरण के संबंध में अस्पष्टता पैदा होती है और निर्णय लेने का समय सीमित हो जाता है।

भारत, पाकिस्तान और चीन की समुद्री गतिविधियों के बढ़ने से इस क्षेत्र में ग़लत पहचान और भीड़-भाड़ का ख़तरा बढ़ गया है, जिससे अनजाने में तनाव बढ़ने की आशंका भी बढ़ जाती है। 2016 में पाकिस्तान में भारत की “शल्य प्रहार” के उपरांत, पाकिस्तान ने दावा किया कि उसने एक भारतीय पनडुब्बी को अपने समुद्री क्षेत्र में घुसने से रोका, परंतु भारत ने इस दावे को खारिज कर दिया। 2019 में पुलवामा हमले और बालाकोट में भारत के वायु प्रहार के उपरांत, पाकिस्तान ने पुनः दावा किया कि उसने एक भारतीय पनडुब्बी का पता लगाया है, जिसे भारत ने “प्रचार” करार दिया। भारत, पाकिस्तान और चीन सभी अपनी पनडुब्बियों की तैनाती बढ़ा रहे हैं, जिससे इस क्षेत्र में नाविक आवाजावी बढ़ गई है। भारत के लिए यह एक विशेष समस्या है: 2016 और 2019 की घटनाओं में दोनों देशों के बीच पनडुब्बी का पता लगाने को लेकर अस्पष्टता थी, परंतु अब जब पाकिस्तान चीन की बनी पनडुब्बियों को संचालित कर रहा है और चीन हिंद महासागर में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है, तो यह पता लगाना कठिन हो जाएगा कि पनडुब्बी किसकी है, और इससे तनाव में वृद्धि का  ख़तरा भी बढ़ेगा।

आखिरकार, अगर पाकिस्तान हैंगोर पनडुब्बी पर ‘बाबर एसएलसीएम तैनात करता है, तो समुद्र में पारंपरिक और परमाणु हथियारों की तैनाती के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाएगा। हैंगोर पारंपरिक प्रक्षेपास्त्रों वाले ट्यूब से ही ‘बाबर-3 ‘ को लॉन्च करती है, जिससे उड़ान के दौरान उनमें अंतर करना नामुमकिन हो जाता है। इस्लामाबाद ने समुद्र-आधारित परमाणु तैनाती पर अपना रुख सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किया है। इससे नई दिल्ली की प्रतिक्रिया तय करना कठिन हो जाता है, क्योंकि उसकी नीति ‘प्रथम प्रहार’ के उपरांत ‘बड़े पैमाने पर जवाबी कार्यवाही’ करने की है; ऐसे में, एक भी अस्पष्ट तैनाती से तनाव बढ़ने का ख़तरा पैदा हो सकता है। 2022 में बिना हथियार वाली ब्रह्मोस क्रूज़ प्रक्षेपास्त्र के ग़लती से लॉन्च होने की घटना इस पहचान की चुनौती को दर्शाती है: पाकिस्तानी रडार ने भारतीय प्रक्षेपास्त्र का पता तो लगा लिया, परंतु पाकिस्तानी नेतृत्व यह तय नहीं कर पाया कि उसमें पारंपरिक हथियार लगा है या परमाणु। ब्रह्मोस की यह घटना शांति के समय हुई थी, जिससे पाकिस्तान पर सैन्य कार्यवाही करने या तनाव बढ़ाने का दबाव कम था। समुद्र में किसी संकट के समय, हाई-अलर्ट की स्थिति में जाँच-पड़ताल का समय कम हो जाएगा, पनडुब्बी की पहचान करने में मुश्किल से प्रतिक्रिया तय करना कठिन हो जाएगा, और पहचान न कर पाने की समस्या जवाबी कार्यवाही की नौबत तक ले जा सकती है।

चूँकि दोनों देश बिना किसी उचित नियम-क़ायदे के समुद्र-आधारित प्रतिरोध की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, इसलिए भारत-पाकिस्तान के बीच अगला संकट समुद्र के नीचे बढ़ सकता है। इस संकट में दोनों देशों के आपसी संबंधों पर भी असर पड़ सकता है, जिनमें वार्तालाप के तंत्र का अभाव है।

अभी भारत और पाकिस्तान के बीच समुद्री विश्वास निर्माण उपाय विद्यमान नहीं हैं, जिससे समुद्री गतिविधियाँ बिना किसी नियम-क़ानून के चल रही हैं। नई दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच परमाणु ठिकानों पर प्रहार न करने का समझौता और बैलिस्टिक प्रक्षेपास्त्रों की तैनाती से पूर्व सूचना देने का समझौता तो है, परंतु इनमें पनडुब्बियों अथवा क्रूज़ प्रक्षेपास्त्रों को समिल्लित नहीं किया गया है। इसमें अधिकतर वार्तालाप के पथ भी ठप पड़े हैं। तैनाती से पूर्व  सूचना देने के समझौते के बावजूद, पाकिस्तान ने 2024 में अग्नि-V आईसीबीएम की परीक्षण तैनाती के बारे में देर से सूचना देने का आरोप भारत पर लगाया; इस घटना से मौजूदा पारदर्शिता के तरीकों पर भरोसे में कमी का पता चला। कई प्रस्तावों में कहा गया है कि भारत और पाकिस्तान को 1972 के अमेरिका-सोवियत आईएनसीएसईए (समुद्र में होने वाली घटनाओं से जुड़ा समझौता) की तर्ज़ पर ‘सामुद्रिक घटनाओं हेतु समझौता’ (आईएनसीएसईए) करना चाहिए, ताकि अनावश्यक टकराव को रोका जा सके और वार्षिक समीक्षा बैठकें की जा सकें। ऐसा समझौता इस्लामाबाद और नई दिल्ली के बीच समुद्री  विश्वास निर्माण उपायों की स्थापना कर सकता है। परंतु, 2019 से दोनों के बीच ‘ट्रैक-1’ वार्ता नहीं हुई है। मई 2025 के संकट ने दोनों देशों के सम्बन्धों में आई उस दरार का संकेत दिया जो अभी भी सुलझा नहीं है, और इसमें अहम संधियों और समझौतों का निलंबन भी समिल्लित है।

चरण-दर-चरण तरीका आगे बढ़ने का पथ प्रदर्शित करता है। निकट भविष्य में, ‘ट्रैक II’ वार्तालाप और जुड़ाव का अवसर प्रदान कर सकती है। मई 2025 से, भारत और पाकिस्तान के ‘ट्रैक II’ में समिल्लित लोग बड़े भू-राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा करने के लिए कई बार मिल चुके हैं। आगे इस वर्ष के अंत में और भी बैठकें होनी हैं। इन बैठकों की कार्यसूची में हिंद महासागर क्षेत्र में नौसेना से जुड़ी गतिविधियों को भी शामिल किया जाना चाहिए, ताकि आईएनसीएसईए जैसे धाँचे के लिए आवश्यक नींव तैयार की जा सकें। इसमें टक्कर से बचने के उपाय और नौसेना-से-नौसेना के बीच वार्तालाप शामिल होनी चाहिए, जिसका अभाव अभी नई दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच है। मध्यम अवधि में, भारत और पाकिस्तान समुद्री सुरक्षा के मुद्दों पर ‘इंडियन ओशन नेवल सिम्पोजियम’ (आईओएनएस) के माध्यम से बातचीत प्रारम्भ करनी चाहिए। यह एक स्वैच्छिक बहुपक्षीय संगठन है जो क्षेत्रीय नौसेनाओं के बीच वार्तालाप को बढ़ावा देता है। तथापि आईओएनएस परमाणु मुद्दों पर चर्चा नहीं करता है, परंतु यह कम जोखिम वाली समुद्री बातचीत के लिए एक मंच का काम कर सकता है। अगर ‘ट्रैक I’ वार्तालाप पुनः प्रारम्भ करना है, तो ‘ट्रैक II’ और आईओएनएस का जमीनी हकीकत पर ध्यान द्विपक्षीय आईएनसीएसईए ढांचे में सहायता कर सकती है।

पाकिस्तान का हैंगोर पनडुब्बी प्राप्त करना भारत और पाकिस्तान के बीच भविष्य के टकराव के बढ़ते दायरे को दर्शाता है और हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री संकटों से निपटने के लिए सही व्यवस्था के अभाव को उजागर करता है। चूँकि दोनों देश बिना किसी उचित नियम-क़ायदे के समुद्र-आधारित प्रतिरोध की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, इसलिए भारत-पाकिस्तान के बीच अगला संकट समुद्र के नीचे बढ़ सकता है। इस संकट में दोनों देशों के आपसी संबंधों पर भी असर पड़ सकता है, जिनमें वार्तालाप के तंत्र का अभाव है। दक्षिण एशिया में रणनीतिक स्थिरता हेतु इस अभाव को दूर करना और समुद्र में अनजाने में होने वाले तनाव को रोकना अत्यावशक है।

This article is a translation. Click here to read the original in English.

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Image 1: Shehbaz Sharif on X

Image 2: Wikimedia Commons

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