Natanz_nuclear

ईरान की नतान्ज़ यूरेनियम संवर्धन सुविधा पर हुए अमेरिका-इज़रायल के प्रहार और डिमोना के समीप इज़रायल की अपनी परमाणु संवर्धन सुविधा को निशाना साधकर किए गए ईरानी हमले, वैश्विक परमाणु राजनीति में एक तीव्र और ख़तरनाक बदलाव को प्रदर्शित करते हैं: संघर्ष के दौरान प्रभावशाली बुनियादी ढांचे पर प्रहार न करने के अंतरराष्ट्रीय मानदंडों/क़ायदाओं के क्षरण को भी दिखाते हैं।  जून 2025 के युद्ध और विद्यमान संघर्ष, दोनों में ही, अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के परमाणु बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया है—जिसमें नतान्ज़, इस्फ़हान परमाणु प्रौद्योगिकी/अनुसंधान केंद्र और बुशेहर समिल्ललित हैं। नतान्ज़ पर मार्च 2026 में हुए हमले के जवाबी कार्यवाही में, ईरान ने भी दक्षिणी इज़राइल में स्थित शिमोन पेरेस नेगेव परमाणु अनुसंधान केंद्र को निशाना बनाया, और उस स्थल से 8 मील की दूरी पर हमला किया। शुक्र है कि हाल के इन दोनों हमलों में न तो कोई हताहत हुआ और न ही किसी प्रकार के रेडियोधर्मी पदार्थ का रिसाव हुआ।

तथापि इन प्रारम्भिक प्रहारों को ‘निवारक आत्मरक्षा’ या ‘प्रसार-रोधी अभियान’ के हिस्से के तौर पर सही ठहराया गया है, यद्यपि ये प्रहार किसी संघर्ष के समय परमाणु प्रतिष्ठानों और बुनियादी ढांचे को उचित लक्ष्य मानने की एक मिसाल क़ायम कर सकते हैं। विभिन्न संकटों के दौरान इन हमलों का बारम्बार होना इस तथ्य का संकेत है कि परमाणु बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की सीमा का धीरे-धीरे क्षरण हो रहा है; जिससे भविष्य के संघर्षों में ऐसी कार्यवाहियों के पथ में आने वाली रणनीतिक और राजनीतिक अंकुश की सीमाएँ सिकुड़ रही हैं।

यह घटनाक्रम, दक्षिण एशिया सहित उन अन्य क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से चिंताजनक हैं जहाँ परमाणु टकराव का ख़तरा बना हुआ है। दक्षिण एशिया में परमाणु निवारण की स्थिति पहले से ही नाज़ुक है; इसका कारण है—भौगोलिक निकटता, पप्रक्षेपास्त्रों के उड़ान का कम समय, आपसी अविश्वास एवं संभावित सैद्धांतिक बदलाव।  यदि परमाणु संयम निरपेक्षित  होने के बजाय शर्तों पर आधारित’ हो जाते हैं, तो भारत और पाकिस्तान के मध्य में अगला संकट तब गहरा सकता है, जब दोनों देशों में से कोई एक पक्ष दूसरे के परमाणु ढाँचे पर हमलों को नए असुरक्षित लक्ष्य समझने लगे।

ईरान युद्ध से एक व्यापक परिपाटी तक: मानदंडों के क्षरण का मार्ग

अमेरिका-इज़राइल-ईरान युद्ध में परमाणु बुनियादी ढांचे पर निशाना साधने वाले हालिया हमले, इस तरह के हमले का एकमात्र उदाहरण नहीं हैं। इस प्रकार की सबसे कुख्यात घटना 2022 में हुई थी, जब ज़ापोरिज़िया परमाणु ऊर्जा संयंत्र सीधे रूसी सेना की गोलाबारी का शिकार हुआ था और रूसी सेना ने इस संयंत्र पर कब्ज़ा कर लिया था। यूरोप के सबसे बड़े ऐसे संयंत्र, ज़ापोरिज़िया पर कब्ज़ा, सक्रिय अंतर-राज्यीय संघर्ष के दौरान किसी विरोधी द्वारा सक्रिय परमाणु सुविधा पर कब्ज़ा करने की पहली घटना थी; जिसके चलते आईएईए ने परमाणु ख्याल एवं सुरक्षा जोखिमों के बारे में गंभीर चेतावनियाँ जारी कीं, और संघर्षों के दौरान परमाणु सुविधाओं के आसपास सुरक्षा-संरक्षण क्षेत्र स्थापित करने हेतु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर निवेदन किए। जब इन घटनाओं पर, ईरान के परमाणु ठिकानों के विरुद्ध अमेरिका और इज़रायल पर लगाए गए पिछले साइबर और तोड़फोड़ के कथित ऑपरेशनों के साथ-साथ विचार किया जाता है, तो ये सभी मिलकर एक ऐसी मिसाल क़ायम कर सकते हैं जो परमाणु इकाईंयों को निशाना बनाने की कार्यवाही को सामान्य बना देते हैं। 

यह मिसाल कुछ हद तक अंतरराष्ट्रीय क़ानून की पाबंदियों और रणनीतिक लक्ष्यों के बीच की खाई की वजह से सम्भव हो पाईं हैं। जहाँ एक ओर, अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि आम लोगों के बुनियादी ढांचे पर प्रहारों पर रोक लगाता है, परंतु, दूसरी ओर, परमाणु ठिकानों को प्रहारों का निशाना बनाने पर पूरी तरह से रोक नहीं लगाता। देश ऐसी जगहों के विरुद्ध बल प्रयोग को सही ठहरा सकते हैं, यदि उनके कार्यों से मिलने वाला संभावित सैन्य लाभ आम लोगों को होने वाले नुक़सान से अधिक हो। ऐसे निर्णय आम तौर पर किसी विशेष देश की अपनी व्याख्या पर निर्भर करते हैं।असल में, यह अस्पष्टता देशों को अपने रणनीतिक लक्ष्यों के हिसाब से विधिवत सीमाओं की चुनिंदा व्याख्या करने की छूट देती हैं। इसी तरह, जिनेवा ढांचा (जिनेवा संवहन/कन्वेंशन के मूल लिपि I का अनुच्छेद 56 मूल संधि के प्रोटोकॉल I के अनुच्छेद 56 और मूल लिपि I का अनुच्छेद 15 अनुच्छेद 15 दायरे में सीमित और प्रकृति में शर्तिया है, विशेषकर इसलिए क्योंकि अमेरिका, इज़राइल, भारत, पाकिस्तान और ईरान ने अभी तक इसे अपनाया नहीं है।

आईएईए के सामान्य कॉन्फ़्रेंस के कई प्रस्ताव (1983, 1984, 1985, 2009) भी हैं जो शांतिपूर्ण परमाणु सुविधाओं पर हमलों पर रोक लगाते हैं, लेकिन ये फ्रेमवर्क केवल परमाणु ऊर्जा संयंत्रों पर केंद्रित हैं। हालाँकि, परमाणु सामग्री के भौतिक संरक्षण पर कन्वेंशन (सीपीपीएनएम/ए) में किया गया संशोधन, देशों को विधिवत रूप से इस तथ्य के लिए बाध्य करता है कि वे नागरिक घरेलू प्रयोग के लिए परमाणु सामग्री और सुविधाओं के उपयोग, भंडारण और परिवहन के दौरान उनकी सुरक्षा करें। इनमें ईंधन निर्माण संयंत्र, अनुसंधान रिएक्टर, और खर्च हो चुके ईंधन के पूल तथा यूरेनियम संवर्धन सुविधाएँ शामिल हैं। सीपीपीएनएम/ए हमलों पर रोक लगाने के बजाय भौतिक सुरक्षा पर अधिक केंद्रित है, जिससे एक प्रभावशाली कमी रह जाती है। परंतु जहाँ भारत, पाकिस्तान और संयुक्त राज्य अमेरिका सीपीपीएनएम/ए के पक्षधर हैं, वहीं ईरान और इज़राइल इसके विपक्षी हैं।

इसके अतिरिक्त, ईरान के परमाणु बुनियादी ढांचे के विरुद्ध बल प्रयोग को, सैद्धांतिक रूप से, एक वैध ‘प्रसार-रोधी’ या निवारक रणनीति के तौर पर बताया गया है। इस प्रकार के तर्क से न केवल ‘परमाणु अप्रसार संधि’ (एनपीटी) की वैधता को, बल्कि आईएईए की वैधता के भी दुर्बल होने का खतरा है; क्योंकि इससे यह मिसाल क़ायम होती है कि परमाणु प्रसार संबंधी चिंताओं को दूर करने के लिए कूटनीति और संधि-आधारित तंत्रों के बजाय सैन्य अभियान भी एक वैध विकल्प हो सकते हैं। आखिरकार, ईरान अभी भी एनपीटी पर हस्ताक्षर करने वाला एक सदस्य देश है। 2025 के हमलों के उपरांत ईरान ने पहले ही अपनी परमाणु सुविधाओं तक पहुँच को सीमित कर दिया था; इस तरह के और हमले ईरान को परमाणु हथियार बनाने के लिए यूरेनियम संवर्धन के पथ पर धकेल सकते हैं, और साथ ही संभवतः एनपीटी से निकास हेतु प्रेरित कर सकते हैं।

“विभिन्न संकटों के दौरान इन हमलों का बारम्बार होना इस तथ्य का संकेत है कि परमाणु बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की सीमा का धीरे-धीरे क्षरण हो रहा है; जिससे भविष्य के संघर्षों में ऐसी कार्यवाहियों के पथ में आने वाली रणनीतिक और राजनीतिक अंकुश की सीमाएँ सिकुड़ रही हैं।”

दक्षिण एशिया हेतु निहितार्थ

पश्चिम एशिया में ये घटनाक्रम भारत और पाकिस्तान के बीच पहले से ही नाज़ुक प्रतिरोध संबंधों पर ओर अधिक दबाव डाल सकते हैं। दोनों देशों ने परमाणु सुरक्षा कवच के तहत चार युद्ध लड़े हैं और मई 2025 के जटिल संकट सहित कई पारंपरिक संकटों का सामना किया है। यह जटिलता दुष्प्रचार अभियानों, साइबर अभियानों और तीव्र पारंपरिक संकेत देने के एक साथ उपयोग से उत्पन्न हुई, जिनमें से प्रत्येक ने निर्णय लेने की समयसीमा को कम कर दिया और अनिश्चितता को बढ़ा दिया। ऐसे तनावपूर्ण माहौल में, लक्ष्यीकरण रणनीति में बदलाव के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

इस इतिहास के कारण, यह बात महत्त्वपूर्ण है कि दक्षिण एशिया के पास पहले से ही परमाणु प्रतिष्ठानों और सुविधाओं पर हमलों की रोकथाम के समझौते (एनएए) के रूप में एक परमाणु विश्वास-निर्माण उपाय (सीबीएम) मौजूद है। इस समझौते के तहत, भारत और पाकिस्तान दोनों ही तीन दशकों से भी अधिक समय से परमाणु प्रतिष्ठानों की सूचियों का आदान-प्रदान करते आ रहे हैं। तनाव के ख़तरनाक दौर में भी इसका परस्पर लागू रहना, एक सीबीएम के तौर पर इसकी मज़बूती को दर्शाता है; ऐसे में इसमें किसी भी संभावित क्षरणता आना बेहद चिंताजनक और गंभीर नतीजों वाला हो सकता है। एनएए, परमाणु सुविधाओं और बुनियादी ढाँचे को निशाना बनाने से जुड़े जोखिमों के बारे में दोनों पक्षों की साझा समझ को प्रदर्शित करता है। यह समझ 1980 के दशक के एक ऐतिहासिक दौर में अवतरित हुई थी, जब पाकिस्तान और भारत दोनों को ही यह प्रतीत हुआ था कि उनके परमाणु प्रतिष्ठानों पर संभावित हमले हो सकते हैं और वे ऐसे हमलों के प्रति असुरक्षित हैं। दरअसल, 1970 और 1980 के दशकों में, भारत ने इज़रायल के साथ मिलकर कथित तौर पर पाकिस्तान के कहूटा स्थित संवर्धन केंद्र को निशाना बनाने की आपातकालीन योजनाओं पर विचार किया था। अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते इन योजनाओं को अंजाम नहीं दिया गया।  बताया जाता है कि सीआईए ने राष्ट्रपति जनरल ज़िया-उल-हक़ को इसकी जानकारी दे दी थी, और अमेरिका ने भारत को चेतावनी दी थी कि “अगर भारत अपनी ज़िद पर अड़ा रहा, तो अमेरिका भी जवाबी कार्यवाही करेगा।” वहीं दूसरी ओर, भारत को इस बात का डर था कि पाकिस्तान के लड़ाकू विमान—ख़ास तौर पर अमेरिका से मिले एफ़-16 विमान, भारत के परमाणु बुनियादी ढाँचे या रणनीतिक ठिकानों पर हमला करने के लिए प्रयोग किए जा सकते हैं। 

हालाँकि, यह संभव है कि अगले संकट के दौरान इस समझौते पर दबाव पड़ सकता है। दोहरे उपयोग वाली अस्पष्टताएँ, बदलते लक्ष्यीकरण सिद्धांत, और सटीक तथा ग़ैर-गतिज क्षमताओं पर बढ़ता भरोसा दक्षिण एशिया में पहले से वर्जित लक्ष्यों की समीक्षा को बढ़ावा दे सकते हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच आखिरी रणनीतिक वार्ता 2011 में हुई थी, और भारत-पाकिस्तान वार्ता का व्यापक रूप से बंद होना जोखिम कम करने और संघर्ष समाधान के रास्तों को और भी सीमित करता है। ऐसे संकेत भी मिल रहे हैं कि भविष्य में दक्षिण एशियाई संकटों के दौरान प्रभावशाली बुनियादी ढाँचे को तीव्रता से, उचित लक्ष्यों के रूप में देखा जा सकता है। उदाहरण हेतु, मई 2025 के संघर्ष के दौरान, पाकिस्तान ने भारत पर अपने नीलम-झेलम जलविद्युत परियोजना पर  का आरोप लगाया था, जिसे भारत ने नकार दिया था।

पाकिस्तान और भारत अपनी-अपनी परमाणु सुविधाओं को भिन्न-भिन्न श्रेणियों में रखते हैं, जिससे ऐसी बुनियादी सुविधाओं को लक्ष्यक्रित करने के मामले में अनिश्चितता में वृद्धि हो सकती है। पाकिस्तान अपने नागरिक परमाणु रिएक्टरों को अपनी सैन्य परमाणु सुविधाओं से भिन्न रखता है, और नागरिक रिएक्टर आईएईए की सुरक्षा निगरानी के अंतर्गत आते हैं। दूसरी ओर, भारत के पास ऐसी नागरिक सुविधाएँ भी हैं जो आईएईए की सुरक्षा निगरानी के दायरे में नहीं आतीं; इनमें उसके भारी जल उत्पादन संयंत्र और फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर समिल्लित हैं। ऐसी सुविधाओं को दोहरे उपयोग वाली बुनियादी सुविधाएँ माना जा सकता है, क्योंकि ये नागरिक और वाणिज्यिक सुविधाएँ हथियार बनाने लायक सामग्री तैयार करने में सक्षम हो सकती हैं। इस प्रकार, हालाँकि पाकिस्तान और भारत एनएए (परमाणु प्रतिष्ठान समझौते) के अंतर्गत अपने परमाणु प्रतिष्ठानों की सूचियों का आदान-प्रदान करते हैं, फिर भी इस तथ्य को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है कि परमाणु सुविधाओं को किस श्रेणी में रखा जाए और किसी संघर्ष की स्थिति में उन्हें किस दृष्टिकोण से देखा जाए।

इसके अतिरिक्त, क्षेत्रीय और वैश्विक भू-रणनीतिक परिदृश्य में विद्यमान रुझान दक्षिण एशियाई देशों को अपने संभावित लक्ष्यों की सीमा का विस्तार करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। उभरती हुई विघटनकारी प्रौद्योगिकियों (ईडीटी) का विकास—जिसमें गुप्त जानकारी, निगरानी और टोही (सटीक हमले की क्षमताएँ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), और साइबर युद्ध जिसमें कमान, नियंत्रण और संचार प्रणालियों [एनसी3] के विरुद्ध संभावित साइबर प्रहार में हुई प्रगति समिल्लित है—इस तथ्य को नवीन रूप दे रहे हैं कि परमाणु हथियार निहित देश परमाणु असुरक्षा को किस दृष्टि से देखते हैं। ईडीटी देशों की उन संपत्तियों पर नज़र बनाए रखने, उनका पता लगाने और उन्हें निशाना बनाने की क्षमता को बढ़ाते हैं जो पहले गुप्त थीं,  इनमें परमाणु बुनियादी ढांचे के तत्व और मोबाइल वितरण प्रणाली भी शामिल हैं। इससे उन्नत दुश्मन की सैन्य शक्ति को नष्ट करने की संभावना के बारे में एक धारणा उजागर हो सकती है, जिससे निर्णय लेने वाले लोगों को यह विश्वास हो सकता है कि किसी विरोधी देश की परमाणु संपत्तियों के विरुद्ध चुनिंदा या पहले से किए गए प्रहार परिचालन की दृष्टि से संभव हैं। इसके अतिरिक्त, ईडीटी पारंपरिक और परमाणु प्रणालियों के बीच की सीमा को धुंधला कर सकते हैं, जिससे संकट के समय बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की प्रेरणा में विस्तार हो सकता है। एआई-सहायता प्राप्त लक्ष्यीकरण प्रणालियों जैसे उपकरणों में विद्यमान होने के बावजूद, ईडीटी श्रेष्ठता की एक झूठी भावना उत्पन्न करने में योगदान दे सकते हैं, जो रणनीतिक निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं, विशेष रूप से किसी संघर्ष के प्रारम्भिक दौर में।

मई 2025 के संकट ने यह भी दर्शाया कि किस प्रकार से धारणाएँ तनाव को बढ़ा सकती हैं। उदाहरण हेतु, उस समय सोशल मीडिया पर यह बिना पुष्टि वाली ग़लत जानकारी फैली थी कि भारत ने किराना हिल्स के पास पाकिस्तान के एक परमाणु भंडारण स्थल पर निशाना साधा था, परंतु बाद में भारत सरकार ने इस बात का खंडन किया, जिससे पहले से ही विवादित सूचना क्षेत्र में स्थिति और भी अधिक उलझ गई। साइबर प्रहारों के मामले में हमलावर की पहचान करने की चुनौतियाँ दक्षिण एशिया के भू-रणनीतिक परिदृश्य में जटिलता बढ़ाती हैं। ऐसे माहौल में जहाँ वार्तालाप सीमित है और तनाव के चरम पलों में विद्यमान हॉटलाइन का हमेशा प्रयोग नहीं किया जाता, वहाँ बिना पुष्टि वाले आरोप या एक-दूसरे के विपरीत चलने वाली कहानियाँ तनाव को भड़काने का कार्य कर सकती हैं।

“जहाँ एक ओर परमाणु हमले नहीं करने का समझौता पिछली मुश्किलों के बावजूद क़ायम रहा है, वहीं अब इसे और विस्तारित करने की आवश्यकता है ताकि ईडीटी, ग़लत जानकारी, दोहरे प्रयोग वाले ढाँचे और भारत और पाकिस्तान के बीच हॉटलाइन के अपर्याप्त प्रयोग से पैदा होने वाली चुनौतियों से निपटा जा सके।”

दक्षिण एशिया में जोखिम न्यूनीकरण की पुनर्विलोकन

परमाणु ठिकानों पर प्रहार करने का जोखिम अब केवल काल्पनिक स्थितियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह असल दुनिया की युद्ध-योजना का भाग बन गया है। ईरान में हो रहे घटनाक्रम कोई अलग-थलग मामले नहीं हैं, बल्कि ये एक बड़े परिवर्तन का हिस्सा हैं। इस परिवर्तन से यह धारणा बदल सकती है कि देश परमाणु बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की कार्यवाही को कितना सही मानते हैं। ईरान के संदर्भ में इस प्रकार की सैन्य कार्यवाहियों का सामान्य हो जाना, इस तथ्य की गंभीरता को दर्शाता है कि दक्षिण एशिया में भी ऐसी ही स्थितियाँ उत्पन्न होने से पूर्व, संयम बनाए रखने के प्रयासों को प्रबल करना कितना आवश्यक है। इसलिए, दक्षिण एशिया को अपनी विद्यमान जोखिम-न्यूनीकरण ढांचों की समीक्षा करनी चाहिए और उनके अद्यतन की ओर कार्यबद्ध होना चाहिए।

उदाहरण हेतु, जहाँ एक ओर परमाणु हमले नहीं करने का समझौता पिछली मुश्किलों के बावजूद क़ायम रहा है, वहीं अब इसे और विस्तारित करने की आवश्यकता है ताकि ईडीटी, ग़लत जानकारी, दोहरे प्रयोग वाले ढाँचे और भारत और पाकिस्तान के बीच हॉटलाइन के अपर्याप्त प्रयोग से पैदा होने वाली चुनौतियों से निपटा जा सके। एक तरीका यह हो सकता है कि समझौते के दायरे को बढ़ाया जाए ताकि इसमें न केवल उभरते हुए ग़ैर-काइनेटिक ख़तरों—जिनमें साइबर संचालन और एनसी-2 प्रणाली को निशाना बनाना शामिल है, ना केवल इसे स्पष्टता प्रदान करे, बल्कि दोहरे प्रयोग वाली परमाणु सुविधाओं को भी शामिल करे। इसके अलावा, ग़लतफ़हमियों और अनजाने में होने वाले तनाव को रोकने के लिए, संकट के समय बातचीत के तंत्र की जाँच, विश्वसनीयता और नियमित प्रयोग सुनिश्चित करने पर अधिक ज़ोर दिया जाना चाहिए। ऐसे सम्बन्धों में, जो अविश्वास और कूटनीतिक गतिरोध से घिरे हों, वहाँ भरोसेमंद संकट-संचार तंत्र को मज़बूत करना भी मुश्किल प्रतीत हो सकता है; लेकिन क्षेत्रीय विश्वास-निर्माण (सीबीएमएस) उपाय और वार्तालाप, ऐसे मामलों में आम सहमति बनाने में सहायता कर सकते हैं जब औपचारिक कूटनीति सीमित हो।

परमाणु सुविधाओं के लिए क़ानूनी और मानक सुरक्षा उपायों को प्रबल करने के प्रयासों को वैश्विक स्तर पर भी फिर से सक्रिय किया जाना चाहिए। यह क्षेत्रीय और बहुपक्षीय माध्यमों से ठोस प्रयासों से किया जा सकता है, जिसमें एनपीटी समीक्षा प्रक्रिया, यूएन निरस्त्रीकरण मंच और आईएईए सामान्य सम्मेलन समिल्लित हैं। वैश्विक स्तर पर, इसमें विद्यमान मानक ढांचों का विस्तार शामिल होना चाहिए ताकि परमाणु बुनियादी ढांचे की सभी श्रेणियों को शामिल किया जा सके, जिस में ना केवल एनपीपी को बल्कि उन कानूनी अस्पष्टताओं को कम किया जा सके जो सुरक्षा सीमाओं की लचीली व्याख्या की अनुमति देती हैं। क्षेत्रीय स्तरों, विशेष रूप से दक्षिण एशिया में और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ट्रैक 1.5 और ट्रैक 2 वार्ताएँ, ऐसी प्रतिबद्धताओं को लागू करके मानदंडों को मज़बूत कर सकती हैं।

जैसा कि आईएईए के महानिदेशक ने तर्क दिया है, “परमाणु सुविधाओं पर कभी भी प्रहार नहीं किया जाना चाहिए, चाहे संदर्भ या परिस्थिथियाँ कुछ भी हों।” ऐसे उपायों के अभाव में, परमाणु बुनियादी ढांचे पर हमलों का सामान्यीकरण रणनीतिक व्यवहार में जड़ें जमा सकता है, जिस कारण संकट स्थिरता के लिए संभावित रूप से अपूरणीय परिणाम हो सकते हैं। स्पष्ट और लागू करने योग्य ढांचों के अभाव में, मौजूदा अस्पष्टताएँ और अनिश्चित क्षेत्र अन्य क्षेत्रीय परमाणु तनाव वाले क्षेत्रों में भी दोहराए जा सकते हैं, जिस कारण वैश्विक स्तर पर गंभीर परिणाम मुमकिन हैं।

This article is a translation. Click here to read the original in English.

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Image 1: Hamed Saber via Wikimedia Commons

Image 2: Reetesh Chaurasia via Wikimedia Commons

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