Sharif Ghalibaf

सन् 1971 के ग्रीष्म काल में, एक पाकिस्तानी सैन्य विमान हेनरी किसिंजर को बीजिंग की गुप्त उड़ान पर ले गया। इस यात्रा ने शीत युद्ध के सबसे प्रभावशाली राजनयिक अवसरों में से एक को खोलने में सहायता की और अल्पकाल में वैश्विक रणनीति के लिए पाकिस्तान को अपरिहार्य बना दिया।  इस्लामाबाद ने बदले में कुछ अधिक माँग नहीं की, बस उन्हीं माँगों की अपेक्षा की जो उसे लम्बी अवधि से चाहिए थी: प्रासंगिकता, भौतिक एवं राजनैतिक के साथ आने वाले लाभ।

आधी सदी के उपरांत, पाकिस्तान कुछ ऐसा ही करने की चेष्टा कर रहा है: पाकिस्तान, वॉशिंगटन और तेहरान के बीच एक गुप्त सम्पर्क सूत्र के तौर पर खुद को प्रस्तुत कर रहा है।औपचारिक रूप से साझेदार रहे संयुक्त राज्य अमेरिका, जिसके साथ पाकिस्तान के पहले से संबंध हैं एवं चीन, जिसका रणनीतिक और आर्थिक संरक्षण 1960 के दशक से पाकिस्तानी सेना का आधार रहा है और ईरान, एक ऐसा देश जिस पर पाकिस्तान ऐतिहासिक रूप से सावधानी के दृष्टिकोण रखता है। पाकिस्तान इन सभी देशों के साथ अपने संबंधों को संतुलित करने के प्रयास कर रहा है। कुछ अवलोकनकर्ताओं को यह कुशल कूटनीति लगती है, जबकि अन्य को यह विरोधाभासी प्रतीत होती है। इसके बजाय, पाकिस्तान की मध्यस्थता को एक अधिक सुसंगत एवं संरचनात्मक प्रक्रिया के रूप में बेहतर ढंग से समझा जा सकता है—एक ऐसी बारम्बार अपनाई जाने वाली रणनीति जिसके अंतर्गत राजनीतिक और सैन्य अभिजात वर्ग अपनी भू-राजनीतिक अहमियत को घरेलू स्तर पर अपनी सत्ता बनाए रखने के साधन में बदल लेते हैं।

अभिजात वर्ग की  गतिकी

1947 से, पाकिस्तान की विदेश नीति अक्सर राष्ट्रीय सहमति को प्रदर्शित करने के बजाय, उसका स्थान लेने हेतु कार्यरत है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्थिति का लाभ उठाकर, नागरिक-सैन्य गठबंधन ने संसाधन और प्रतिष्ठा प्राप्त की है और घरेलू दबाव से स्वयं को मुक्त रखा है। अक्सर ऐसा हुआ है कि जब देश के भीतर अस्थिरता रही है, तभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का महत्व भी बढ़ा है। ईरान युद्ध में मध्यस्थता के प्रयत्न भी इसी स्वरूप का प्रतिंबिंब है।

फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर और पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व के लिए, देश में तनाव के इस दौर में पुनः अहमियत प्राप्त करना, सरकारी कामकाज में अपनी मुख्य भूमिका को मज़बूत करने का एक माध्यम है। राजनीतिक ध्रुवीकरण और तीव्र हो गया है; पाकिस्तानी संस्थापन एवं पीटीआई के बीच टकराव और इमरान खान के कारावास ने नागरिक राजनीतिक परिदृश्य को बाँट दिया है। परस्पर आईएमएफ़ के कार्यक्रम, पाकिस्तानी रुपये की गिरती क़ीमत और बढ़ती महंगाई के कारण आर्थिक दबाव बढ़ा है, जिससे सभी आय वर्गों के लोगों के जीवन स्तर पर विपरीत असर पड़ा है। विपक्षी आंदोलनों से मिली चुनौतियों ने सैन्य क्षमता की परीक्षा ली है जिसके माध्यम से वे पारंपरिक तरीकों से असहमति को नियंत्रित करती रही है। एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ के रूप में कार्यरत होने से पाकिस्तानी सेना को देश और विदेश दोनों जगह अपनी अपरिहार्यता को पुनः स्थापित करने का अवसर प्राप्त होता है। 

विदेश नीति संस्थापन के लिए उच्च-स्तरीय कूटनीति अधिक लाभान्वित करने वाली है। प्रमुख शक्तियों के साथ जुड़ाव से वित्तीय वार्ताओं में लाभ प्राप्त किया जा सकता है, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय ऋणदाताओं और भागीदारों के साथ चर्चा भी समिल्लित है। रणनीतिक महत्व की धारणा भी यह तय कर सकती है कि बाह्य पक्ष ऋण में राहत, सहायता और आर्थिक सहयोग के मामलों में कैसा रुख अपनाते हैं। बड़े राजनीतिक वर्ग हेतु, उच्च-स्तरीय कूटनीति में समिल्लित होने से उनकी क्षमता की ऐसी छवि उत्पन्न होती है जो देश के भीतर की त्रुटियों की भरपाई कर सकती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रियता अपनी सार्थकता और असरदार होने का साक्ष्य प्रदान कर सकती है, भले ही आर्थिक और शासन-व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियाँ बनी रहें। 

इन सब में समान सूत्र राष्ट्रीय रणनीति का नहीं, बल्कि आत्मरक्षा का है। बाह्य जुड़ाव से ऐसे संसाधन और राजनीतिक सुरक्षा की प्राप्ति होती है, जिन्हें केवल घरेलू कामकाज के माध्यम से प्राप्त करना कठिन होता है। यह काल्पनिक प्रतिरूप नहीं है: उदाहरण हेतु, जब 1971 में पाकिस्तान ने अमेरिका व चीन के बीच वार्तालाप प्रारम्भ करवाने में मध्यस्थता की, तो याह्या खान की सरकार ने उससे मिली राजनीतिक सुरक्षा का प्रयोग सेना को पूर्वी पाकिस्तान के मामले में अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही से बचाने के लिए किया। हाल ही में, 2008 और 2019 में आईएमएफ़ से मिला आर्थिक सहयोग ऐसे समय में आया जब क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर वॉशिंगटन और इस्लामाबाद के बीच सहयोग विकसित हो रहा था; परंतु जहाँ आम लोगों की सेवाओं में कटौती की गई, वहीं सेना का बजट सुरक्षित रहा और यहाँ तक कि उसमें बढ़ोतरी भी की गई। पाकिस्तान और उसके नागरिक-सैन्य संस्थानों हेतु, बाह्य अहमियत से मिलने वाले लाभों का प्रयोग ढांचागत सुधारों में निवेश करने के बजाय उन्हें टालने हेतु किया जाता है। 

पाकिस्तान की मध्यस्थता को एक अधिक सुसंगत एवं संरचनात्मक प्रक्रिया के रूप में बेहतर ढंग से समझा जा सकता है—एक ऐसी बारम्बार अपनाई जाने वाली रणनीति जिसके अंतर्गत राजनीतिक और सैन्य अभिजात वर्ग अपनी भू-राजनीतिक अहमियत को घरेलू स्तर पर अपनी सत्ता बनाए रखने के साधन में बदल लेते हैं।

संसाधनों की प्राप्ति के रूप में मध्यस्थता

यह तथ्य इस मसले को समझने में भी सहायक है कि मध्यस्थता के प्रयास विशेष अवसरों पर क्यों प्रारम्भ होते हैं। पाकिस्तान की राजनैतिक व्यवस्था लम्बी अवधि से सुरक्षा सहायता, अवसंरचना वित्तपोषण, प्रेषण और बहुपक्षीय समर्थन सहित बाह्य संसाधनों पर निर्भर रही है। ये संसाधन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भू-राजनीतिक स्थिति से जुड़े होते हैं। 

पाकिस्तान के कठिन दौर से तुलना करने पर यह तथ्य और साफ़ हो जाती है। 2018 और 2022 के बीच—जब वॉशिंगटन ने अफ़ग़ानिस्तान से निकास के उपरांत हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर अधिक ध्यान केंद्रित करने हेतु  दक्षिण एशिया को कम प्राथमिकता दी और चीन ने बुनियादी ढाँचे हेतु अनुदान में कमी कर दी—तब पाकिस्तान ने दुर्बल भू-राजनैतिक असर के बावजूद आईएमएफ के कार्यक्रमों का परस्पर संचालन किया। 2025 में पाकिस्तान की रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं में कोई परिवर्तन नहीं आया। बल्कि, बाह्य परिस्थिति ने एक ऐसे प्रस्ताव के लिए गुंजाइश बनाई जो पहले भी हो चुका था। असल में, 2019 में ही इमरान खान ने वॉशिंगटन और तेहरान के बीच मध्यस्थ बनने की चेष्टा की थी। उस कोशिश का कोई परिणाम नहीं निकला, इसलिए नहीं कि पाकिस्तान वह भूमिका नहीं निभाना चाहता था, बल्कि इसलिए कि दोनों में से कोई भी पक्ष उस समय तैयार नहीं था। इस तरह, मध्यस्थता कोई मौका देखकर किया गया अचानक निर्णय नहीं है, बल्कि एक ऐसी स्थायी रणनीति है जो बाह्य परिस्थिति अनुकूल होने पर सक्रिय हो जाती है।

हाल की कूटनीतिक गतिविधियाँ इस प्रतिरूप को प्रदर्शित करती है। वॉशिंगटन के साथ उच्च-स्तरीय संपर्क, तेहरान तक पहुँच एवं बीजिंग के साथ वार्तालाप —ये सभी पाकिस्तान के एक आवश्यक मध्यस्थ के तौर पर छवि को प्रबलता प्रदान करते हैं। हर वार्ता का प्रतीकात्मक और व्यावहारिक महत्व होता है। प्रतीकात्मक रूप से, यह संकेत देता है कि परिवर्तित हो रही भू-राजनीतिक परिस्थितियों में भी पाकिस्तान की महत्ता प्रबलित है। व्यावहारिक रूप से, यह बाह्य समर्थन जारी रखने के पक्ष को प्रबलता प्रदान करता है।

विदेश में शांति स्थापना करने के प्रयास देश के भीतर से राजनीतिक लाभ भी दिला सकते हैं। कूटनीतिक स्तर पर सक्रियता को असरदार नेतृत्व के साक्ष्य के तौर पर प्रस्तुत किया जा सकता है, भले ही देश के अंदर परिस्थिति विपरीत हो। असल में, जब ईरान युद्ध की वजह से ऊर्जा और यातायात की लागत बढ़ने से पाकिस्तान में महंगाई फिर से दहाई के अंक के क़रीब पहुँच गई, तब लोगों का विश्वास ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर के क़रीब हो सकता है और जनसंख्या का पाँचवाँ हिस्सा निर्धनता से जूझ सकता है, तब ऐसी परिस्थिति में विदेश नीति का प्रयोग घरेलू जनता को प्रभावित करने हेतु किया जा सकता है।

उदाहरण सहित प्रतिरूप 

1971 में पाकिस्तान द्वारा किए गए अब तक के सबसे बड़े ऐतिहासिक मध्यस्थता प्रयास के साथ ऐतिहासिक तुलना करना महत्वपूर्ण है, परंतु इसे सावधानीपूर्वक समझना चाहिए। अमेरिका-चीन संबंधों को सुधारने में पाकिस्तान की भूमिका ने उसे अल्पकालिक प्रतिष्ठा और रणनीतिक प्रभाव दिलाया, साथ ही 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर का अमेरिकी सहायता ऋण, विद्यमान हथियार प्रतिबंध में छूट और पूर्वी पाकिस्तान संकट के दौरान निरंतर अमेरिकी राजनीतिक समर्थन भी प्रदान किया। यह उस दौर के साथ भी मेल खाता था जब पूर्वी पाकिस्तान में की गई कार्यवाहियों को लेकर देश के सैन्य नेतृत्व पर बाहरी निगरानी सीमित थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसंगिकता प्राप्त करने से नागरिक-सैन्य व्यवस्था के समक्ष विद्यमान अंदरूनी राजनीतिक संकट हल नहीं हुए। बल्कि, इससे तत्कालीन पश्चिमी पाकिस्तान की सरकार के लिए नतीजों को कुछ समय के लिए टालने में सहायता ही मिली।

आज के मध्यस्थता के प्रयत्नों से भी इसी प्रकार के अल्पावधि हेतु लाभ मिल सकते हैं: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बढ़ना, बड़ी शक्तियों के साथ पुनः वार्तालाप प्रारम्भ करना एवं आर्थिक राहत मिलना, ये सभी संभावित परिणाम हैं। परंतु, जब तक  राजनीतिक बिखराव और नागरिक-सैन्य संबंधों में असंतुलन जैसी समस्याओं का निवारण नहीं होता, तब तक इन लाभों से उन गहरी समस्याओं का समाधान होने की अपेक्षा कम ही है, जिनकी वजह से ऐसी रणनीतियों का विस्तार होता है।

पाकिस्तान की निष्पक्षता को अत्यधिक रूप से आंकना या उसकी घरेलू विषमतायों को कम आंकना ग़लत अपेक्षाओं का कारण बन सकता है।

वॉशिंगटन के लिए निहितार्थ

बाह्य पक्ष पाकिस्तान की भूमिका को किस प्रकार से देखता है, इसका एक व्यापक प्रभाव भी है। वॉशिंगटन और दूसरी जगहों पर नीति निर्माताओं हेतु इस्लामाबाद को एक ऐसे निष्पक्ष मध्यस्थ के तौर पर देखना आकर्षक हो सकता है, जो विरोधी पक्षों के बीच वार्तालाप करा सके। परंतु, मध्यस्थता उन लोगों के लाभ से तय होती है, (जो इस प्रक्रिया में भाग लेते) हैं। पाकिस्तान के मामले में, ये लाभ सर्वस्व तीव्रता से विवाद सुलझाने के अनुकूल हो यह अनिवार्य नहीं है। आख़िरकार, लंबे समय तक अहम बने रहना भी विवाद के सफल समाधान जितना ही लाभपूर्ण हो सकता है। अगर भू-राजनीतिक महत्व संकटों के बने रहने से जुड़ा हो, तो उन संकटों की पूर्ण क्षति की प्रेरणा कम हो सकती है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि पाकिस्तान केवल अस्थिरता चाहता है—विशेषकर ईरान के साथ टकराव के मामले में उसकी मौजूदा कमज़ोरियों को देखते हुए, जिसमें घरेलू राजनीति, सांप्रदायिक तनाव, आंतरिक सुरक्षा और आर्थिक दबाव पहले से ही समिल्लित हैं—परंतु इससे यह प्रतीत होता है कि उसका जुड़ाव, कुछ हद तक, अपरिहार्य बने रहने की आवश्यकता से तय होता है।

इस तथ्य को समझना अनिवार्य है। पाकिस्तान की निष्पक्षता को अत्यधिक रूप से आंकना या उसकी घरेलू विषमतायों को कम आंकना ग़लत अपेक्षाओं का कारण बन सकता है। वार्तालाप अब भी उपयोगी सिद्ध हो सकती है, परंतु इसे असल परिस्थिति की साफ़ समझ के साथ ही आगे बढ़ाना चाहिए। पाकिस्तान दुश्मनों के बीच रास्ते खोल सकता है; उसने पहले भी ऐसा किया है और आगे भी कर सकता है। परंतु उसकी इस भूमिका में होने की वजह कूटनीतिक विशेषता से अधिक उसके राजनीतिक व्यवस्था  के अंदरूनी ढांचे में अंतर्निहित है। यदि बाह्य अहमियत घरेलू वैधता का स्थान ग्रहण करती है, तो मध्यस्थता देश के अंदर उत्तरजीविता की रणनीति के रूप में दृढ़मूल रहेगी और विदेश में शांति का पथ भी प्रशस्त करेगी।

यदि अमेरिका और ईरान के बीच वार्तालाप विफल हो जाता है, तो इतिहास से एक गंभीर सबक मिलेगा।1971 में, अमेरिका-चीन संबंधों की शुरुआत में पाकिस्तान की भूमिका से जो राजनीतिक समर्थन मिला था, वह उस घरेलू समझौते के टूटने के साथ ही समाप्त हो गया, जिसकी रक्षा हेतु उसका उत्थान किया गया था। आज, यदि मध्यस्थता विफल भी हो जाती है, तो भी पाकिस्तान को पहले से मिले लाभ ख़त्म नहीं होंगे। पाकिस्तानी सेना के नेतृत्व ने अपनी अंतरराष्ट्रीय सार्थकता सिद्ध कर दी है, और परिणाम चाहे जो भी हों, आईएमएफ़ के साथ वार्तालाप जारी रहेगा। अधिक संभावना इस बात की है कि स्थिति पुनः जटिल हो जाएगी: मोल-भाव की ताक़त कम हो जाएगी, ऋण देने वालों का दबाव फिर से बढ़ेगा, और राजनीतिक नेतृत्व को अपने घरेलू प्रभाव के माध्यम से पुनः वैधता प्राप्त करनी होगी, एक ऐसा कार्य जिसे करने में उसे पहले भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था।

क्या मौजूदा परिस्तिथियाँ वॉशिंगटन और तेहरान के बीच तनाव कम करने की दिशा में कोई सार्थक क़दम साबित होंगे, यह क़ाफ़ी हद तक उन राजधानियों में लिए जाने वाले निर्णयों पर निर्भर करेगा। इसीलिए, इस विशेष संकट से परे इस्लामाबाद मध्यस्थ के रूप में अपनी महतत्ता सिद्ध करता है। यह इस तथ्य का स्मरण करता है कि पाकिस्तानी अभिजात वर्ग के लिए उद्देश्य कभी भी ऐसे संकटों को हल करना नहीं रहा है जिनके कारण वे अपरिहार्य बने रहते हैं, बल्कि अभिजात वर्ग का उद्देश्य सदैव यह रहा है कि जब अगला संकट आए तो वे वहाँ प्रासंगिक रह सके ।

This article is a translation. Click here to read the original in English.

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Image 1: Prime Minister’s Office of Pakistan via X

Image 2: Prime Minister’s Office of Pakistan via X

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