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स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (एसआईपीआरआई) की वार्षिक रिपोर्ट-2026 से ज्ञात होता है कि भारत ने 2025 में अपने परमाणु शस्त्रागार का विस्तार 180 से बढ़ाकर 190 कर दिया है। परंतु, सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि भारत पहली बार शांति काल के दौरान कुछ की सक्रिय तैनाती कर सकता है। रिपोर्ट में “काफ़ी अनिश्चितता” का ज़िक्र करते हुए यह संकेत दिया गया है कि जनवरी 2026 तक भारत अपनी परमाणु-संचालित बैलिस्टिक प्रक्षेपास्त्र पनडुब्बियों (एसएसबीएन) में से किसी एक पर लगभग 12 परमाणु हथियार तैनात कर सकता है। अगर ऐसा है, तो यह तैनाती उस पुरानी धारणा को चुनौती देगी कि शांति काल में भारत अपने परमाणु हथियारों को परमाणु लॉन्चरों से विच्छेदित रखता है। साथ ही, इससे यह संकेत भी प्राप्त होता है कि भारत अपनी ऑपरेशनल परमाणु नीति – जिसके अंतर्गत असल संचालन क्षमताएँ, तैनाती और बल संरचना में परिवर्तन कर रहा है। जबकि उसकी घोषित परमाणु नीति – जिसमें परमाणु हथियारों के प्रयोग हेतु देश की तय शर्तें वैसी ही बनी हुई है। 

भले ही परमाणु हथियारों की यह तैनाती हाल की सुर्ख़ी हो, परंतु भारत के ऑपरेशनल परमाणु रुख में बहुआयामी परिवर्तन एक दशक से भी अधिक समय से चल रहा है। उभरती खबरे, भारत के प्रयासों को नया महत्त्व दे रहे है। भारत अपने परमाणु हथियारों के ज़ख़ीरे को आधुनिक बना रहा है, कैनिस्टर प्रक्षेपास्त्र  (ये पहले से ईंधन भरी और लॉन्च के लिए तैयार सीलबंद ट्यूब प्रणाली जो लॉन्च का समय घंटों से घटाकर मिनटों में करती है), नवीन प्रकार की परमाणु वितरण प्रणाली (जिनमें लंबी दूरी की और कई वॉरहेड वाले प्रक्षेपास्त्र सम्मिलित हैं), और समुद्र से परमाणु प्रहार को रोकने वाली गश्त भी मौजूद हैं। भारत के यह प्रयास एकतरफा  नहीं है।  एसआईपीआरआई  की रिपोर्ट में संभावना जाहिर की गई कि चीन ने भी 34 परमाणु वॉरहेड तैनात हो। साथ ही, चीन तीव्र प्रक्षेपास्त्र साइलो विनिर्माण और एसएसबीएनएस पर परमाणु हथियारों के साथ समुद्र में अपनी गश्त से प्रतिरोध को बढ़ा रहा है।

ये परिवर्तन निर्वात में नहीं उपजे हैं। ये उस आपस में जुड़ी  का प्रदर्शन हैं जिसमे  इस क्षेत्र की परमाणु शक्तियों के रिश्तों से क्षेत्र की रणनीतिक स्थिरता के लिए ख़तरा पैदा करती है। रणनीतिक श्रृंखला की अवधारणा यह दर्शाती है कि कैसे चीन की बढ़ती परमाणु क्षमताएँ जो अमेरिका केंद्रित है, परंतु  भारत के लिए जोखिम पैदा करती हैं। ये जोखिम भारत को परमाणु तैयारी मजबूत करने के लिए प्रेरित करते है, जिसकी वजह से   पाकिस्तान भी अपनी परमाणु क्षमताओं के  आधुनिकीकरण  के कदम उठाता है। यदि यह खबरे सच हैं, तो हालात इस क्षेत्र  में परमाणु कमान एवं नियंत्रण (एनसी2) प्रणाली के जानकारों की समझ को भी चुनौती दे रहे हैं। इसलिए, यह लेख एक नया सैद्धान्तिक  प्रतिमान सूझा रहा है, जिसे “सेगमेंटेड-डेलिगेटिव असर्टिव कंट्रोल सिस्टम” कहा जाता है। यह प्रतिमान बताता है कि कैसे देश बिगड़ते बाहरी हालातों के हिसाब से खुद को ढालने हेतु  स्थानीय स्तर पर लचीलापन अपनाते हैं। यह प्रतिमान एनसी 2 प्रणाली से जुड़ी बारीकियों को समझने की विद्वत्ता में अभिवृद्धि करेगा।

यदि यह खबरे सच हैं, तो हालात इस क्षेत्र  में परमाणु कमान एवं नियंत्रण (एनसी2) प्रणाली के जानकारों की समझ को भी चुनौती दे रहे हैं।

रणनीतिक चालक

भारत का शस्त्र अधिग्रहण और क्षमता विकास मुख्य रूप से चीन और पाकिस्तान से बढ़ते हुए परस्पर जुड़े खतरों से प्रेरित है। यह भारत के लिए प्रतिरोध और टकराव गतिशीलता को दोनों मोर्चो पर बढ़ा रहा है। ऑपरेशन सिंदूर ने इस समस्या की जटिलता को उजागर किया, जिसमें कथित तौर पर चीन ने मौके पर तकनीकी सहायता प्रदान की और अपने सदाबहार सहयोगी के साथ भारतीय संपत्तियों और तैनाती पर वास्तविक आंकड़े साझा किये। 

अकेले चीन के मामले में ही स्थिति ओर भी जटिल होती जा रही है। चीन न केवल पारंपरिक रूप से भारत से आगे है, बल्कि वह अपने परमाणु शस्त्रागार का तीव्रता से विस्तार भी कर रहा है। जनवरी 2026 तक, सुर्ख़ियों के अनुसार चीन के पास कुल 620 परमाणु हथियार हैं। इसका तात्पर्य यह है कि  पिछले वर्ष की तुलना में 20 हथियारों की वृद्धि हुई है और आने वाले वर्षों में वृद्धि जारी रहेगी। अमेरिकी रक्षा विभाग (डीओडी) ने चीन के ऑपरेशनल रुख में परिवर्तन दर्ज किया है। चीन ने साइलो में तेज़ी से लॉन्च होने वाली, ठोस ईंधन वाले प्रक्षेपास्त्र तैनात किए हैं और ‘लॉन्च-ऑन-वॉर्निंग‘ (एलओडबल्यू) क्षमता विकसित की है। यह एक ऐसी रणनीति है जिसके अंतर्गत दुश्मन के प्रक्षेपास्त्र के आने का पता चलते ही जवाबी परमाणु प्रहार किया जाता है, जबकि दुश्मन के प्रक्षेपास्त्र अभी अपने लक्ष्य तक पहुँचे भी नहीं होते। इसके अतिरिक्त, अमेरिकी रक्षा विभाग ने बताया है कि चीन परस्पर एसएसबीएनएस पर परमाणु हथियारों के साथ समुद्री गश्त करता रहता है और साथ ही “कॉम्बैट रेडीनेस ड्यूटी” और “हाई अलर्ट ड्यूटी” जैसी ड्रिल भी करता है। इस वजह से, चीन की लम्बी अवधि से चली आ रही ‘नो-फर्स्ट-यूज़’ (एनएफ़यू) नीति की विश्वसनीयता पर अमेरिका को अब अधिक शक होने लगा है।

चीन के इन बदलावों का उद्देश्य अमेरिका को रोकना है, परंतु इनसे भारत के लिए सुरक्षा दुविधा पैदा होती है। इसी वजह से, नई दिल्ली लंबी दूरी की और समुद्र से लॉन्च होने वाले प्रक्षेपास्त्र विकसित कर रही है, ताकि अपने परमाणु हथियारों की युद्ध के लिए तैयारी को बेहतर बनाया जा सके और चीन के विरुद्ध सेकंड-स्ट्राइक की क्षमता सुनिश्चित की जा सके। तथापि, भारत के यह कदम पाकिस्तान की नींद ख़राब कर रहे है, जिससे इस क्षेत्र की रणनीतिक श्रृंखला में गतिशीलता बढ़ रही है। 

दोनों मोर्चो से खतरे की आशंका के चलते, इस रणनीतिक श्रृंखला में  भारत का बदलता हुआ परमाणु ऑपरेशनल रुख़  उसके दोहरे लक्ष्यों की पूर्ति करता है। एक तरफ़ जहाँ यह मुख्य रूप से चीन की परमाणु क्षमताओं में हो रही बढ़ोतरी का मुक़ाबला करता है, वहीं यह भारत को परमाणु संकट के दौरान पाकिस्तान के साथ “जोखिम उठाने की होड़” में बने रहने की गारंटी देता है कि उसकी किसी प्रकार की आक्रामकता में भारत को युद्ध-तत्पर रखता है। तथापि जनवरी 2026 तक पाकिस्तान के परमाणु वॉरहेड की संख्या लगभग 170 पर स्थिर बनी हुई है, परंतु पाकिस्तान की उत्पादक पदार्थ जमा करने की सततता और नई परमाणु वितरण प्रणाली का विकास भारत के लिए चिंता का विषय है। जब केवल पारंपरिक युद्ध हो, तो सैन्य संतुलन भारत के पक्ष में होता है; इसलिए, पाकिस्तान ने ऐतिहासिक रूप से अधिक प्रबल प्रतिद्वंद्वियों को रोकने हेतु  परमाणु युद्ध के कगार तक जाने की रणनीति अपनाई है।

मई 2025 के संघर्ष में पाकिस्तान के भीतर तक किए गए पारंपरिक हमलों के साथ, भारत ने यह प्रदर्शित किया कि परमाणु शक्ति से लैस देशों के बीच ग़ैर-परमाणु युद्ध लड़ा जा सकता है। हालाँकि, चार दिनों के इस संघर्ष में अनजाने में परमाणु युद्ध के खतरों का संदेह बना रहा: रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत ने पाकिस्तानी हवाई और प्रक्षेपास्त्र अड्डों पर हमले किए, जहाँ पाकिस्तान के परमाणु हथियारों या उनके सहायक पुर्ज रखने की संभावना थी। इसके उपरांत पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ़ ने राष्ट्रीय कमान प्राधिकरण (एनसीए) की बैठक बुलाई, जो पाकिस्तान के परमाणु शस्त्रागार की निगरानी करने वाली संस्था है। यदि भविष्य में भारत-पाकिस्तान संकट तेज़ी से परमाणु युद्ध में बदलता है, तो भारत को यह आभास  हो गया  है कि वह अब अपनी विच्छेदित परमाणु नीति पर निर्भर नहीं रह सकता। भारत और चीन, और उसके बाद पाकिस्तान की बढ़ती परमाणु तैयारियों ने रणनीतिक श्रृंखला से जुड़े जोखिमों को दक्षिण एशिया में बढ़ा दिया है।

एक नई वास्तविकता? 

यह समझने के लिए कि परमाणु तत्परता  के बढ़ते स्तर की  यह श्रृंखला क्षेत्रीय स्थिरता के लिए इतना बड़ा खतरा क्यों है, यह देखना आवश्यक है कि ये देश अपने परमाणु हथियारों की तैनाती और उनके संभावित प्रयोग को कैसे शासित करते हैं। विपिन नारंग और स्कॉट डी. सागन की सम्पादन की हुई पुस्तक ‘द फ्रजाइल बैलेंस ऑफ़ टेरर: डेटरेंस इन द न्यू न्यूक्लियर एज’ के अपने अध्याय में, जाइल्स डेविड आर्सेनॉक्स और पीटर डी. फीवर ने एनसी 2 को तीन तरह का बताया है: अधिकार सौंपने वाला, शर्तों पर आधारित और सख्त नियंत्रण वाला।

अधिकार सौंपने वाले प्रकार में निचले स्तर के सैन्य ऑपरेटरों को परमाणु क्षमता के उपयोग को सौंपना शामिल है। उनके पास परमाणु युद्धक सामग्री और वितरण प्लेटफार्मों का भौतिक नियंत्रण होता है और वे उच्च अधिकारियों की अनुमति के बिना भी परमाणु हथियारों का उपयोग कर सकते हैं। इस प्रकार, अनचाहे परमाणु उपयोग का खतरा परस्पर बना रहता है।

सशर्त नियंत्रण प्रणालियाँ संकट के प्रारम्भिक  दौर में परमाणु हथियारों के प्रयोग की क्षमता प्रदान करती हैं, जबकि परमाणु उपयोग पर प्रशासनिक अधिकार केंद्रीकृत रखती हैं और परमाणु घटक भौतिक रूप से विकेंद्रीकृत होते हैं। हालाँकि, इस प्रकार के नियंत्रण में कई चुनौतियाँ हैं। संकट के प्रारम्भिक दौर में, परमाणु हथियारों का संयोजन शत्रु को दुर्भावनापूर्ण संकेत दे सकता है और अनजाने में तनाव बढ़ने की संभावना पैदा करता है। परमाणु उपयोग के अधिकार का यह स्वरूप  संकट के दौरान राजनीतिक नियंत्रण को भी दुर्बल करता है, जिससे तनाव कम करना जटिल हो जाता है। आर्सेनो और फीवर के अनुसार, पाकिस्तान एक सशर्त कमान प्रणाली का उपयोग करता है जो शांति काल में परमाणु उपयोग की निगरानी को केंद्रीकृत करता है, जबकि संकट के दौरान परमाणु उपयोग के अधिकार को तेजी से उपलब्ध  रखता है। वे बताते हैं कि पाकिस्तानी परमाणु अड्डे पर तकनीकी दल  संकट काल में परमाणु युद्धक लॉन्च करने के लिए आवश्यक अनुज्ञात्मक कार्रवाई लिंक (पीएएल) को भी दरकिनार कर सकती हैं। यह पाकिस्तान की परमाणु नीति के अनुरूप है, जो एनएफ़यू के सिद्धांत की कोई प्रतिज्ञा नहीं मानता है।  

अंततः, आक्रामक नियंत्रण प्रणालियाँ परमाणु उपयोग पर प्रशासनिक नियंत्रण को अत्यधिक केंद्रीकृत करती हैं और संकट के दौरान परमाणु निर्णयों पर राजनीतिक नियंत्रण सुनिश्चित करने के लिए अक्सर परमाणु हथियारों को विच्छेदित एवं भौतिक रूप से अलग-अलग स्थानों पर फैला कर रखती हैं। आर्सेनाक्स और फीवर, चीन एवं भारत को आक्रामक नियंत्रण प्रणालियों वाले देशों के रूप में वर्गीकृत करते हैं। चीनी राजनीतिक नेताओं ने ऐतिहासिक रूप से परमाणु बलों पर अत्यधिक आक्रामक नियंत्रण रखा है, जिसमें परमाणु युद्धक सामग्री को विच्छेदित रखना और भौगोलिक रूप से फैलाना शामिल है। इसी प्रकार, भारत ने भी ऐतिहासिक रूप से अपने परमाणु हथियारों को भी विच्छेदित एवं अलग-अलग स्थानों पर फैला कर रखा है।

तथापि चीन और भारत दोनों अपनी-अपनी एनएफ़यू नीतियों के प्रति प्रतिबद्ध हैं, परंतु पिछले कुछ वर्षों में चीन और हाल ही में भारत द्वारा किए गए बदलावों ने दक्षिण एशिया में एनसी2 प्रणालियों के इस वर्गीकरण को चुनौती दी है।

यह अधिक नवीन ढाँचा स्पष्ट करता है कि कोई देश किस प्रकार बिगड़ते बाह्य ख़तरों के माहौल में ऑपरेशनल अनुकूलन कर सकता है, जिससे परमाणु युद्ध के खतरों का  डर युद्ध तत्परता और विश्वसनीयता क़ायम रखें, और साथ ही विशुद्ध रूप से अधिकार सौंपने के अस्थिरता के जोखिमों को रोक सके।

“सेगमेंटेड” लचीलेपन की खोज

यदि भारत और चीन में वास्तव में ही रणनीतिक श्रृंखला के शिकार  हैं, तो उनके कदम आर्सेनेक्स-फीवर के एनसी2 प्रतिमानों की सीमाओं को उजागर कर रहे हैं। इसके बजाय, यह लेख विशुद्ध रूप से सख्त नियंत्रण एवं  अधिकार सौंपने वाले प्रकारों के बीच एक संक्रमणकालीन चरण के रूप में एक “सेगमेंटेड-डेलिगेटिव असर्टिव कंट्रोल सिस्टम” प्रस्तावित करता है। यह प्रतिमान दर्शाता है कि यद्यपि राज्य सैद्धांतिक और राजनीतिक दृष्टि से परमाणु उपयोग पर अत्यधिक सख्त नियंत्रण रखते हुए , वे अपनी रणनीतिक सेनाओं के कुछ खंडों को शत्रु द्वारा घातक हमले के प्रयास की स्थिति में अर्ध-प्रतिनिधित्वित अधिकार या परमाणु हथियार दागने की भौतिक क्षमता देकर स्थानीय लचीलापन लाते हैं।

यह अधिक नवीन ढाँचा स्पष्ट करता है कि कोई देश किस प्रकार बिगड़ते बाह्य ख़तरों के माहौल में ऑपरेशनल अनुकूलन कर सकता है, जिससे परमाणु युद्ध के खतरों का  डर युद्ध तत्परता और विश्वसनीयता क़ायम रखें, और साथ ही विशुद्ध रूप से अधिकार सौंपने के अस्थिरता के जोखिमों को रोक सके। यह वर्गीकरण चीन की विकसित हो रही एलओडबल्यू  (लॉच-ऑन-वार्निंग) क्षमता और भारत की “सभी परिस्थितियों में जवाबी परमाणु प्रहारों हेतु वैकल्पिक कमान श्रृंखलाओं की व्यवस्था” और “आवश्यक लचीलेपन और जवाबदेही” के साथ एक “प्रभावी और टिकाऊ” एनसी2 की आकांक्षा के अनुरूप है।

उदाहरण के लिए, किसी शत्रु द्वारा पहले परमाणु हमले की स्थिति में, परमाणु हथियारों से लैस एसएसबीएन के पास परमाणु हथियार दागने के लिए पूर्व-निर्धारित अधिकार या ऐसी भौतिक क्षमता होनी चाहिए। चीन द्वारा “प्रारंभिक चेतावनी प्रति-प्रहार” क्षमता विकसित करने हेतु, उसे एक विश्वसनीय ख़तरे के रूप में देखे जाने के लिए निचले स्तर के सैन्य अधिकारियों को कुछ अधिकार पहले ही सौंपने होंगे। फिर भी, चीन और भारत दोनों पीएएल के माध्यम से राजनीतिक वर्ग की सर्वसत्ता क़ायम रख सकते हैं। विशुद्ध रूप से अधिकार सौंपने की नियंत्रण प्रणाली, जहाँ निचले स्तर के अधिकारी परमाणु हथियार दाग सकते हैं के इत्तर, इन अर्ध-अधिकार वाली इकाइयों को संभावित परमाणु प्रक्षेपण के लिए राजनीतिक अनुज्ञा की आवश्यकता हो सकती है।

इस सिद्धांत के साथ दो शर्तें जुड़ी हैं। पहली बात तो यह है कि यह सिद्धांत काफ़ी हद तक क्षेत्र में चल रहे घटनाक्रमों पर आधारित है; यदि भारत और चीन शांति काल में अपने सभी युद्धक हथियारों को तैनात कर देते हैं, तो उनकी एनसी2 प्रणालियों को तकनीकी रूप से अधिकार सौंपने वाली  प्रणाली के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा। दूसरा तथ्य यह है कि रणनीतिक श्रृंखला में उत्पन्न होने वाले दबाव सदैव एक जैसे परिणाम वाले नहीं होंगे।

अनिश्चित संतुलन

देशों को सदैव अपने परमाणु शस्त्रागार की तत्परता और विश्वसनीयता बढ़ाने और अनजाने में होने वाले तनाव को रोकने के बीच एक अनिश्चित संतुलन बनाए रखना पड़ता है। अपने शस्त्रागार की युद्ध-तत्परता बढ़ाने का प्रयास करने वाले देश अपने विरोधियों को भी इसी प्रकार के प्रयास करने हेतु प्रोत्साहित कर सकते हैं। इससे संकट की स्थिति में विरोधी को ओर भी अस्थिरता का संकेत मिल सकता है।

तथापि भारत अपनी विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता को प्रबल करने का लक्ष्य रखता है, परंतु वह चीन के साथ पारंपरिक झड़पों में परमाणु प्रतिरोधक क्षमता से बचाव पर निर्भर नहीं रह सकता, जैसा कि 2017 में डोकलाम में 73 दिनों तक चले सैन्य गतिरोध और 2020 में गलवान घाटी में हुए घातक संघर्षों से स्पष्ट होता है। भारत अपनी सैद्धांतिक स्थिति और परमाणु स्तर की स्थिरता दोनों के कारण भूभाग के नुक़सान के बदले परमाणु हथियारों का प्रयोग  नहीं कर सकता। दूसरी ओर, अत्यधिक तत्पर परमाणु प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने से नई दिल्ली को इस्लामाबाद को रोकने में सहायता प्राप्त हो सकती है, जिससे यह संकेत मिलता है कि भारत की पारंपरिक क्षमता इस्लामाबाद के किसी भी परमाणु खतरे से पूरी तरह बेअसर नहीं होगी।

हालाँकि, इस प्रकार के परमाणु खतरों की विश्वसनीयता बढ़ाने से रणनीतिक श्रृंखला में अनजाने में तनाव बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है। चीन और भारत दोनों ही स्थानीय स्तर पर लचीलापन अपना रहे हैं, जिससे अनजाने में तनाव में वृद्धि का जोखिम भी विकसित हो रहा है। उदाहरण हेतु, पाकिस्तान पर शांति काल में अपने परमाणु हथियारों के उपयोग का अधिकार  सौंपने का दबाव पड़ सकता है, जिससे उसके कमान एवं नियंत्रण का विकेंद्रीकरण तथा सतर्कता का स्तर बढ़ जाएगा। साथ ही, किसी भी संभावित दुर्बलता को रोकने हेतु उसकी समुद्री क्षमताओं में वृद्धि होगी।

इन खतरों को कम करने हेतु, दक्षिण एशियाई परमाणु शक्तियों को आपसी विश्वास निर्माण उपायों  (सीबीएमएस) को प्राथमिकता देनी चाहिए, विद्यमान द्विपक्षीय समझौतों का दायरा बढ़ाकर उनमें नए सैन्य क्षेत्रों को समिल्लित करना चाहिए और पारदर्शिता पर वार्तालाप को बढ़ावा देना चाहिए। पारंपरिक सीबीएमएस का दायरा बढ़ाकर उनमें प्रक्षेपास्त्रों के उड़ान परीक्षण, खासकर समुद्र से लॉन्च होने वाले  प्रक्षेपास्त्रों की पूर्व सूचना देने की व्यवस्था समिल्लित की जानी चाहिए। देशों के बीच संकट के समय बातचीत के लिए खास हॉटलाइन बनाना प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके अलावा, मौजूदा समझौतों में बदलाव करके नए क्षेत्रों—जैसे साइबर, अंतरिक्ष, अगली पीढ़ी के प्रक्षेपास्त्र एवं स्वशासी प्रणाली में व्यवहारिक नियम तय करने या उन पर सहमति बनाने की आवश्यकता है, क्योंकि इन क्षेत्रों में पारंपरिक और परमाणु हथियारों के गठजोड़ का खतरा सबसे अधिक हो सकता है। आखिर में, ग़लतफ़हमी और अनजाने में तनाव वृद्धि को रोकने के लिए सेनाओं के बीच नियमित बातचीत के माध्यम पारदर्शिता पर चर्चा को अहमियत देना अत्यंत आवश्यक होगा।

This article is a translation. Click here to read the original in English.

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Image 1: Indian Ministry of Defense via Wikimedia

Image 2: Acroterion via Wikimedia

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